बहुत समय पहले सातवीं शताब्दी में, ईरान के शराणार्थियों से
भरा जहाज दक्षिण गुजरात के तट पर पहुंचा था। संजान के सूर्यवंशी राजा ने अपने मेहमानों काेे खाने
पीने का सामान साथ आने वालों से मिलने के लिए अपना
एक दल भेजा था। उन्होंने नए आने वालों के
लिए एक संकेत के रूप में, किनारे तक भरा दूध का एक जग भी भेजा था। राजा यह स्पष्ट
करना चाहता था कि जैसे जग पूरा किनारे तक भरा हुआ और उसमें कुछ भी अन्य चीज नहीं
रखी जा सकती, इसी प्रकार इस भूमि, पर अधिक लोग नहीं रह सकते। मेहमानों का स्वागत है, उपनिवेशियों का
नहीं।
लेकिन शरणार्थियों को वापस भेजना इतना आसान नहीं था। उनका उत्तर भी इशारों
था। उन्होंने दूध में कुछ चीनी मिला दी और राजा के
लोगों काेे जग वापस दे दिया। उनका भी स्पष्ट संदेश था जैसे चीनी दूध में घुल जाती
है वैसे ही बाहर से आने वाले स्थानीय
लोगों का हिस्सा बन जाएंगे। राजा ने उन्हें स्वीकार कर लिया, और तब से पारसी
भारतीय जीवन का एक हिस्सा बन गये हैं।
ईरान से गुजरात की यात्रा आसान नहीं थी। जहाज भंयकर तूफानों में फंस गया था और
बेघर लोगों की प्रार्थनाओं ने ही उसे बचाये रखा। पारसी जरथुष्टी धर्म के थे, अग्नि के उपासक थे और उन्होंने भगवान जारथस्टरा को वचन दिया था कि यदि वे किनारे पर सुरक्षित रूप से पहुंच
जाते हैं, तो वे एक अग्नि मंदिर - आतिश बेहराम स्थापित करेंगे और वे
जब गुजरात में बस गए, उन्होंने अपना वचन पूरा किया , हालांकि इसमें कई
शताब्दियां लगी।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, दस्तूरों, विद्वान पारसी पुजारियों ने नौमा आसमान –
नवां आकाश से अग्नि लायी थी। लेकिन इससे पहले वे मंदिर स्थापित कर सकें, वहां विनाशकारी
युद्ध हुए। पारसियों ने आक्रमणकारियों से संजान का बचाव बहुत बहादुरी से किया।
हालांकि , उन्हें पूरव की तरफ जाना पड़ा और एक स्थान से दूसरे स्थान
पर विस्थापित होत रहे। 375 वर्षों के बाद पारसियों का एक प्रमुख दल उंटवाड़ा में
बस गया, जहां उन्होंने अग्निी मंदिर का निर्माण किया।
उसके बाद, नौवें स्वर्ग से
संजान तक लायी गयी अग्नि को अग्नि मंदिर में 1742 में स्थापित किया गया था। उसके
बाद कई सदियांं समाप्त हो गयी हैं लेकिन सातवीं शताब्दी से लगायी आग की लौ अभी तक
नहीं बुझी है। पृथ्वी पर पहुंचने के 14 शताब्दीयों बाद आज भी उस मंदिर की ज्वाला
उसी आग से रोशनी प्रदान कर रही है।

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