कोई और भी पढ़ ले
एक लड़के को जब बहुत ज्यादा पढ़ने लिखने के बाद भी कोई
नौकरी नहीं मिली और घरेलू नौकरी उसे पसंद
नहीं थीं। आखिर सोच समझकर उसने जूतों की एक दुकान खोल ली दुकान छोटी थी मगर उससे
इतनी आय हो जाती थी कि घर का खर्च चल जाता था । लेकिन थोड़े ही दिनों में उसकी
बीवी मर गई और ये अकेला रह गया । बीवी के मरे हुए छ: महीने हुए थे कि भाई और भाभी
भी चल बसे सिर्फ छ: सात साल का एक भतीजा रह गया लड़के का कोई और सहारा नहीं था।
चाचा ने अपने पास रख लिया और उसे
पढ़ने के लिये स्कूल भेजने लगा। थोड़े
दिन बाद वो लड़का जब पढ़ना लिखना सीख गया तो चाचा ने खुद उसे खाली वक्त में
पढ़ाना लिखाना शुरू कर दिया। एक उसके
दिमाग के ये ख्याल आया कि अगर इस वक्त में कोई और भी पढ़ लिया करे तो क्या
नुकसान है।
ये सोचकर उसने तमाम मोहल्ले के
बच्चों को बुलाया और बगैर फीस के पढ़ाना शुरू कर दिया जिससे थोड़े ही दिनों में
उसकी दुकान स्कूल बन गई। हर साल बहुत से बच्चे पढ़कर चले जाते और बहुत से गरीब बच्चे उनकी जगह आ जाते।
दो चार साल बाद उसका भतीजा तो स्कूल
पास करके कॉलेज में चला गया मगर वो इसी तरह काम करता रहा। इसके पांच साल बाद लड़का
बी. ए. पास करके किसी दफ्तर में नौकरी करने लगा और अपने चाचा से कहा कि अब आप आराम
करें मेरी आमदनी काफी । मगर वो नहीं माना आखिर दम तक ना दुकान छोड़ी और ना पढ़ाना बंद किया।
उसको मरे हुए जमाना गुजर चुका है
लेकिन इस दुकान पर अब भी बहुत से पुराने लड़के
जब कभी वहां से निकलते हैं तो अपने
उस्ताद की याद में उस दुकान को सलाम करते जाते हैं।

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