मुगल बादशाह जलालुद्दीन अकबर (भाग-2)
इसी दौरान एक हादसा पेश आया आदिल शाह कुछ बगावतों को दबाने
के लिये ग्वालियार से बाहर था कि उसका बहनोई अहमद खान पंजाब से निकलर ग्वालियार
की तरफ आया जब आदिल शाह को उसके ग्वालियार आने की खबर हुई तब उसने ये सोचा कि
शायद उसका बहनोई अहमद खान सूरी पंजाब के बाद ग्वालियार पर भी कब्जा करना चाहता
है। इसलिये वो बड़ी तेजी से ग्वालियार की तरफ बढ़ा उसने इरादा किया था कि ग्वालियार
पहुंचते ही वो अहमद खान को मौत के घाट उतार देगा या उसे आंखों से अंधा कर देगा
दूसरी तरफ अहमद खान सूरी की बदकिस्मती कि
जब वो पंजाब से ग्वालियार की तरफ गया तो उसकी गैर मौजूदगी में उसके बहुतसे इलाकों
पर आगरा और देहली के हुक्मरान इब्राहीम सूरी ने कब्जा कर लिया। अहमद खान सूरी को जब ये खबर हुई कि आदिल शाह
सूरी उस पर हमला करने के लिये आ रहा है तब वो ग्वालियार से भाग खड़ा हुआ। उस वक्त
उसके साथ चार हजार सिपाहीयों का एक छोटा लश्कर था और उन चार हजार सिपाहियों के
साथ उसने देहली का रूख किया और देहली के हुक्मरां इब्राहीम सूरी से पंजाब उसके
हवाले करने की दरख्वास्त की।
इब्राहीम सूरी ने जब ऐसा करने से मना कर दिया तब अहमद खान
सूरी और इब्राहीम खान सूरी के बीच जंग शुरू हो गई ।1555ई. में आगरा के उत्तर में
करीब आठारह मील की दूरी पर अहमद खान सूरी और इब्राहीम सूरी के बीच जंग हुई इस जंग
में अहमद खान सूरी ने इब्राहीम खान सूरी को शिकस्त दी । शिकस्त उठाकर इब्राहीम
सूरी ‘’ सांभल’’ के इलाके की
तरफ भाग गया। इब्राहीम खान सूरी के बहुत से सिपाही अहमद खान सूरी के साथ मिल गये ।
इस तरह अहमद खान सूरी ने देहली और आगरा पर कब्जा कर लिया । देहली पर कब्जा करने
के बाद अहमद खान ने अपना नाम बदलकर उसने अपना नाम सिकंदर शाह रखा और अपने नाम के
सिक्के जारी कर दिये मस्जिदों में अपने नाम का खुत्बा पढ़ने का हुक्म जारी कर
दिया।
ये हालात उस वक्त थे जब हुमायुं ईरान से निकलकर काबुल पर
कब्जा कर चुका था और काबुल उसकी हुकूमत में था
अब हिंदुस्तान में हाल ये था कि ग्वालियार पूरब में जोनपुर के इलाकों पर
आदिल शाह हुकूमत कर रहा था। देहली के
अलावा पंजाब में रहतास तक के इलाकों पर सिकंदर शाह सूरी की हुकूमत थी। जबकि हमालय
की ढलानों से लेकर पंजाब के जिले गुजरात तक इब्राहीम शाह सूरी हुकूमत कर रहा था।
हिंदुस्तान के हालात को देखते हुए हुमायुं ने फिर हिंदुस्तान
पर अपनी हुकूमत कायम करने का इरादा कर लिया। वो अपने लश्कर के साथ काबुल से निकला
और पिशावर की तरफ बढ़ा। उसके साथ उसका बेहतरीन सालार बेरम खान भी था। दरिया-ए-
सिंध पार करने के बाद हुमायुं और बेरम खान अपने लश्कर के साथ पंजाब के शहर ‘’ गकहण’’ पहुंचे उसके बाद हुमायुं लाहौर की तरफ बढ़ा देहली का हुक्मरां सिंकदर
सूरी अभी तक अपने लश्कर के साथ हुमायुं की राह रोकने के लिये नहीं निकला था।
इसलिये हुमायुं ने लाहौर पर कब्जा कर लिया और उसने आगे बढ़कर जालंधर, सरहिंद, हिसार के इलाकों पर बगैर रोक टोक के कब्जा
कर लिया था।
हुमायुं सरहिंद के मकाम पर अपने लश्कर के साथ ठहरा हुआ था
कि सिकंदर शाह सूरी ने उसका मुकाबला करने का इरादा किया। इसके लिये वो अपने 30
हजार घुड़सवारों के साथ उसने हुमायुं का रूख किया। जब सिकंदर शाह लश्कर लेकर
सरहिंद पहुंचा तो उसे पता चला कि हुमायुं के लश्कर जालंधर में जमा हो रहे थे
इसलिये उसने जालंधर का रूख किया। सिकंदर शाह ने अपने सिपाहियों को हुक्म दिया कि
हुमायुं और उसके सिपाहियों को दरिया-ए- सतलज पार न करने दिया जाए और दरिया-ए- सतलज
के इस पार ही उनपर हमला करके उनका खात्मा कर दिया जाये लेकिन हुमायुं बड़ी तेजी से आगे बढ़ा था और सिकंदर शाह के लश्कर के पहुंचने से पहले ही
वो दरिया-ए- सतलज पार कर चुका था।
दरिया-ए- सतलज के पास हुमायुं और सिकंदर शाह के बीच होलनाक
जंग हुई हुमायुं के सिपाहियों ने सिकंदर शाह के लश्कर पर इस कदर परों के जलते हुए
तीर फेंके कि सिकंदर शाह की फौज को बदतरीन शिकस्त हुई और भाग खड़े हुए।
इस तरह दरिया-ए- सतलज
के किनारे हुमायुं के लश्कर को जीत हासिल हुई । इस फतह के बाद हमायुं का
सालार बेरम खान सरहिंद शहर की तरफ बढ़ा और वहां किले की दीवारों को मजबूत करना शुरू कर दिया था।
जिस वक्त दरिया-ए- सतलज के किनारे हुमायुं और सिकंदर शाह
की फौजों के बीच जंग हुई थी उस वक्त हुमायुं लाहौर में ठहरा हुआ था जब उसे इस फतह
की खबर दी गई तो उसने फतह का जश्न मनाने का हुक्म दिया।
हुमायुं ने अपने लश्कर के साथ देहली का रूख किया सिकंदर एक
बार फिर लगभग 80 हजार का लश्कर लेकर हुमायुं के सामने आया कुछ इतिहासकार कहते हैं
कि उसके लश्कर एक लाख के करीब बताते हैं लेकिन हुमायुं ने फिर उसे शिकस्त दी और
सिकंदर शाह शिकस्त उठाकर हिमालय के पहाड़ों की तरफ चला गया।
उस फतह के बाद हुमायुं शहंशाह की हैसियत से देहली में दाखिल
हुआ तो उसके सालारों में मतभेद पैदा हो गये हर कोई ये समझने लगा कि इस फतह का
सेहरा उसके सर होना चाहिये। हर कोई ये ख्याल करने लगा कि सिकंदर शाह को शिकस्त
देने के बदले में उन्हें बड़े बड़े इनआमात से नवाजा जायेगा। हुमायुं ने जब ये सूरत –ए- हाल देखी तो उसने उन
सारे खिताबात से अपने बेटे अकबर को नवाजा जिसकी उम्र उस वक्त सिर्फ 13 साल थी। और
उसने उन जंगों में बहतरीन कारनामे दिखाए थे। हुमायुं के इस रवैये से कुछ सालार
उसके मुखालिफ हो गये और बगावत पर उतर आये।
हुमायुं ने अपने दूसरे सालारों को बगावत दबाने के लिये
रवाना किया खुद देहली में ही रूका रहा लेकिन बदकिस्मती से उसे देहली फतह करने के
बाद ज्यादा वक्त तक वहां रहना नसीब नहीं हुआ। 24 जनवरी1556 ई. को वो दूसरी मंजिल पर अपने कुतुब खाने की सीढि़या उतर रहा था कि मगरिब की
आजान सुनाई दी। आजान सुनकर आजान के एहतिराम में वो सीढि़यों पर ही बैठ गया आजान
खत्म हुई तो नीचे उतरने लगा। कहते हैं उस वक्त उसके हाथ में छड़ी थी अचानक छड़ी
उसके हाथ से छूट कर जमीन पर गिर गई उसके कपड़े पांव में फंस गये जिसकी की वजह से
वो सीढि़यों से नीचे गिर पड़ा । इस तरह 26 जनवरी को हुमायुं ने वफात पाई।
अपनी वफात के कुछ दिन पहले अपने सालार बेरम खान और अपने
बेटे अकबर को हुमायुं ने सिकंदर शाह पर हमला करने के लिये रवाना किया था जो हिमालय
के ढलानों से निकलकर पंजाब में दाखिल हो चुका था । बेरम खान और अकबर ने उस वक्त
कलानोर के मकाम पर अपने लश्कर के साथ पड़ाव किया हुआ था कि उन्हें हुमायुं के मरने
की खबर मिली ।बेरम खान अकबर का उस्ताद भी था इसलिये उसने कलानोर में ही अकबर की
बादशाह का ऐलान कर दिया । बेरम खान अकबर का उस्ताद तो पहले ही था अब अकबर ने तमाम
जिम्मेदारियां बेरम खान के सुपुर्द कर दीं थीं। हुमायुं के मरने के बाद जिस वक्त
बेरम खान और अकबर दोनों कलानोर के मकाम पर अपने लश्कर के साथ ठहरे हुए थे उनकी
गैर मौजूदगी में सबसे पहले ग्वालियार के हुक्मरां आदिल शाह सूरी ने फायदा उठाने का इरादा किया।
आदिल शाह सूरी ने अपने भांजे को कत्ल करने के बाद हुकूमत
पर कब्जा किया था उसकी इस हरकत की वजह से अफगान सालार उसे अच्छा न समझते थे साथ
ही आदिल शाह सूरी भी अफगान सालारों पर भरोसा नहीं करता था। इसलिये उसने एक हिंदू
हेमू बक्काल को अपना वजीर मुकर्रर किया था।
ये हेमू बक्काल रेवाड़ी का रहने वाला था। आदिल शाह सूरी ने
हेमू बक्काल को एक बहुत बड़ा लश्कर दिया और उसे देहली पर कब्जा करने के लिये
रवाना कर दिया। दूसरी तरफ हेमू बक्काल
आदिल शाह सूरी का भी वफादार नहीं था। बल्कि वो एक ऐसे मौके की तलाश में था
कि मुगलों के अलावा आदिल शाह सूरी का भी खात्मा करके वो अपनी हुकूमत कायम करना
चाहता था हिंदुस्तान में एक बार फिर वो हिंदू हुकूमत कायम करने का ख्वाब देख रहा
था।

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