हजरत निजामुद्दीन औलिया(रह.) भाग-72
‘’
आओ भलाई की तरफ’’
...... और जब लोग भलाई के रास्ते पर आ जाते थे तो दरवेशों का दूसरा पैगाम होता
था- ‘’
आओ नमाज की तरफ ..... आओ नमाज की तरफ –‘’
फिर जिस इंसान में जितनी हिम्मत होती थी, उसी के मुताबिक उसको जिम्मेदारियां
सौपते थे।
हजरत निजामुद्दीन औलिया और दूसरे दरवेशों ने उलेमा जाहिर की जात पर कभी नुक्ता
चीनी नहीं की थी हालांकि हजरत महबूब इलाही इस बात के अहल थे कि अलाउद्दीन खिलजी और
गयासुद्दीन तुगलक के दरबार से फायदा उठाने वाले
उलेमा पर एतिराज करते मगर आपने कभी
किसी का दिल नहीं दुखाया न किसी के ऐब
बयान किये और किसी के दर पर्दा
हालात जानने की जुस्तजू में नहीं रहे । अहले नजर जानते हैं कि यही सरवरे कौनैन सल
लल्लाहु अलैहि वसल्लम की अफजल तरीन सुन्नतें
हैं जिन पर हजरत महबूब इलाही आखिरी सांस तक अमल पैरा रहे।
अचानक हालात ने एक और करवट ली । बजाहिर गयासुद्दीन तुगलक हजरत निजामुद्दीन औलिया के दलाइल से मुतमइन हो
गया था और उसने समा के इन्इकाद पर कोई पाबंदी आईद नहीं की थी मगर दर पर्दा वो हजरत
महबूब इलाही से खुश नहीं था। इस ना खुशी के दो वजह हो सकते हैं। एक तो ये हजरत निजामुद्दीन औलिया दरबारे सुल्तानी
में तश्रीफ नहीं लाते थे मुअर्रिखीन लाख तहरीर करें कि गयासुद्दीन तुगलक एक बा
किरदार हुक्मरां था लेकिन उसके दिमाग में सुल्तानी असर पूरी शिद्दत के साथ मौजूद था।
इसलिये उसे एक मर्दे आजाद की अदा ए बे नियाजी
शख्त गिरां गुजरती थी। दूसरे ये कुतुबुद्दीन मुबारक शाह खिल्जी की तरह
सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक के जहन में भी ये बात बैठ गई थी कि कहीं हजरत महबूब
इलाही की ये मकबूलियत उसके इक्तिदार के लिये कोई खतरा न बन जाये नतीजतन फरमा रवाए
हिंद ने ये फैसला कर लिया कि हजरत
निजामुद्दीन और को दारूल हुकूमत से दूर कर दिया जाय। ये वाक्या उस वक्त पेश आया जब सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक ने लखनोती(बंगाल)
पर लशकर कशी का इरादा किया। तुगलकाबाद
(देहली) से कूच करने से पहले सुल्तान ने हजरत निजामुद्दीन औलिया के नाम एक कहर
नामा तहरीर किया।
‘’
निजामुद्दीन औलिया अब तुम्हारा यहां रहना मेरे लिये ना काबिले बर्दाश्त है। मैं तुम्हें हुक्म देता हूं कि मेरी सल्तनत
की हुदूद से बगैर देर किये निकल जाओ। मैं दुश्मनों को शिकस्त देने के लिये
लखनोती जा रहा हूं। मेरी ये जंगी मुहिम माह दो माह मे खत्म हो जायगी मैं तुम्हें
इतनी ही मोहलत दे सकता हूं जब मेरे कदम
तुगलका बाद की जमीन पर पड़ें तो खुद्दाम मुझसे कहें कि हुक्मे शाही की तामील में
निजामुद्दीन औलिया अपने काफला ए मस्त दरवेशों को लेकर कहीं और चले गये हैं। अगर मेरे देहली पहुंचने तक तुमने और तुम्हारे
अकीदतमंदों ने ये इलाका खाली नहीं किया तो
मैं तुम सबको इबरतनाक साजा दूंगा जिसे अहले दुनिया कयामत तक याद रखेगी।
जब ख्वाजा इकबाल फरमारवाए हिंद का कहर नामा पढ़ चुके तो हाजिरीन मज्सिल शदीद वहशत व इज्तिराब में
मुब्तिला हो गये।
‘’
आखिर ये कौनसी अजीब बात है जिसने तुम्हारे होश हवास और चेहरों की रौनकें छीन लीं
हैं’’
हजरत निजामुद्दीन औलिया ने अपने मुरीदीन और अकीदतमंदों को मुखातिब करते हुए
फरमाया। इससे पहले भी ऐसा होता रहा है और आगे भी ऐसा होता रहेगा।
हुक्मराने वक्त अपनी आदतें नहीं बदलेंगे
और ये बंदा आजिज अपनी आदत तर्क नहीं करेगा सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक को
अपने काम करने दो और ब कौल उसके मुझे समा में मश्गूल रहने दो’’।
हजरत निजामुद्दीन औलिया का अंदाजे बे नियाजी वही था जिसका मुजाहिरा
आपने कुतुबुद्दीन मुबारक शाह के जवाब में
किया था । हजरत अमीर खुसरू सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक के दरबार से थे जब
हजरत महबूब इलाही अपने खिदमगारों को इस
जाबिराना हुक्म का जवाब दे चुके तो अमीर खुसरू ने दस्त बस्ता अर्ज किया’’ सैयदी वो सख्तगीर हुक्मरां है। उससे हमें बहुत ज्यादा नुकसान पहुंच सकता है। उससे पहले कि सुल्तान वापस आए, हमें कोई मुनासिब कदम उठा लेना
चाहिये। शिद्दत जज्बात से अमीर खुसरू की
आवाज कांप रही थी।
तुम कहना क्या चाहते हो खुसरू कि हम गयासपुर छोड़कर किसी दूर दराज इलाके में
चले जाएं या फिर हुक्मे सुल्तानी के मुताबिक उसकी हुदूद ही से निकल जाएं। ‘’ हरजत निजामुद्दीन औलिया ने फरमाया। ‘’ हमने अलाउद्दीन के दौरे हुकूमत
में सोचा था कि हिंदुस्तान की सुकूनत छोड़कर अल्लाह की जमीन के किसी गुमनाम गौशे को अपनी इकामतगाह बना
लें मगर अलाउद्दीन तो दुनिया से रूखसत हो
गया और फिर उसने दोबारा जिद भी नहीं की। इसलिये हमने भी गयासपुर छोड़ने का इरादा तब्दील
कर दिया था’’
हजरत अमीर खुसरू सुल्तान गयासुद्दीन
तुगलक की कीनापरवरी से वाकिफ थे कि अगर उसके दिल में किसी शख्स की तरफ से गिराह
पड़ जाती थी तो फिर उसे अमन सलामती के साथ नहीं खोला जा सकता था। इसलिये एक बार फिर आपने हुजूर शेख से दरख्वास्त की कि सुल्तान के फितने से
महफूज रहने के लिए कोई एहतियाती तदाबीर करना लाजमी है।
जवाब में हजरत महबूब इलाही ने फरमाय।- ‘’ खुसरू हमारे पास न तख्त है न
कलाह न दौलत है न सिपाह... फिर एक हुक्मरां की मुफ्सिदाना युरस से किस तरह से
तहफ्फुज किया जा सकता है ।
गुलाम को क्या खबर? सुल्तानुल मशाइख ही जानें कि एक ना शुक्रे और जालिम
इंसान को किस तरह राह पर लाया जा सकता है? हजरत अमीर खुसरू ने अर्ज किया।
खुसरू अब तुगलक को राहे रास्त पर नहीं लाया जा सकता-। वो गुरूर-ए- इक्तिदार व
हवस- ए- दुनिया की गर्द में गुम हो चुका
है, समाअतें बंद हो चुकी हैं और आंखों
से देखने की सलाहिय छिन चुकी है ‘’ ये कहकर
हजरत निजामुद्दीन औलिया ने ख्वाजा इकबाल के हाथ से तुगलक नामा ले लिया। उस गुस्ताखाना तहरीर पर एक नजर की और फिर ख्वाजा
इकबाल से फरमाया ‘’ मेरा कलम दवात लाओ ।

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