हजरत िनिजामुद्दीन औलिया(रह.) भाग-79
पीरो मुर्शिद की बात सुनकर ख्वाजा
इकबाल फिर रोने लगे फिर कांपते हुए जिस्म और लड़खडाती हुई जबान के साथ अर्ज किया ‘ ये गुलाम खानकाह में कुछ भी बाकी
नहीं रहने देगा। यहां जिस कदर भी चीजें हैं उन सबको आपके नाम पर सदका कर देगा।
फिर ख्वाजा इकबाल ने ऐसा ही किया
खानकाह में जितना भी सामान था, जरूरतमंदों में तकसीम कर दिया । सिर्फ अनाज अनाज को छोड़कर , जो दरवेशों की चंद रोज की खुराक था।
इसके बाद सैयद अमीर खुर्द के चचा
सैयद हसन ने हजरत महबूब इलाही को इत्तेला देते हुए अर्ज किया। ख्वाज इकबाल ने गल्ले
के सिवा घर में जो कुछ मौजूद था, सब गरीबों और मोहताजों में बांट दिया।
हजरत निजामुद्दीन औलिया ने उसी वक्त
ख्वाजा इकबाल को तलब किया और सख्त नाराजगी का इजहार करते हुए फरमाया।‘ तुम ने उस मुर्दारियत को किस लिये
बाकी रखा है ‘’
ख्वाजा इकबाल ने अर्ज किया सिवाय
अनाज के घर में कुछ भी बाकी नहीं है और गल्ले का जखीरा भी इस लिये छोड़ दिया गया
है चंद हजार भूके अपने पेट की आग बुझा सकें।
हजरत महबूब इलाही ने फरमाया। ‘’ मखलूक ए खुदा को बुलाओ’’
थोड़ी देन में हजारों लोग जमा हो
गये। हजरत निजामुद्दीन औलिया ने अपने खिदमगारों को मुखातिब करते हुए फरमाया । ‘’ उन लोगों से कहो कि गोदाम के
दरवाजे तोड़ दें । जिस कदर गल्ला मौजूद है, बे खौफ होकर ले जायें और वहां झाड़ू दे दें ।
लोगों ने अपने गम ख्वार मसीहा का
हुक्म सुना । सबके सब सर झुकाए खड़े रहे । बहते हुए आंसूओं से बे करार जज्बों का इजहार कर रहे थे। हजरत
महबूब इलाही ने दोबारा फरमाया। वक्त बहुत
कम है कि आंख बंद होने से पहले ,सीने के इस बोझ को कम कर दूं।
मिस्कीनों और मोहताजों ने दोबारा
हजरत निजामुद्दीन औलिया का हुक्म सुना और गोदामों से तमाम अनाज उठाकर अपने घरों को ले गये।
उस वाक्ये के बाद खुद्दाम ने
हाजिरे खिदमत होकर अर्ज किया सैयदी आपके
बाद हम फकीरों को क्या होगा?
जवाब में हजरत महबूब इलाही ने
फरमाया ‘’
तुम लोग परेशान क्यों होते हो ?क्या तुम्हें अपने देने वाले रज्जाक पर यकीन नहीं
रहा?
मुरीदों और खादिमों ने शर्मसारी की
हालत में सर झुका दिये । ‘’ उसके सिवा कौन देने वाला है ?
हजरत निजामुद्दीन औलिया ने फरमाया।
‘’ तुम लोग नजर नियाज के तौर पर मेरे
रोजे से इस कदर पाओगे कि वो तुम्हारे लिये काफी होगा।
बहुत से खिदमगारों ने अर्ज किया ‘’ हमारे दर्मियान आमदनी को तकसीम
कौन करेगा?
हजरत महबूब इलाही ने फरमाया वो जिसका आमदनी में
हिस्सा नहीं होगा।
इस बीमारी के दौरान हजरत
निजामुद्दीन औलिया के कई मुरीदों ने सैयद अमीर खुर्द के नाना मौलाना
शमशुद्दीन से कहा ‘’ आप हजरत शेख से अर्ज करें कि हमने पीरो मुर्शिद के
खतीरे के करीब जो ‘’ खतीरा अल कुदुस’’ है बुलंद और आरास्ता मकान बनाए
रखें हैं ताकि विसाल के बाद जिस्म का
वहां मुंतकिल किया जा सके। सुल्तानुल
मशाइख से पूछें कि वफात के बाद किस माकन में आराम फरमायेंगे ?
मौलाना शमशुद्दीन ने मुरीदों और
खिदमगारों की ये दरख्वास्त हजरत महबूब इलाही की खिदमत में पेश की तो आपने
फरमाया।‘’
मौलाना मैं किसी इमारत में दफन नहीं होन चाहता। मेरी तो ख्वाहिश है कि इस जिस्म
खाकी को किसी सुनसान जगह में ले जाकर सुपुर्द खाक कर दिया जाय।
उसके बाद हजरत निजामुद्दीन औलिया
ने अपने कपड़ों का सन्दूंक तलब किया। ये उस मर्दे दरवेश का सामान था जिसने आधी सदी तक हिंदुस्तान की अवाम के दिलों पर हुकूमत
की जिसकी बारगाह जलाली में सलातीन ए वक्त माल मताअ के अंबार लेकर हाजिर हुए थे आज
माअरफत का वही ताजदार अपना खजाना लुटा रहा
था। ये खजाना चंद दस्तारों , नमाज के मसल्लों और मामूली कपड़ों की उबाओं पर मुश्तमिल
था।
तमाम मुरीदीन और खिदमगारों की निगाहें हजरत महबूब इलाही के दस्ते करम पर
मरकूज थीं और सबके सब इस बात के मुंतजिर थे कि बारगाह ए शेख से किसको क्या अता
होता है?
हजरत निजामुद्दीन औलिया ने अपनी एक दस्तार, पेरहन खास और मुसल्ले हजरत
बुरहानुद्दीन गरीब को अता किया और उन्हें अर्जे दक्किन की जानिब रवाना हुक्म
दिया- एक दस्तार पेरहन खास और मुसल्ले हजरत शेख कमालुद्दीन याकूब को अता किया और उन्हें हिदायत की कि वो
सूबे गुजरात जाकर सिलसिला ए चिश्तिया की तब्लीग को जारी रखें, इसी तरह एक पैरहन , दस्तार और मुसल्ला मौलाना
शुमशुद्दीन यहया को अता किया । शेख मोसूफ का मजार उसी चबूतरे पर है जहां हजरत
महबूब इलाही के अक्सर मुरीदीन खास मदफून हैं।
अलगर्ज इस संदूक में जो मौजूद था , सब तकसीम कर दिया गया। हजरत सैयद
नसीरूद्दीन चिराग देहली भी उस वक्त मौजूद थे मगर हजरत महबूब इलाही की बारगाहे करम
से आपको कोई चीज अता नहीं हुई। पीरो मुर्शिद के इस तर्जे अमल पर हाजिरीन को शख्त
तअज्जुब था। खानकाह के बाज खुद्दाम ने हजरत नसीरूद्दीन चिराग से इस वाक्ये का
जिक्र किया मगर आप ये कहकर खामोश हो गये । हजरत शेख बेहतर जानते है कि कौन किस चीज
का अहल है।
जब हजरत चिराग ये फरमा रहे थे , उस वक्त उनके चेहरे मुबारक पर
शिकायत के बजाय सरशारी का रंग झलक रहा था । ये वही मंजिल थी, जब एक मुरीद अपने शेख की रजा को
जिंदगी का हासिल समझ लेता है और महरूमी के आलम में भी यही समझता है कि जैसे उसने
सब कुछ पा लिया हो, जब हजरत महबूब इलाही अपने मुरीदों में तबर्रुकात तकसीम फरमारहे थे तो हजरत शेख नसीरूद्दीन
मेहमूद इंतिहाई मसरूर नजर आ रहे थे ।
फिर मंगल के रोज असिर की नमाज के
बाद हजरत निजामुद्दीन औलिया ने हजरत चिराग देहलवी को तलब किया और खरका, असा, मुसल्ले, तस्बीह, लकड़ी का प्याला और जो कुछ हजरत
बाबा फरीद से मिला था , वो सब हजरत नसीरूद्दीन मेहमूद को अता करते हुए
फरमाया,
तुम्हें देहली शहर में रहकर लोगों के जुल्म व जवर को बर्दाश्त करना चाहिये कि
यही तुम्हारे हक में बेहतर है।‘’
फिर वक्ते मालूम आ पहुंचा जो अहले
दिल के लिये कयामत से कम नहीं था। जब
मरजुल मौत ने शिद्दत इख्तियार की तो हजरत महबूब इलाही से दवा पीने की दरख्वास्त
की गई । मगर आपने दवा पीना तो दरकिनार, उसकी तरफ देखना भी गवारा नहीं किया, मुरीदीन और खुद्दाम बहुत ज्यादा
परेशान नजर आ रहे थे, जब बार बार दवा पीने की इल्तिजा की गई तो आपने फरमाया। ‘’ इश्क के मरीजों को दीदारे दोस्त
के सिवा कोई दवा नहीं है।
जब सुल्तान मोहम्मद तुगलक को खबर
हुई तो उसने अपने शाही तबीब और साथ ही दरख्वास्त भी पेश की । ‘’ मुझे आपकी इयादत का बहुत इश्तियाक
है। अगर इजाजत हो तो दस्तबोसी के लिये हाजिर हो जाऊं ।
जब सुल्तानी तबीब खानकाह पहुंचा
तो हजरत निजामुद्दीन औलिया बेहोश थे होश
आया तो पूछा कि मैंने नमाज पढ़ी है या नहीं? खुद्दाम ने फरमाया आपने नमाज अदा
कर ली है। ये सुनकर हजरत महबूब इलाही ने बिस्तर पर लेटे लेटे ही दोबारा नमाज अदा
की।
शाही तबीब हजरत शेख की चारपाई के
करीब आया। उस वक्त उसकी आपकी आंखें बंद थीं और आप आलम ए सुकूत में थे तबीबे शाही
ने नब्ज पर हाथ रखा तो हजरत महबूब इलाही ने आंखें खोल दीं। एक खादिम ने झुककर
सरगोशी में कहा । सुल्तान ने आपके इलाज के लिये तबीब –ए- खास भेजा है। ‘’
हजरत निजामुद्दीन औलिया ने तबीब- ए-
शाही की तरफ देखा दर्दमंद इश्क रादार
वखैर दीदार नीश्त
हजरत महबूब इलाही के एक मुरीद महेन्द्र देव ने अपने रोजनामचे में आपके आखिरी लम्हात के बारे में तहरीर किया है कि सारी रात हजरत की यही हालत रही । कुछ देर के लिये होश आता और फिर गशी तारी हो जाती थी। होश की हालत में हजरत जबान से कुछ फरमाते थे मगर आवाज की कमजोरी की वजह से हम उसे सुनने से महरूम रह जाते थे सुबह की नमाज पढ़कर हम सब फिर हाजिर ए खिदम हो गये । हमने सुना कि हजरत ने फजर की नमाज भी कई बार अदा की है और सैयद इमाम को बुलाकर कान में कुछ फरमाया है।
- हजरत निजामुद्दीन औलिया भाग-75
- हजरत निजामुद्दीन औलिया भाग-76
- हजरत निजामुद्दीन औलिया भाग-77
- हजरत निजामुद्दीन औलिया भाग-78

Comments
Post a Comment