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                         जहांगीर और नूरजहां भाग-4 लेकिन तख्‍त पर बैठने के बाद जहांगीर ने उसकी ये गल्‍ती माफ कर दी और उसे बंगाल की जागीर पर बहाल रखा । शेर अफगन के कत्‍ल के बाद उसकी बीवी मेहरून्निसा (नूरजहां) को उसकी बेटी लाडली बेगम के साथ जहांगीर के दरबार में भेज दिया गया। मेहरून्निसा को अकबर की बीवी सलीमा बेगम की खिदमत पर लगा दिया गया । सन् 1611 ई. में जश्‍ने बहार के मौके पर पहली बार इत्तिफाक से नूर जहां को देखा तो उसका दीवाना हो गया और दो माह बाद ही उससे शादी कर ली । जहांगीर ने उसे नूर महल का नाम दिया । अपनी काबिलियत के दम पर नूरजहां बहुत जल्‍द जहांगीर के करीब होती चली गई । उसके बाप को इतिमातुद्दौला का खिताब दिया गया और उसके भाई को तरक्‍की दी गई। शेर अफगन नूरजहां और जहांगीर के बारे में अनगिनत कहानियों ने जन्‍म लिया । कुछ लोगों ने लिखा कि जहांगीर अकबर के जमाने में ही नूरजहां की मोहब्‍बत में गिरफ्तार हो गया था लेकिन उसकी मंगनी शेर अफगन के साथ हो गई थी इसलिये जहांगीर के रास्‍ते में बहुत ज्‍यादा मुस्किलें पैदा हो ...

Nalanda university

नालंदा विश्‍व विद्यालय


बौद्धकाल में भारत शिक्षा का केंद्र था। बौद्ध युनिवर्सिटी विक्रमशिला, तक्षशिला और नालंदा युनिवर्सिटी की ख्‍याति दूर दूर , तक फैली थी। तक्षशिला के बाद नालंदा युनिवर्सिटी की चर्चा होती है। बिहार की राजधानी पटना से करीब 95 किलोमीटर दक्षिण-उत्‍तर में प्राचीन नालंदा युनिवर्सिटी के अवशेष आज भी देखे जा सकते हैं। इस युनिवर्सिटी की स्‍थापना गुप्‍तकाल के शासक कुमारगुप्‍त ने की थी।  यहां इतनी किताबें रखीं थीं कि जिन्‍हें गिन पाना आसान नहीं था। हर विषय की बिताबें इस युनिवर्सिटी में मौजूद थीं। नालंदा शब्‍द संस्‍कृत से बना है। संस्‍कृत में नालम  का अर्थ कमल होता है। कमल ज्ञान का प्रतीक है। कालक्रम से यहां महाविहार की स्‍थापना के बाद इसका नाम नालंदा महाविहार रखा गया। यह भारत में उच्‍च शिक्षा का सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण और विश्‍वख्यिात केंद्र था महायान बौद्ध धर्म के इस शिक्षा-केन्‍द्र में हीनयान  बौद्ध धर्म के साथ रखा गया।

 यह भारत में उच्‍च शिक्षा का सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण और विश्‍वविख्‍यात केंद्र था। महायान बौद्ध धर्म के इस शिक्षा-केंद्र में हीनयान बौद्ध धर्म के साथ ही अन्‍य धर्मों के तथा अनेक देशों के छात्र पढते थे यहां धर्म ही नहीं, राज‍नीति,शिक्षा, इतिहास, ज्‍योतिष, विज्ञान आदि की भी शिक्षा दी जाती थी इस युनिवर्सिटी के खंडहरों को अलेक्‍जेंडर कनिंघम ने तलाशकर बाहर निकला था जिसके जले हुए भगवेशेष इसके  प्राचीन वैभव की दास्‍तां बयां करते हैं। चीन के भ्रमणकारी हुऐनसांग के लेखों के आधार पर ही इन खंडहरों की पहचान नालंदा युनिवर्सिटी के रूप में की गई थी। 

7वीं शताब्‍दी में भारत आए हेऐनसांग नालंदा युनिवर्सिटी में न केवल छात्र रहे, बल्कि बाद में उन्‍होंने एक शिक्षक के रूप में अपनी सेवाएं दी थी। जब हऐनसांग भारत आया था, उस समय नालंदा युनिवर्सिटी में 8,500 छात्र एवं 1,510 अध्‍यापक थे। अनेक पुरभिलेखों और 7वीं सदी में भारत भ्रमण के लिए आए चीनी यात्री एहेनसांग तथा इत्सिंग के यात्रा विवरणों से इस युनिवर्सिटी के बारे में विस्‍तृत जानकारी प्राप्‍त होती है। प्रसिद्ध चीनी परिभ्रमणकारी हऐनसांग ने 7वीं शताब्‍दी में यहां जीवन का महत्‍वपूर्ण 1 वर्ष एक छात्र और एक शिक्षक के रूप में  व्‍यतीत किया था।

 इस युनिवर्सिटी की स्‍थापना गुप्‍तकालीन सम्राट कुमारगुप्‍त प्रथम ने 413-455 ईपू में की।  इस युनिवर्सिटी को कुमारगुप्‍त के उत्‍तराधिकारीयों का पूरा सहयोग और संरक्षण मि̺ला। हऐनसांग के अनुसार 470 ई. में गुप्‍त सम्राट नरसिंह गुप्‍त बालादित्‍य ने नालंदा में एक मंदिर निर्मित करवाकर इसमें 80 फिट उंची तांबे की बुद्ध प्रतिमा  को स्‍थापित करवाया। गुप्‍त वंश के पतन के बाद भी आने वाले सभी शासकों वंशों ने इसके संरक्षण में अपना महत्‍वपूर्ण योगदान जारी रखा और बाद में इसे महान सम्राट हर्षवर्धन और पाल शासकों का भी संरक्षण मि̺ला। स्‍थानीय शासकों तथा विदेशी शासकों से भी इस युनिवर्सिटी को अनुदान मि̺लता था। नालंदा युनिवर्सिटी में शिक्षा, आवास, भोजन आदि का कोई शुल्‍क छात्रों से नहीं लिया जाता था। सभी सुविधाएं नि:शुल्‍क थीं। राजाओं और धनी सेठों के दान से इस युनिवर्सिटी का व्‍यय चलता था।

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