मुगल बादशाह जहीरूद्दीन बाबर (भाग-16)
इत्तिफाक से
जिस बावर्ची को वो जहर दिया गया था वो बाबर के डर की वजह से खाने में सही से जहर
नहीं मिला सका । सालन वाली पतीली में जहर डालने की जगह उसने प्याली के अंदर बाबर
के लिये सालन निकाला और उस पर उसने वो जहर छिड़क दिया ऐसा उसने इसलिये भी किया था
बाबर ने अपने नये बावर्चीयों को हुक्म
दिया था कि वो पतीली से सालन निकालकर
हिंदुस्तानी बावर्चीयों को चखाया करें और उसके बाद खुद चखा करेंगे।
मगर नालायक
बावर्चीयों ने प्याली में सालन के बाद निगरानी नहीं की इसके अलावा जिस बावर्ची ने
जहर मिलाया था उसने जहर कुछ रोटियों पर छिड़क दिया था उनके ऊपर कुछ बोटियां रख दीं
और उन बोटियों पर जहर छिड़कना भूल गया। अगर वो उन बोटियों पर भी जहर छिड़क देता
तो बाबर मर जाता ।
इतिहासकार
कहते हैं कि जहर इस्तेमाल करते वक्त बावर्ची घबरा गया था कुछ जहर तो उसने
रोटियों में और सालन में छिड़क दिया और कुछ जहर उससे चूल्हे ही में गिर गया। क्योंकि
जहर डालते वक्त वो कांप रहा था।
इधर जब
जहीरूद्दीन बाबर जुमे की नमाज से फारिग होकर आया और उसके लिये दस्तरख्वान लगाया
गया सबसे पहले उसने सालन में पकी हुई गाजर खाईं उसके बाद उसने कुछ निवाले जहर वाली
प्याली से भी खाए पहले तो उसे कोई चीज बे मजा मालूम नहीं हुई। लेकिन उसके बाद उसने गोश्त की बोटियां खाईं तो उसकी
तबीअत बिगड़ना शुरू हो गई।
उस मौके पर
बाबर ने समझा कि एक दिन पहले उसने सूखा गोश्त पकवाकर खाया था शायद उसी से तबियत
बिगड़ गई इस मौके पर उसे मतली भी महसूस
होने लगी । ये हालत देखकर बाबर सोच में पड़ गया वो इसलिये कि उससे पहले खाना खाकर
उसे कभी ऐसी मतली नहीं हुई थी। इस पर उसे शक हुआ कि जरूर खाने में कुछ है उसने
हुक्म दिया कि बावर्चीयों को हिरासत में ले लिया जाय । साथ ही जो खाना बाबर को
पेश किया गया था वो खाना एक कुत्ते को डाला
दूसरे दिन उस कुत्ते का पेट फूल गया वो ऐसा मदहोश हुआ कि उसे पत्थर मारने
पर भी नहीं उठा। आखिर वो दोपहर को उठ बैठा
और मरने से बच गया इस मौके पर जो खाना जहीरूद्दीन बाबर के लिये पका था उसमें से
उसके दो मुहाफिजों ने भी वो जहर वाला खाना
खा लिया था वो भी मतली करते रहे उनकी हालत
भी बहुत बिगड़ गई थी मगर वो मरने से बच गये थे।
इसके साथ ही
बाबर ने एक सालार को हुक्म दिया कि वो इस
मामले की तफसीश करे जब बावर्ची पर सख्ती की गई जिसने जहर इस्तेमाल किया था तो
उसने सारा हाल एक एक करके बयान कर दिया। बावर्ची से सब कुछ जानने के बाद बाबर ने
अपने सालारों अमीरों वजीरों को अपने पास बुलाया । जब सब जमा हो गये तो बावर्चीयों
के अलावा उन औरतों को भी बुलाया गया जिन्होंने जहर पहुंचाया था जब उसने तफसीश की
गई तो उन्होंने सारी तफ्सील सुना दी।
जब ये बात
साबित हो गई कि इब्राहीम लोधी की मां ने इटावा से एक हलवाई को बुलाया जो उन बावर्चीयों को जानता था जिन्हें बाबर ने
अपने लिये चुना था तब उस अहमद हलवाई को तो उसी वक्त टुकड़े टुकड़े कर दिया गया।
जहां तक उस
बावर्ची की बात है जिसने जहर मिलाया था उसकी खाल खिचवा दी गई।
और जिस
नौकरानी ने जहर पहुंचाया था उसे हाथी के पांव तले कुचलवा दिया गया जबकि इब्राहीम
लोधी की मां को हिरासत में ले लिया गया बाद में उसे काबुल रवाना कर दिया गया वो ये
समझी कि काबुल पहुंचकर उसके साथ बुरा सुलूक किया जायेगा। इसलिये जिस वक्त वो दरिया-ए-
सिंध पार कर रही थी उसने दरिया में कूद कर खुदकुशी कर ली थी।
चित्तौड़ का
राजा राणा सांगा नही चाहता था कि बाबर
हिंदुस्तान में ठहरे वो इस बात पर खुश था
कि बाबर ने इब्राहीम लोधी का हरा दिया और दिल्ली की सल्तनत को तहस नहस कर
दिया अब वो ये चाहता था कि बाबर अपना लश्कर
लेकर हिंदुस्तान से चला जाय ताकि सारे हिंदुस्तान पर उसकी हुकूमत कायम हो
जाय।
राणा सांगा ये
भी जानता था कि अगर उसने बाबर से टकराने में देरी की तो बाबर संभल जायेगा और अपनी
ताकत को बढ़ा लेगा। इसलिये राणा सांगा एक
बड़ा लश्कर लेकर निकला और चित्तौड़ से
उसने बियाना शहर का रूख किया। बियाना से निकलकर मेवात की तरफ बढ़ा यहां से आगरा के
पश्चिम में 37 मील दूर भरतपुर नाम के एक गांव की तरफ बढ़ा । उस वक्त बाबर और
हुमायुं दोनों हिंदुस्तान में दुश्मनों से घिरे हुए थे ये दोनों बाप बेटे के
लिये बड़ा नाजुक मौका था। इसी वक्त बाबर ने शराब पर पांबदी लगा दी थी साथ उसने भी
शराब छोड़ दी थी जितनी शराब उसके पास थी उसने उसे फेंक दिया।
बाबर को जब
खबर हुई कि राणा सांगा एक बहुत बड़े लश्कर के साथ भरतपुर पहुंच चुका है तब वो भी
अपने लश्कर के साथ निकला इतनी देर तक राणा सांगा अपने लश्कर के साथ कुनवा पहुंच
चुका था । इसलिये बाबर ने भी उधर का रूख किया । 16 मार्च 1527 ई. को कुनवा के मकाम
पर दोनों लश्कर आमने सामने हुए इस बार भी जंग के हालात पानीपत के जैसे थे। बाबर
ने अपने बायें तरफ के लश्कर का कमांडर महदी ख्वाजा को बनाया अपने तोपखाने की कमान पहले की तरह निजामुद्दीन
अली खलीफा के सुपुर्द की।
जब जंग शुरू
हुई तो राणा सांगा ने बाबर के लश्कर के दायें और बायें बाजू पर ताबड़तोड़ हमले
शुरू कर दिये लेकिन बाबर और उसके सिपाहियें ने राजपूतों को सख्त जवाब दिया
राजपूतों के लश्कर के अगले हिस्से को लगभग काट के रख दिया था। राजपूतों ने बार बार कोशिश की कि मुगलों के लश्कर
के अंदर घुसकर अपनी जीत को पक्का करें लेकिन राजपूत तो ये सोचते थे कि लड़ाई में
कोई भी कौम उनका मुकाबला नहीं कर सकती । उन्होने महसूस किया जंग के दौरान मुगल
उनके सामने लोहे की दीवार और चट्टानों से भी ज्यादा सख्त साबित हो रहे थे । जहां राजपूत ये इरादा करते थे कि मुगलों के
अंदर घुसकर जंग करें वहां यही खेल मुगलों ने खेलना शुरू कर दिया था और वो राजपूतों
के अंदर घुसकर उनका कत्ल करने लगे थे। यूं 10 घंटे की लगातार और जबर्दस्त जंग के
बाद राणा सांगा के लश्करियों के खिलाफ बाबर को फतह हुई।
इस जंग बारे
में इतिहासकार लिखते हैं बाबर ने जंग के शुरू में सबसे पहले अपनी तोपों को आगे
रखते हुए उनसे गोले दागने शुरू किये दूसरी तरफ राणा सांगा ने मुसलमानों को डराने
के लिये हाथियों को आगे रखा था । लेकिन जब बाबर की तोपें दागी जाने लगीं और गोले
हाथियों को लगने लगे तब हाथी सूखे पत्तों की तरह उड़कर इधर उधर बिखरने लगे इसके
बाद बाबर के तीरदाजों ने राजपूतों पर तीरों की बारिश कर दी थी जिसकी वजह से अनगिनत
राजपूत मारे गये थे।

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