मुगल बादशाह जलालुद्दीन अकबर (भाग-8)
ये फैसला करने के बाद इब्राहीम और सिकंदर बड़ी तेजी से कन्नौज
की तरफ बढ़े । रास्ते में उनका सामना अकबर के लश्कर से हुआ लेकिन इब्राहीम और
सिकंदर ने हमला करके अकबर के लश्कर को शिकस्त दी और भागने पर मजबूर कर दिया।
दूसरी तरफ खान जमान और बहादुर खान ने मानकपुर पर हमला कर दिया और मानकपुर का
मुहासरा कर लिया मानकपुर में उन दिनों अकबर की तरफ से मजनून खान हाकिम था।
जब अकबर को अजबकों की इस कार्यावाही की खबर मिली तो उसने
अपने एक सालार मुनअम खान को एक बड़ा लश्कर देकर
24 मई 1565 ई. को आगरा से कन्नौज की तरफ रवाना किया । इस लश्कर की रफ्तार
बहुत सुस्त थी इसलिए कि गर्मी की वजह से लश्कर सिर्फ रात के वक्त सफर कर सकता था।
अकबर को जब इस बात की खबर मिली कि गर्मी की वजह से मुनअम
खान के आगे बढ़ने की रफ्तार बहुत सुस्त है और इब्राहीम और सिकंदर कन्नौज के रास्ते
पर बड़ी तेजी से बढ़कर लखनऊ पर कब्जा करना चाहते हैं तब अकबर को बड़ा गुस्सा
आया।
एक लश्कर लेकर वो निकला और बड़ी तेजी से वो लखनऊ की तरफ
बढ़ा था। अकबर ने इतनी तेजी से ये सफर किया कि गंगा नदी पार करके वो लखनऊ और कन्नौज
के बीच 70 मील का फासला सिर्फ दो रातों और एक दिन में पूरा करने के बाद इब्राहीम
और सिकंदर के सर पर पहुंच गया।
अकबर के इस तरह अचानक आने पर सिकंदर और इब्राहीम हैरतजदा हो
गये । वो इसलिए कि अकबर के पास बहुत बड़ा लश्कर था सिकंदर और इब्राहीम ने अंदाजा
लगा लिया था कि वो अकबर का मुकाबला नहीं कर सकते । इसलिए दोनों बगैर लड़े भाग खड़े
हुए और खान जमान से जा मिले जिसने मानपुर पर हमला करना था। अकबर ने आगे बढ़कर लखनऊ
पर कब्जा कर लिया । वो वहां अपने लश्कर के साथ रूका। खान जमान को जब ये खबर मिली
कि अकबर खुद एक बहुत बड़े लश्कर के साथ लखनऊ पहुंच गया है तब उसने भी मानकपुर
जाने का इरादा छोड़ दिया ।
खान जमान खुद भी परेशान हो गया था कि अकबर किसी भी वक्त उस
पर हमला करके उनके सारे इरादों को खाक में मिला सकता है। इसलिए इब्राहीम खान और
सिकंदर खान और अपने भाई बहादुर खान और खुद अपने लश्कर के साथ खान जमान ने अब गंगा
नदी के साथ साथ उत्तर पूरब के वीरान इलाकों का रूख किया वहां जाकर उसने पनाह ली।
दूसरी तरफ अकबर अपने सालार मुनअम खान के वहां पहुंचने का
इंतिजार कर रहा था आखिर उसका दूसरा लश्कर भी उसके पास पहुंच गया जो मुनअम खान की
कमाण्डरी में था। दूसरी तरफ एक और सालार भी अपना लश्कर लेकर वहां पहुंच गया
जिसका नाम आसफ खान था यही वो आसफ खान था जिसने रानी दुर्गावती को शिकस्त दी थी ।
हालांकि आसफ खान के खिलाफ अकबर को बड़े शिकवे गिले थे कि रानी को शिकस्त देने के
बाद उसने काफी माल दौलत और हाथियों को उसकी तरफ नहीं भेजा था। लेकिन इस मौके पर
अकबर ने उससे पूछताछ नहीं की इसलिए कि उसके सामने एक ही मकसद था कि अजबकों को किस
तरह काबू में किया जाय । दूसरी तरफ खान जमान अपने सारे साथी सालारों के साथ बड़ी
तेजी से सफर करता हुआ आगे बढ़ता रहा और हाजीपुर के पास जाकर उसने पड़ाव किया वहां
उसने बंगाल के हाकिम सुलेमान खान से मुलाकात के लिए पैगाम भिजवाया कि वो उसकी मदद करे ।इस बीच अकबर को जब खबर हुई कि
अजबकों ने बंगाल के हाकिम सुलेमान से राब्ता किया है और उससे मदद हासिल करना
चाहते हैं
वो उससे मदद हासिल करना चाहते हैं । अकबर को फिक्र हुई कि
अगर बंगाल के हाकिम सुलेमान ने भी उन लोगों का साथ देना शुरू कर दिया तो फिर बगावत
को खत्म करना बहुत मुश्किल हो जायगा।
इसलिए उसने अपने कासिद सुलेमान की तरफ रवाना किये और उससे कहा कि वो किसी भी हाल में उन बागियों की
मदद न करे।
लेकिन अकबर के कासिद को रास्ते में ही खान जमान ने रोक
लिया अकबर को जब इसकी खबर हुई तो उसने अपना एक कासिद उड़ीसा के राजा कमंद देव के
पास भेजा और उसे कहला भेजा कि बंगाल का हाकिम उसके बागियों की मदद करे तो उड़ीसा
का राजा कमंद देव सुलेमान पर हमला कर दे। इस तरह सुलेमान बागियों की मदद नहीं
करेगा। साथ ही उसने अकबर के कासिद के हाथ कुछ और कीमती तोहफे भी भेजे।
अब लखनऊ से अकबर अपने लश्कर के साथ निकला और बड़ी तेजी से
आगे बढ़ता हुआ वो घाघरा नदी के किनारे पहुंचा
और घाघरा नदी के दक्षिणी किनारे उसने अपने लश्कर के साथ पड़ाव किया जबकि
दूसरी तरफ खान जमान अपने साथियों और सिपाहियों के साथ पड़ाव किये हुआ था।
घाघरा नदी के किनारे
पहुंचकर अकबर ने अपने सालारों के जिम्मे ये काम लगाया कि अजबकों की पूरी
तरह से नाकाबंदी कर दें ताकि वो बगावत करने पर तैयार हो जायें साथ ही खुद अकबर
घाघरा से निकलकर इलाहाबाद में जाकर रूक गया। खान जमान को ये देखकर बड़ी मायूसी हुई
कि उसे अपनी कार्यवाहीयों में कोई काम्याबी दिखाई नहीं दे रही अब उसने अकबर के वजीर मुनअम खान के नाम एक
पैगाम भेजा कि वो अकबर से उनकी बात करवाकर उनको माफी दिलवा दे।
ये पैगाम जब अकबर को पहुंचा तो अकबर ने इस तरह बर्ताव किया
कि जैसे न उसको खान जमान पर भरोसा हो और न ही मुनअम खान पर । इसलिए उसने अपने एक
मुशीर ख्वाजा जहां को खान जमान से बात करने के लिए भेजा। ख्वाजा जहां वो शख्स
था जिसपर खान जमान खुद भी भरोसा करता था। ख्वाजा जहां को भेजने का मकसद ये था कि
वो खान जमान के साथ समझौता करके अजबकों को बगावत खत्म करने पर राजी कर ले।
ख्वाजा जहां खान जमान के पास पहुंचा और सुलाह की बातचीत
हुई । खान जमान ख्वाजा जहां की बात मान गया और ये तय पाया कि खान जमान अपनी मां
और चाचा इब्राहीम को अकबर के दरबार में भेज दे जब उनसे रस्मी तौर पर माफी का वादा
कर लिया जाय तो पहले खान जमान और फिर बहादुर खान और सिकंदर अकबर के दरबार में
हाजिर हो जायें। इस तरह अकबर उनसे कोई पूछताछ नहीं करेगा।
जब खान जमान की मां और उसका चचा इब्राहीम खान दोनों अकबर के
सामने पेश किये गये तो अकबर ने उनकी इज्जत की उनसे बात करने के बाद खान जमान को
अकबर ने माफ कर दिया। फिर भी अकबर ने ये खान जमान को ये पैगाम भिजवाया कि जब तक
अकबर का लश्कर घाघरा नदी के किनारे ठहरा हुआ है जोनपुर जाने के लिए खान जमान
घाघरा नदी को पार नहीं करेगा। जब अकबर का लश्कर वहां से हट जायेगा तब खान जमान
घाघरा नदी को पार करके जोनपुर का रूख कर सकता है।
इस बीच राजा टोडरमल ने जो अकबर के लश्कर में शामिल था उसने मआज उल मलिक के साथ मिलकर ये साजिश तैयार
की ये दोनों नहीं चाहते थे कि खान जहां की वजह से ये समझौता हो इस तरह मुनअम खान
और जहां खान दोनों की अकबर की नजरों में इज्जत बढ़ जाय इसलिए उन्होंने कोशिश की सुलाह को नाकाम बना
दिया जाय और अजबकों और अकबर की लश्कर के बीच जंग करा दी जाय।
ये फैसला करने के बाद उन्होंने कार्यवाहीयों शुरू कर दीं
वो हर सूरत में समझौते की कोशिशों को नाकाम बनाने का फैसला कर चुके थे। जान बूझकर
उन दोनों ने खान जमान के भाई बहादुर खान और उसके साथी सिकंदर खान को मुगलों के
खिलाफ कार्यवाही करने पर मजबूर किया और
उकसाया जिसके नतीजे में खान जमान के लश्कर और मुगलों में टकराव हो गया। दोनों लश्कर
गलतफहमी की वजह से एक दूसरे पर टूट पड़े इस टकरव की वजह से मुगलों के लश्कर को
जबरदस्त शिकस्त उठाना पड़ी और हारकर कन्नौज शहर की तरफ हट गये।

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