मुगल बादशाह जलालुुुुुद्दीन अकबर (भाग-7)
दूसरी तरफ अब्दुल्लाह अजबक को जब खबर हुई कि अकबर को उसके
खिलाफ कर दिया गया है और अकबर एक लश्कर लेकर उसकी तरफ आ रहा है तब भी अब्दुल्लाह
अकबर से टकराना नहीं चाहता था । उसने इरादा किया कि वो बचकर गुजरात की तरफ भाग
जाएगा । अब्दुल्लाह जब लवानी पहुंचा तो अकबर से उसका सामना हो गया । अकबर ने उस
पर हमला कर दिया लेकिन अब्दुल्लाह किसी तरह जान बचाकर गुजरात भाग गया इस तरह
अकबर ने आगे बढ़कर अपने लश्कर के साथ मांडू के मकाम पर कयाम किया और मालवा का इंतिजाम
अपने हाथ में ले लिया।
यहां अकबर को पता चला कि खानदेश का हुक्मरां मुबारक शाह की
एक बेटी है जो बहुत ही खूबसूरत है । अकबर ने उसके नाम एक पैगाम भेजा कि वो अपनी
बेटी की शादी अकबर से कर दे। खानदेश का हुक्मरां मुबारक शाह इस पर राजी हो गया और
अपनी बेटी को अकबर के निकाह में दे दिया।
उसके बाद अकबर आगरा की तरफ लौट आया उसने आगरा के किले को नये
तरीके से बनाने का इरादा किया उसने हुक्म दिया कि पुरानी ईंटों के इस किले को
गिराकर नया किला बनाया जाए किले को बनाने में बड़े बड़े मजबूत पत्थरों का इस्तेमाल
किया जाय।
अकबर के हुक्म पर आगरा के किले का काम शुरू हुआ ये काम
लगभग पंद्राह साल तक बराबर जारी रहा और उस पर करोडों की रकम खर्च हुई । कुछ लोगों
का कहना है कि अकबर ने आगरा में 500 से ज्यादा इमारतें बनवाई । उन इमारतों के
नमूने बंगाल और गुजरात की इमारतों के मुताबिक बनाय गये और बहुत से माहिर कारीगर
अलग अलग जगहों से बुलाए गये थे पुराना आगरा शहर जो लोधियों के जमाने में बड़ी
अहमियत रखता था वो दरिया के दूसरे किनारे
पर था।
अकबर ने नया आगरा दरिया के दाएं किनारे बनाना शुरू किया।
बाद में शाहजहां ने उसका नाम बदलकर अकबराबाद रख दिया ताकि उसके दादा के नाम पर ये
शहर आबाद रहे।
उसके अलावा अकबर ने उन्हीं दिनों आगरा से लगभग सात मील
दक्षिण में ककड़ाली के मकाम पर एक नया महल और शिकार गाह बनाने का हुक्म दिया । साथ ही उसने अपने दरबारियों को महल से बाहर
अपने रहने के मकान और बाग बनाने की इजाजत दे दी थी इस जगह को उसने नगर छाएं का
नाम दिया था। ये महल आम तौर पर अकबर के
कबूतरबाजी या चोगान खेलने के लिए इस्तेमाल होता था । ये नगर छांव उस वक्त वीरान
होना शुरू हो गया । जब अकबर ने आगरा शहर की बजाय दूसरे शहर फतहपुर सीकरी को ज्यादा
अहमियत देना शुरू कर दी थी।
जिस वक्त अकबर आगरा में नई नई इमारतें बनवा रहा था उन्हीं
दिनों बिहार में अनगिनत अफगानों ने मुगलों के खिलाफ बगावत खड़ी कर दी । अकबर को जब
इस बगावत की खबर हुई तो उसने जोनपुर के अपने हाकिम खान जमान को अफगानों पर हमला
करके बगावत दबाने का हुक्म दिया। खान जमान छोटा सा लश्कर लेकर अफगानों की बगावत
को दबाने के लिए निकला लेकिन अफगानों के पास जाकर उसे पता चला कि अफगानों के
मुकाबले में उसका लश्कर बहुत छोटा है इसलिए उनके खिलाफ जीत की उम्मीद कम ही है
इस पर वो अफगानों पर हमला करने से हिचकिचाने लगा।
खान जमान चाहता था कि किसी न किसी तरह अफगानों की अकबर के
साथ बात हो जाये और समझौते का कोई रास्ता निकल आए और जंग की नौबत न आये। लेकिन
अफगानों ने अपनी तरफ से हमले की शुरूआत कर दी वो खान जमान के लश्कर पर रात में
अचानक टूट पड़े रात के वक्त खान जमान को उस हमले की उम्मीद नहीं थी इसलिए वो
अपना पड़ाव छोड़कर एक तरफ हट गया।
अफगानों का कमाण्डर उस वक्त हसन खान था । जब अफगानों ने अचानक खान जमान पर
हमला करके उसे नुकसान पहुंचाया और उसे भाग जाने पर मजबूर किया तब खान जमान ने भी
उनसे बदला लेने का इरादा कर लिया। वो अपने छोटे से लश्कर के साथ एक जगह घात लगाकर
बैठ गया। जब अफगानों का सालार हसन खान वहां से गुजरने लगा तब घात से निकलकर खान
जमान ने हसन खान और उसके साथियों पर हमला कर दिया। हसन खान जिस हाथी पर सवार था
उसे मार गिराया। अफगान सिपाहियों ने जब ये देखा कि उनका सालार अपने हाथी से गिर
गया है और हमला करने वाले उसके हाथी पर हमला करके उसे भी खत्म कर चुके हैं तो
उकसे लश्कर में भगदड़ मच गई ।
इसी बीच अफगानों की बदकिस्मी कि उनके पड़ाव में एक हाथी
जंजीर तोड़कर भागने में काम्याब हो गया । उस हाथी ने मैदान में एक और हाथी को भी
मार डाला अचानक बदलते हुए हालात को देखकर अफगानों को ये गलत फहमी हो गई कि ये जो
हाथी इधर उधर दौड़ते फिर रहे हैं और उनका सालार हसन खान भी हाथी से गिर गया है तो
उन्हें शिकस्त हो चुकी हैं इसलिए ये खबर पूरे लश्कर में फैल गई और अफगानों में
भगदड़ मच गई और अफगान भाग खड़े हुए उसके
बाद खान जमान ने पूरी ताकत से अफगानों पर हमला कर दिया और उन्हें पीसकर रख दिया
उसके बाद खान जमान जोनपुर की तरफ रवाना हो गया था।
जोनपुर पहुंचकर खान जमान ने भी अकबर के खिलाफ बगावत करने का
इरादा कर लिया उसके लिए जोनपुर में ये खबर पहुंच गई कि अकबर ने मालवा के अजबक हुक्मरान
अब्दुल्लाह पर हमला किया जिससे बचकर अब्दुल्लाह गुजरात की तरफ भाग गया है।
खान जमान के अलावा और बहुत से सालार अजबक थे इसलिए उन्हें
अकबर के रवैये पर बड़ा दुख: हुआ कि उसने अब्दुल्लाह पर हमला किया और उसे मालवा की
हुकूमत से महरूम करके उसे बेबसी की हालत में गुजरात की तरफ भाग जाने पर मजबूर किया
।
अजबको ने बहुत ही वफादारी और ईमानदारी के साथ मुगलों की सल्तनत
को मजबूत बनाने के लिए काम किया था इसके अलावा वो जांबाजी से अकबर का भी साथ दे
रहे थे । उन्होंने मुगल सल्तनत के कायम करने बहुत बड़ी खिदमत की थी वो सारे अजबक
जो उस वक्त अकबर के लश्कर में शामिल थे वो अपने आपको एक खानदान मानते थे वो
मुगलों की सल्तनत में पूरवी हिस्सों में आबाद थे।
अजबक सरदारों में जोनपुर का हाकिम खान जमान अजबकों में खास
मकाम रखता था उसके अलावा पास के इलाके में उसका भाई बहादुर खान हाकिम था और उन
दोनों का चाचा इब्राहीम खान जोनपुर के उत्तर में सरहरपुर के इलाकों का जिम्मेदार
था। उन्हीं का एक रिश्तेदार अजीज सिकंदर खान था जो उस वक्त अयोध्या का हाकिम
था। बेरम खान के बाद अकबर की सल्तनत को अगर किसी ने मजबूत किया था तो वो अजबक ही
थे।
अजबकों को पहले ये शिकायत थी कि उन्हें उनकी खिदमत का इनआम
नहीं दिया गया। जबकि उनके मुकाबले में ईरानीयों ने अकबर की हुकूमत के लिए कुछ नहीं
किया लेकिन अकबर ईरानीयों को उनके मुकाबले में ज्यादा इनआमात देता था। अजबकों को
ये भी शिकायत थी कि उन्हें पूरव में तैनात करके हर वक्त मुश्किल हालात में उलझा
दिया गया है कि वो बड़े ओहदों से दूर रहें उनके दूर होने की वजह से सल्तनत में
बड़े ओहदे उन लोगों मिलने लगे जिन्होंने मुगलों की हुकूमत मजबूत करने में कोई
कारनामा अंजाम नहीं दिया था। अब जब मालवा के हाकिम अब्दुल्लाह पर हमला करके अकबर
ने उसे गुजरात की तरफ भाग जाने पर मजबूर कर दिया तब अजबकों ने उससे ये हल निकाला
कि अकबर उनके पूरे कबीले के खिलाफ हो गया है इसलिए इजबकों ने भी फैसला कर लिया कि
वो अकबर से अलग कुछ इलाकों पर हुकूमत करेंगे।
अब अजबकों ने यें मंसूबा बनाया कि सिकंदर और खान जमान का
चाचा इब्राहीम कन्नौज की तरफ चला जाय । जबकि खुद खान जमान और उसका भाई बहादुर
खान मानकपुर पर हमला करके उन इलाकों पर
कब्जा करके अपनी हालत मजबूत बना ली जा।

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