पवन चक्की से पक्षियों को होने वाले नुकसान
एक अध्ययन के दौरान सामाख्याली में 11 प्रजातियों के पक्षियों के 47 कंकाल मिले हैं, जबकि हरपनहल्ली के पास तीन प्रजातियों के सात पंक्षी कंकाल पाए गए हैं। पवन, अक्षय उर्जा का एक स्त्रोत मानी जाती है। लेकिन, विंड टरबाइन आसपास के क्षेत्रों में पक्षी जीवन के लिए खतरा बनकर उभर रही है। अध्ययन में पता चला कि विंड टरबाइन के ब्लेड से टकराने से पक्षियों की मौत हो रही है।
गुजरात के कच्छ में स्थित सामाख्याली और कर्नाटक के हरपनहल्ली और दावणगेरे में विंड टरबाइन संयंत्रों से घिरा यह क्षेत्र पक्षियों की विविधि प्रजातियों का आवास है, जहां सर्दियों में आर्कटिक, यूरोप और मध्य एशिया से प्रवासी पक्षी भी आते हैं। सामाख्याली पाए गए पक्षी कंकालों में से 43 कंकाल प्रवासी पक्षियों के आगमन के मौसम में मिले हैं। इनमें से अधिकतर कंकाल टरबाइन के 20 मीटर के दायरे पाए गए हैं। टरबाइन से टकराने के कारण कबूतर की प्रजाति ढोर फाख्ता की मौतें सबसे अधिक हुई हैं। हौसिल और कठसारंग जैसे दुर्लभ प्रजाति के पक्षियों के शव भी शोधकर्ताओं को मिले हैं। अध्ययन में शामिल पक्षी विज्ञानी डॉ रमेश कुमार सेल्वाराज के अनुसार आसपास के घास के मैदान चील और बाज जैसे शिकारी पक्षियों की शरणगाह हैं।
इस कारण इन पक्षियों के विंड के ब्लेड से टकराने का खतरा बना रहता हैं। शिकारी पक्षियों की उम्र लंबी होती है और ये बहुत कम अंडे देते हैं, मौते अधिक होने से इन पक्षी प्रजातियों पर लुप्त होने के संकट में वृद्धि हो सकती हैं। अध्ययन क्षेत्र पर्णपाती वनों के करीब हैं, जहां स्थानीय पक्षियों की 115 प्रजातियां पायी जाती हैं। वर्ष 2014-15 के दौरान विंड टरबाइन क्षेत्रों में नौ चरणों में अध्ययन किया गया ।यहां 60 मीटर के दायरे में सात पक्षी कंकाल मिले है, जिसमें से चार कंकाल प्रवासी पक्षियों के आगमन के मौसम में पाए गए हैं। इस अध्ययन से प्रति टरबाइन औसतन 0.5 पक्षियों के मारे जाने का पता चला है।
यह सीमित
डेटा अधिक हो सकता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, पक्षियों की नियमित निगरानी और पवन-चक्की लगाते समय पक्षियों के आवास को ध्यान
में रखते हुए स्थान का चयन करना इस दिशा में महत्वपूर्ण हो सकता है। ऐसा करने से
पक्षियों को विंड टरबाइन के खतरे से बचाया जा सकता हैं। शोधकर्ताओं में रमेश कुमार
सेल्वाराज(बॉम्बे नेचुरल हिस्टी सोसायटी, मुंबई), अनूप वी.आर., राजा जयपाल,और मोहम्मद समसूर अली (सलीम अली पक्षी विज्ञान एवं प्राकृतिक इतिहास केन्द्र, केयबत्तूर) शामिल थे। यह
अध्ययन शोध पत्रिका कंरट साइंस में प्रकाशित किया गया है।

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