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                         जहांगीर और नूरजहां भाग-4 लेकिन तख्‍त पर बैठने के बाद जहांगीर ने उसकी ये गल्‍ती माफ कर दी और उसे बंगाल की जागीर पर बहाल रखा । शेर अफगन के कत्‍ल के बाद उसकी बीवी मेहरून्निसा (नूरजहां) को उसकी बेटी लाडली बेगम के साथ जहांगीर के दरबार में भेज दिया गया। मेहरून्निसा को अकबर की बीवी सलीमा बेगम की खिदमत पर लगा दिया गया । सन् 1611 ई. में जश्‍ने बहार के मौके पर पहली बार इत्तिफाक से नूर जहां को देखा तो उसका दीवाना हो गया और दो माह बाद ही उससे शादी कर ली । जहांगीर ने उसे नूर महल का नाम दिया । अपनी काबिलियत के दम पर नूरजहां बहुत जल्‍द जहांगीर के करीब होती चली गई । उसके बाप को इतिमातुद्दौला का खिताब दिया गया और उसके भाई को तरक्‍की दी गई। शेर अफगन नूरजहां और जहांगीर के बारे में अनगिनत कहानियों ने जन्‍म लिया । कुछ लोगों ने लिखा कि जहांगीर अकबर के जमाने में ही नूरजहां की मोहब्‍बत में गिरफ्तार हो गया था लेकिन उसकी मंगनी शेर अफगन के साथ हो गई थी इसलिये जहांगीर के रास्‍ते में बहुत ज्‍यादा मुस्किलें पैदा हो ...

pakchi viggiyaan

पक्षी विज्ञान




भारतीय पक्षी-विज्ञान के इतिहास में एक उल्‍लेखनीय उपलब्धि हासिल की गई थी, जिसके अन्‍तर्गत मुम्‍बई के एक व्‍यक्‍ति ने पूरे देश की 80,000 किलोमीटर की यात्रा के दौरान 1,128 पक्षी-प्रजातियों को अभिलिखित (रिकॉर्ड) किया। इसमें हिमालयी वन चिडि़या, तिब्‍बती लार्क और चीनी फ्रैंकोलिन जैसी दुर्लभ प्रजातियं भी शामिल हैं।

वन्‍यजीव जीव-विज्ञान, शशांक दलवी, ''बिग ईयर'' परियोजना पर कार्य कर रहे थे। कर्नोल यूनिवर्सिटी दवारा प्रोत्‍साहित इन चुनौती के अन्‍तर्गत पक्षी-प्रेमियों ने पक्षियों की विविधता को अभिलिखित (रेकॉर्ड) करने के लिये एक भौगोलिक स्‍थान चुना। दलवी पक्षी- प्रजातियों को अभिलिखत रेकॉर्ड करने के लिये देश के सम्‍पूर्ण समुद्री तट, वर्षा वनों, अभयारण्‍यों और रेगिस्‍तान को अरेखित करने वाले पहले भारतीय हैं।

सिमटते जा रहे आवास और जलवायु परिवर्तनों को ध्‍यान में रखते हुए इस तरह के कार्य महत्‍वपूर्ण हैं। कुछ वर्षों में तापमान बढ़ने पर, ये प्रजातियां सदैव के लिये लुप्‍त हो सकती हैं। इस तरह के प्रयासों के माध्‍यम से एकत्रित वितरण पद्धतियों के बारे मैं सुचित कर सकते हैं।लगभग 1,314 प्रजातियों के साथ भाररत विश्‍व के 12 विशाल पक्षी विविधता वाले देशों में से एक है। बॉम्‍बे नेचुरल हिस्‍ट्री सोसायटी के अनुसार , विश्‍व के 13 से अधिक पक्षी भारत में पाये जाते हैं।

इनमे से , 150 पक्षी भारत के इतिहास में केवल एक बार या दो बार ही देखे गये हैं।

दलवी ने इस उपलब्धि को 1 जनवरी से 31 दिसम्‍बर 2015 के बीच प्राप्‍त किया था। उन्‍होंने पूर्वोत्‍तर भारत में चार माह व्‍यतीत किये - ''जो भारत की पक्षी विविधता के दो-तिहाई हिस्‍से से समृद्ध क्षेत्र है।''उन्‍होंने यहां कई प्रजातियां देखीं जैसे अरूणाचल के सुदूर पूर्वी हिस्‍सों में लॉर्ड के पैराकिट और गोउल्‍ड की शॉर्टविंग नागालैंड में बर्मीज श्राइक और मणिपुर में चीनी फ्रैंकलिन। कारगिल में, दलवी ने लम्‍बी चोंच वाला बुश वॉर्बलर देखा, जो भारत में 1977 के बाद से नहीं देखा गया था। उन्‍होंने लद्दाख  में तिब्‍बत लार्क और पंजाब में रूफेसवेण्‍टेड प्रिनिया देखा।

दलवी ने एक अन्‍य बड़ा पक्षी अभयारण्‍य अण्‍डमान और निकोबार  पर पाया। उनके द्वारा दर्ज किये गये पक्षी थे: निकोबार जंगल फ्लाईकैचर, सेण्‍ट्ररल निकोबार सर्वेण्‍ट ईगल, आर्कटिक वॉर्बलर आदि । 'पेलाजिक'या 'अपतटीय (ऑफशोर) नामक पक्षियों का एक विशिष्‍ट वर्ग देखने के लिये उन्‍हें केरल और कर्नाटक के समुद्र तटों के आगे भी यात्रा करनी पड़ी। यहां उन्‍होंने स्‍टॉर्म पेटेल्‍स, स्‍कुआस और शीयरवाटर्स को देखा। प्रवासी पक्षियों की सात अद्धुत प्रजातियों की पहचान करने के लिये उन्‍हें राजस्‍थान के मरूभूमि राष्‍ट्रीय उदयान आना पड़ा। इनमें स्‍पॉटेड फ्लाईकैचर, यूरोपीय नइटजार और ग्रेट व्‍हाइट थ्रोट भी शामिल हैं। उन्‍होंने कहा '' मैंने ऐसे कई पक्षी देखे हैं जो ' लुप्‍तप्राय प्रजातियां' ' की सूची में हैं। इस दस्‍तावेजीकरण कें साथ , हम निश्‍चित रूप से उन्‍हें बेहतर तरीके से समझ सकते हैं और वे हमारी यादों में भी रहेंगे।

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