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                         जहांगीर और नूरजहां भाग-4 लेकिन तख्‍त पर बैठने के बाद जहांगीर ने उसकी ये गल्‍ती माफ कर दी और उसे बंगाल की जागीर पर बहाल रखा । शेर अफगन के कत्‍ल के बाद उसकी बीवी मेहरून्निसा (नूरजहां) को उसकी बेटी लाडली बेगम के साथ जहांगीर के दरबार में भेज दिया गया। मेहरून्निसा को अकबर की बीवी सलीमा बेगम की खिदमत पर लगा दिया गया । सन् 1611 ई. में जश्‍ने बहार के मौके पर पहली बार इत्तिफाक से नूर जहां को देखा तो उसका दीवाना हो गया और दो माह बाद ही उससे शादी कर ली । जहांगीर ने उसे नूर महल का नाम दिया । अपनी काबिलियत के दम पर नूरजहां बहुत जल्‍द जहांगीर के करीब होती चली गई । उसके बाप को इतिमातुद्दौला का खिताब दिया गया और उसके भाई को तरक्‍की दी गई। शेर अफगन नूरजहां और जहांगीर के बारे में अनगिनत कहानियों ने जन्‍म लिया । कुछ लोगों ने लिखा कि जहांगीर अकबर के जमाने में ही नूरजहां की मोहब्‍बत में गिरफ्तार हो गया था लेकिन उसकी मंगनी शेर अफगन के साथ हो गई थी इसलिये जहांगीर के रास्‍ते में बहुत ज्‍यादा मुस्किलें पैदा हो ...

Jagdish Chandra Bose

जगदीशचंद्र बोस



जगदीश चंद्र बोस का जन्‍म 30 नवम्‍बर 1858 को बंगाल वर्तमान के बांग्‍लादेश में ढाका जिले के फरीदपुर के मेमन सिंह  में हुआ था। उनके पिता भगवान चंद्र बोस फरीदपुर, बर्धमान एवं अन्‍य जगहों पर उप-मैजिस्‍ट्रेट या सहायक कमि̺श्‍नर थे। ग्‍यारह बर्ष की आयु तक बोस ने गांव के ही एक स्‍कूल में शिक्षा ग्रहण की। बोस की शिक्षा एक बांग्‍ला स्‍कूल में प्रारंभ हुई। उनके पिता मानते थे कि अंग्रेजी सीखने से पहले अपनी मातृभाषा अच्‍छे से आनी चाहिए। जगदीश चंद्र बोस बहुशास्‍त्री, जीवविज्ञानी, वनस्‍पतिविज्ञानी, पुरातात्विक थे और साथ ही वैज्ञानिक कथा लिखने  वाले लेखक थे। वे ब्रिटिश कालीन भारत में रहते थे, वे पहले वैज्ञानिक थे जिन्‍होंने रेडियो और सूक्ष्‍म तरंगों की प्रकाशीकी पर कार्य किया। वनस्‍पति विज्ञान में उन्‍हें रेडियो विज्ञान का पिता माना जाता है। वे विज्ञान कथाएं भी लिखते थे और उन्‍हें बंगाली विज्ञानकथा-साहित्‍य का पिता भी माना जाता है। इन्‍होंने एक यन्‍त्र क्रेस्‍कोग्राफ का अविष्‍कार किया और इससे विभिन्‍न उत्‍तेजकों के प्रति पौधों की प्रतिक्रिया का अध्‍ययन किया। उनके योगदान को देखते हुए चांद पर मौजूद ज्‍वालामुखी विवर को भी उन्‍ही के नाम पर रखा गया। ब्रिटिश भारत के बंगाल प्रांत में जन्‍मे बोस ने सेन्‍ट जैवियर यूनिवर्सिटी, कलकत्‍ता से स्‍नातक की उपाधि प्राप्‍त की। बाद में बोस लंदन युनिवर्सिटी में चिकित्‍सा की शिक्षा लेने गए, लेकिन स्‍वास्‍थ्‍य की समस्‍याओं के चलते उन्‍हें यह शिक्षा बीच में ही छोड कर भारत वापस आना पड़ा। उन्‍होंने फिर प्रेसिडेंसी युनिवर्सिटी में भौतिकी के प्रध्‍यापक का पद संभाला और जातिगत भेदभाव का सामना करते हुए भी बहुत से महत्‍वपूर्ण वैज्ञानिक प्रयोग किये। उन्‍हें  संकेत भेजने में असाधारण प्रगति की और सबसे पहले रेडिया संदेशों को पकडने के लिए अर्धचालकों का प्रयोग करना शुरू किया। लेकिन अपनी खोजों से व्‍यावसायिक लाभ उठाने की जगह उन्‍होंने इन्हें सार्वजनिक रूप से प्रकाशित कर दिया ताकि अन्य शोधकर्ता इनपर आगे काम कर सके। इसके बाद उन्‍होंने वनस्‍पति, जीवविज्ञान में अनेक खोजें की। उन्‍होंने एक यन्‍त्र क्रेस्‍कोग्राफ का अविष्‍कार किया और इससे विभन्‍न उत्‍तेजकों के प्रति पौधों की प्रतिक्रिया का अध्‍ययन किया । इस तरह से उन्‍हें सिद्ध किया कि वनस्‍पतियों और पशुओं के उतकों में काफी समानता है। अपने इस अविष्‍कार के लिए पेटेंट भी दिया गया। उनके अविष्‍कार ने विज्ञान  की दुनिया में कई रेकार्ड स्‍थापित किये। उनके यंत्रों का परिणाम काफी अच्‍छा था। उन्‍होंने पौधों के महसूस करने की शक्ति के बारे में भी काफी खोज की और साथ ही बीमार पौधों को सुधारने में भी काफी योगदान रहा। इससे संबंधित उनकी दो किताबें लिविंग एंड नॉन-लिविंग, 1902 और दि नर्वस मैकेनिज्‍म ऑफ प्‍लांट, 1926 को भी प्रकाशित किया गया।

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