मुगल बादशाह जलालुद्दीन अकबर (भाग-4)
बेरम खान ने तीसरी गल्ती ये की कि उसने अपने एक मिलने वाले
ईरानी शेख गदाई को अकबर से मश्वरा किये बगैर सल्तनत
में बड़ा ओहदा दे दिया। उसकी इस हरकत ने भी दुश्मनों को अकबर के कान भरने का मौका
दे दिया था।
बेरम खान से चौथी गल्ती ये हुई कि शाही महल के बहुत से
नौकर भी उसके खिलाफ हो गये इसलिये कि बेरम खान ने अपने पसंदीदा आदमीयों को फायदा
पहुंचाना शुरू कर दिया था। वो बादशाह के नौकरों को मामूली से मामूली बात पर भी
सजाएं देता । लेकिन उसके नौकर बड़े से बड़ा जुर्म भी करते तो वो उन्हें माफ कर
देता ।
बेरम खान को जब इन हालात की खबर हुई तो उसके साथियों ने
बेरम खान को मश्वरा दिया कि उसके खिलाफ शाजिश तैयार हो रही है इसलिये वो खुद
कार्यवाही करके अकबर को कत्ल कर दे लेकिन बेरम खान ने ऐसा नहीं किया।
दूसरी तरफ बेरम खान की तरफ से अकबर के दिल में शक बढ़ने लगा था जिस वक्त बेरम खान लश्कर के
एक हिस्से के साथ पंजाब में ठहरा हुआ था अकबर ने अपने दूसरे सालार पीर मोहम्मद
को एक लश्कर देकर बेरम खान की तरफ रवाना किया
ये वही पीर मोहम्मद था जिसे बेरम खान ने जेल में डाल दिया था।
बेरम खान ने इसे अपनी बे इज्जती समझा कि पीर मोहम्मद उसकी
तरफ रवाना किया जा रहा है ताकि वो उस पर निगाह रख सके। इस पर बेरम खान अपना लश्कर
लेकर जालंधर के पास पहुंचा पीर मोहम्मद और बेरम खान के बीच हौलनाक जंग हुई जिसमें
बेरम खान को शिकस्त हुई।
बेरम खान को पकड़कर अकबर के सामने पेश किया गया । अकबर ने
उसे माफ कर दिया उसके बाद उसे मक्का जाने की अजाजत दे दी।
मक्का जाने के लिये जब बेरम खान रवाना हुआ तो रास्ते में
एक अफगानी ने उस पर हमला करके उसे कत्ल कर दिया। उसकी बीवी सलीमा बेगम और चार साल
के बेटे अब्दुर्रहीम खान को अकबर के पास पहुंचा दिया गया। सलीमा बेगम से अकबर ने शादी कर ली जबकि चार साल के
अब्दुर्रहीम की परवरिश शाही महल में हुई । यही अब्दुर्रहीम आगे चलकर शहंशाह अकबर
के नौ रत्नों में शामिल हुआ और खान ए खाना का खिताब दिया गया था।
अकबर और बेरम खान के बीच इख्तिलाफ पैदा करने में एक शख्स
माहम व उसकी बीवी और बेटे अधम खान ने बड़ा किरदार निभाया था । अधम अकबर की दाई का
बेटा था वो अकबर को दूध पिलाने वाली मां भी थी उसे अतका भी कहा जाता है इस तरह
बेरम खान का खात्मा कराने के बाद अधम खान ने चापलूसी से काम लेते हुए अकबर की
निगाह में इज्जत व एहतराम हासिल कर लिया था।
बेरम खान के मरने के बाद सबसे बड़ा हादसा ये हुआ कि ग्वालियार
के हाकिम आदिल शाह के बेटे शेर खान ने अफगानों की इज्जत को बहाल करने की कोशिश की। ये शेर शाह सूरी का रिश्तेदार था
इसलिये शेर खान 40
हजार सवारों के साथ जोनपुर शहर की तरफ बढ़ा ताकि मुगलों से वो शहर छीनकर अपने कब्जे
में ले ।
अकबर को जब पता चला कि शेर खान 40 हजार के लश्कर के साथ
जोनपुर पर हमला करने के लिए आ रहा है तो उसने अपने एक अजबक सालार खान जमान को शेर
खान का मुकाबला करने के लिए रवाना किया । खान जमान बहुत बहादुर था उसके पास सिर्फ
12 हजार का लश्कर था लेकिन वो शेर खान के 40 हजार के लश्कर के सामने जम गया।
दोनों लश्करों के बीच जंग हुई इसमें खान जमान ने अपने 12 हजार सिपाहियों के साथ
शेर खान के 40 हजार के लश्कर को बदतरीन शिकस्त दी इस लड़ाई में खान जमान के साथ उसका भाई बहादुर
खान भी उसके साथ था और उसने ने भी इस जंग में बहादुरी का मुजाहिरा किया था। उन
दोनों भाईयों ने जब सिर्फ 12 हजार के लश्कर
के साथा 40 हजार के लश्कर को शिकस्त
दी तो लोगों की निगाह में दोनों भाईयों की
इज्जत और एहतिराम बढ़ गया।
खान जमान और बहादुर
खान दोनों भाईयों की इस काम्याबी के बाद अकबर आगरा शहर से निकलकर ख्वाजा
मुईनुद्दीन चिश्ती (रह.) के दरबार में हाजिरी देने के लिए रवाना हुआ । जब वो
जयपुर के इलाके संभल में पहुंचा तो वहां के राजा भारमल ने अकबर का बेहतरीन अंदाज
में इस्तकबाल किया बल्कि राजा भारमल ने उस ख्वाहिश का इजहार भी किया कि अकबर
उसकी खूबसूरत बेटी जोधा बाई से शादी कर ले।
अकबर ने इस पेशकश को कुबूल कर लिया । पहले वो अजमेर गया।
वापसी पर सांभल के मकाम पर राजा भारमल ने अपनी खूबसूरत बेटी जोधा बाई को अकबर के
साथ ब्याह दिया । राजा भारमल की बेटी से
शादी करने के बाद अकबर ने राजा भारमल को एक सालार की हैसियत से अपने लश्कर में
शामिल कर लिया और उसके बेटे भगवान दास को भी सालार का ओहदा दे दिया। उसके अलावा
भगवान दास के भतीजे और मुंह बोले बेटे राजा मान सिंह को भी अकबर ने अपने लश्कर में
आला ओहदे पर तैनात कर दिया था।
सांभल के राजा भारमल की बेटी से अकबर का बेटा शहजादा सलीम
पैदा हुआ जो बाद में जहांगीर के नाम से
हिंदुस्तान का शहंशाह बना । जहांगीर की शादी भी राजा भगवान दास की बेटी से उस वक्त
हुई जब जहांगीर की उम्र सिर्फ पंद्रह साल थी।
अब अकबर ने धीरे धीरे अपनी सल्तनत को बढ़ाने का इरादा कर
लिया था। उससे पहले उसने मेरठ के किले को अपनी सल्तनत में शामिल करना चाहा मेरठ का किला जोधपुर रियासत में शामिल था और
यहां का राजा मालदेव था। उसके दो बेहतरीन सालार थे जो जंग का बेहतरीन तजुर्बा रखते
थे उनमें से एक का नाम जगमल और दसरे का नाम देवंद दास था। अकबर ने अपना एक लश्कर
राजा मालदेव पर हमला करने के लिये रवाना किया उस लश्कर ने मेरठ नाम के किले का
मुहासरा कर लिया और किले की दीवार को गिराने के लिये बारूद भरकर दीवार को उड़ाने का
इंतिजाम शुरू कर दिये।
मुसलमानों का लश्कर किले की दीवार के पास बारूद भरकर आग
लगाने और दीवार के एक हिस्से को तबाह करने में काम्याब हो गया ।इस तरह शहर की
दीवार के अंदर एक रास्ता बन गया।
उस रास्ते पर मुगलों और राजपूतों के बीच जंग हुई । आखिर जब
लड़ते लड़ते शाम हो गई तो मुगल पीछे हट गये । राजपूत शहर के अंदर चले गये। लेकिन
राजपूतों ने ये अंदाजा लगा लिया कि मुगल शहर को फतह किये बगैर नहीं जायेंगे ।
इसलिये उन्होंने मुगलों से समझौते की दरख्वास्त की ।
मुगलों के लश्कर का सालार उस वक्त मिर्जा अशरफ था। उसने समझौते के लिए ये शर्त
लगाई कि शहर के बड़े लोग सिर्फ अपनी सवारी के घोड़ों के अलावा कोई चीज अपने साथ
किले से बाहर न ले जायें।
उन लोगों ने ये शर्त मान ली और लोग किले से निकलकर अपने
अपने ठिकानों को जाने लगे लेकिन राजा मालदेव और उसके सालारों ने इस शर्त को मानने
से इंकार कर दिया और अपने लश्कर के साथ मुगलों पर हमला कर दिया।
दूसरी तरफ अकबर के लश्कर के सालार मिर्जा अशरफ को भी खबर
हो गई थी कि राजा मालदेव का सालार देवंददास मुसलमानों पर हमला करना चाहता है वो भी
मुकाबला करने के लिए बिल्कुल तैयार था । देवंद दास ने जब शहर से निकलर मुसलमानों पर हमला किया तब
मिर्जा अशरफ ने पूरी ताकत से हमले को रोका
उसके बाद जवाबी कार्यवाही करते हुए उसने देवंद दास के लश्कर को काटना
मारना शुरू कर दिया मुगलों ने देवंद दास के आधे लश्कर को काट कर रख दिया बाकी
अपनी जान बचाकर भाग गये । इस लड़ाई में देवंद दास भी बुरी तरह जख्मी हुआ और उसी
हालत में मर गया । इस तरह अकबर के लश्कर ने जोधपुर के किले मेरठ पर कब्जा कर
लिया था ।

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