हजरत निजामुद्दीन औलिया(रह.) भाग-78
एक दिन एक शख्स हजरत महबूब इलाही
की खिदमत में हाजिर हुआ । उसने आपके साथ दरवेशों और खादिमों को देखा कि निहायत
गुरबत की जिंदगी बसर कर रहे हैं। आने वाला इस सूतरहाल से बहुत मुतअस्सिर हुआ । फिर
वो हजरत निजामुद्दीन औलिया से अर्ज करने लगा। ‘’ अगर आप कहें तो मैं आपको सोना
बनाना सिखा दूं ताकि पैसों की तंगी और बदहाली दूर हो जाये।
जवाब में हजरत महबूब इलाही ने
फरमाया’’ शक्ल व सूरत को सवारना नसारा (ईसाइयों) और सोना बनाना यहूदियों की खासियत
है। मुसलमानों के नजदीक सोना बनाना जर्दरोई है ( यानी अपने चेहरे को जर्द कर लेना)
न हम माल की तरफ माइल हैं और न सोने की तरफ न हमें दुनिया की जरूरत है न हम उक़बा
(आखिरत) का सवाल करते हैं। हम तो अपने खालिक को पुकारते हैं और उसकी रजा मांगते
हैं।‘’
हजरत निजामुद्दीन औलिया की इस मुख्तसर
से जवाब में एक मुसलमान के लिये पूरी जिंदगी का लाहिया अमल मौजूद है। सोने का रंग
भी जर्द होता है एक मोमिन के चेहरे का भी। ये जर्दी किसी बीमारी की वजह से नहीं होती। लजीज खानों से दूरी, ऐश व आराम से किनाराकशी, मुसलसल खौफे खुदा और गिरया नीम
शबी ,
एक मुसलमान के चेहरे को जर्द बना देते हैं। हजरत महबूब इलाही ने इसी तरफ इशारा
किया था।
फिर इसी जर्द रंग पर मराजुल मौत का रंग गालिब आने लगा।
हजरत निजामुद्दीन औलिया का काम खत्म हो चुका था और आप ने सफर आखिरत की तैयारी
शुरू कर दी थी।
सैयदुल औलिया के मुसन्निफ सैयद अमीर खुर्द तहरीर करते हैं कि हजरत महबूब
इलाही को अजीब मर्ज लाहिक था। तमाम हकीम उनके मर्ज को समझने में नाकाम थे और उनकी हिकमत हजरत निजामुद्दीन औलिया की बीमारी
के सिलसिले में एक कारे बेकार नजर आ रही थी। आप दिन में कई बार बे होश होते और फिर
होश में आ जाते इसी दौरान हजरत शेख बहाउद्दीन जकरिया मुल्तानी के पोते हजरत शेख
रूकनुद्दीन फतह इयादत के लिये तश्रीफ लाये। हजरत महबूब इलाही चार पाई पर तश्रीफ
फरमा थे। आपमें इतनी भी ताकत नहीं थी कि आप नीचे उतर सकते। मुसाफहे के बाद हजरत
निजामुद्दीन औलिया ने हजरत शेख रूकनुद्दीन से अपनी चार पाई पर बैठने के लिये कहा
मगर अदब के वजह से हजरत शेख चारपाई पर
नहीं बैठे। आखिर हजरत महबूब इलाही के हुक्म पर चार पाई लाई गई और हजरत शेख रूकनुद्दीन
कुर्सी पर तश्रीफ फरमा हुए।
‘’ अभी हमें आपकी जरूरत है।‘’
हजरत शेख रूकनुद्दीन अबुल फतह ने दरख्वास्त के अंदाज में फरमाया ‘’
मुझे यकीन है कि अगर आप अपनी सेहत के बारे में दुआ फरमायेंगे तो हक तआला
उसे रद्द नहीं करेंगे’’
हजरत शेख रूकद्दीन की मोहब्बत
आमेज गुफ्तगु सुनकर हजरत महबूब इलाही आबदीदा हो गये और निहायत पुरसोज लहजे में
फरमाने लगे ‘’
शेख मैंने अपने आका ( सलल्लाहु अलैहि वसल्लम) को ख्वाब में देखा है । सरवरे
कोनैन सल लल्लाहु अलैहि वसल्लम फरमा रहे थे कि निजामुद्दीन हमें तुम्हारी
मुलाकात का बहुत इश्तियाक है।‘’
हजरत निजामुद्दीन औलिया की बात
सुनकर हजरत शेख रूकनुद्दीन अबुल फतह और वहां मौजूद लोग रोने लगे । अब इसमें कोई शक
बाकी नहीं रहा था कि हजरत महबूब इलाही का वक्ते आखिर करीब है। जिस शख्स से
रिसालत मआब सल लल्लाहु अलैहि वसल्लम मुलाकत के ख्वां हों, वो जिंदगी को मौत पर तरजी कैसे दे
सकते थे। ये तो निजामुद्दीन औलिया का सर्फे खास था कि आका ने गुलाम को याद फरमाया
था। और इसी हुक्म को सुनकर हजरत महबूब इलाही ने दुनिया दिल उठा लिया था और आखिरत
के तसव्वुर में मुकम्मल तौर पर गर्क रहने लगे थे।
सीरतुल औलिया की एक रिवायत के
मुताबिक हजरत निजामुद्दीन औलिया ने अपनी वफात से चालीस दिन पहले खाना छोड़ दिया
था और हर वक्त रोते रहते थे। दूसरे अकीदतमंद और खिदमगारों का भी यही बयान है कि
हजरत महबूब इलाही की आंखों से हर वक्त आंसूओं का सैलाब जारी रहता था। उस जमाने
में एक दिन एक मुरीद रजी मुबारक ने मछली का शोरबा पेश करते हुए अर्ज किया। कमजोरी
बहुत हो गई है। इसलिये ,ये हल्की गिजा इस्तेमाल फरमा
लीजिये।‘’
रजी मुबारक के अलावा दूसरे मुरीदों
और खिदमतगारों ने भी इल्तिजा की मगर हजरत निजामुद्दीन औलिया ने इंकार फरमाया। ‘’ उसे पानी में बहा दो’’
सैयद अमीर खुर्द के चचा सैयद हसन
ने अर्ज किया । मखदूम आपने कई रोज से कुछ नहीं खाया है। इस तरह तो सेहत- ए- जिस्मानी
को मजीद नुक्सान पहुंचेगा।‘’
जवाब में हजरत महबूब इलाही ने
फरमाया। ‘’
सरवरे कोनैन सल लल्लाहु अलैहि वसल्लम की
मुलाकात की आरजू रखता हो वो दुनियावी खाना कैसे खा सकता है?
सैयद अमीर खुर्द बयान करते हैं कि
जुमा का दिन था हजरत निजामुद्दीन औलिया पर एक अजीब सी कैफियत तारी हो गई । आपने
नमाज अदा की और इसी हालत में आप घर के अंदर तश्रीफ ले आये फिर आप पर पहले से ज्याद
कमजोरी हो गई हर रोज कई कई बार बेहोश हो जाते फिर होश में आ जाते । बार बार जबान
मुबारक से मख्सूस अल्फाज अदा फरमाते।‘’ आज जुमा है और दोस्त को दोस्त का वादा याद है।‘’
इसके अलावा बार बार यही सवाल पूछते
कि क्या नमाज का वक्त हो गया और क्या मैंने नमाज अदा कर ली है ? मुरीदीन और खुद्दाम अर्ज करते आप
नमाज अदा कर चुके हैं।
जवाब में हजरत महबूब इलाही फरमाते
हैं’’ मैं दोबारा नमाज पढ़ना चाहता हूं ‘’ फिर आप दोबारा नमाज अदा फरमाते
चंद रोज जब तक आप दुनिया में रहे, उन्ही दो बातों को बार बार दोहराते थे कि आज जुमा
और मैंने नमाज अदा कर ली है या नहीं ?और कभी ये फरमाते
हम जा रहे हैं, हम जा रहे हैं, हम जा रहे हैं, आखिरी दिनों में बाबा फरीद की भी
यही कैफियत हो गई थी।
एक दिन इसी हालत में हजरत
निजामुद्दीन औलिया ने अपने तमाम खास लोगों और मुरीदीन को जो देहली में मौजूद थे , तलब किया फिर उन लोगों की तरफ
मुतवज्जा होकर अपने खादिम- ए- खास ख्वाजा इकबाल की तरफ इशारा करते हुए फरमाया ‘’ तुम लोग इस बात के गवाह रहना कि
अगर उसने घर में कोई चीज भी रखी तो कल कयामत के दिन खुदा के सामने जवाब देगा।
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