मुगल बादशाह जलालुद्दीन अकबर (भाग-9)
उस शिकस्त की खबर जब इलाहाबाद पहुंची तो अकबर बड़ा गुस्सा हुआ । साथ ही अकबर के
मुखबिरों ने अकबर को ये खबर दी कि ये सारी गड़बड़ी मीर मआज उल मलिक और टोडरमल की शाजिशों की वजह से हुई है और से
ये खबर हुई थी कि दोनों किस मकसद के लिए ऐसा कर रहे थे । अकबर ने बड़ी अक्लमंदी
से काम लिया अजबकों को जिन शर्तों पर माफी दी गई थी उन शर्तों को अकबर ने बरकरार
रखा उसने कुछ वक्त के लिए मआज उल मलिक और राजा टोडरमल की शाही दरबार में हाजिरी
पर पाबंदी लगा दी थी।
दूसरी तरफ जब टोडरमल और मआज उल मलिक की वजह से लश्कर टकरा
गये तब खान जमान अपने लश्कर के साथ घाघरा नदी पार कर गया हालांकि समझौते की शर्त
में तय था कि वो घाघरा नदी को पार नहीं करेगा इस तरह अकबर को बड़ा अफसोस हुआ ।
अकबर इलाहाबाद से जोनपुर और वहां से बनारस रवाना हुआ। रास्ते में उसने चिनार नाम
के किले में कयाम किया। उसे जब खबर हुई कि समझौते की शर्त के खिलाफ खान जमान ने
घाघरा नदी को पार किया है तो उसने खान जमान को बागी करार दे दिया । दूसरी तरफ खान
जमान घाघरा नदी पार करके एक जगह अपने लश्कर के साथ रूका हुआ था और अपने लश्कर का
कुछ हिस्सा जोनपुर और गाजीपुर की तरफ रवाना कर दिया था इसलिए कि वो इलाके उसके
अपने थे जिन पर वो हुकूमत कर रहा था।
उस पर अकबर ने अपने लश्कर के सालार मुनअम खान से जबाब
मांगा कि समझौते की शर्तों के खिलाफ उसने क्यों अजबकों को घाघरा नदी पार करने दी।
जब मुनअम खान कोई जवाब न दे सका तो अकबर ने खान जमान पर हमला करने का हुक्म दे
दिया। साथ ही अकबर ने अपने एक सालार अशरफ खान को एक लश्कर देकर जोनपुर की तरफ
रवाना कर दिया और उसे हुक्म दिया कि वो खान जमान की मां को जेल में बद कर दे।
खान जमान को जब ये खबर हुई कि अकबर ने उसके खिलाफ कार्यवाही
करने का हुक्म दिया है और उसने अपने लश्कर को हुक्म दिया है कि पूरी ताकत से
खान जमान पर हमला कर दें तब वो घाघरा नदी पार करके भाग निकला ।अकबर ने उसके खेमो
और दूसरे सामान पर कब्जा कर लिया और अकबर के लश्कर का एक हिस्सा उसके पीछे
रवाना हो गया।
खान जमान बड़ी तेजी से भागता हुआ हिमालय के जंगलों की तरफ
निकल गया इसलिए पीछा करने वाले सिपाहियों
को वापस आना पड़ा इसी बीच खान जमान का भाई बहादुर खान हरकत में आया वो अपने लश्कर
के साथ जोनपुर की तरफ रवाना हो गया। अशरफ खान ने उसकी मां को कैद खाने में डाल
दिया था। उसके बाद उसने जोनपुर शहर को जी भरकर लूटा और उसके बाद वो बनारस शहर
पहुंचा वहां भी अपने लश्कर के साथ उसने खूब लूट मार करते हुए सिपाहियों के साथ
सामान समेटा कई महीनों के लिए उसने सिपाहियों की जरूरत का सामान जमा कर लिया था।
ये खबर मिलते ही अकबर ने अपने लश्कर के साथ जोनपुर का रूख
किया । जोनपुर पहुंचकर अकबर ने अपने सालार को इस बात पर सजा दी कि उनकी गैर जिम्मेदारी
की वजह से बहादुर खान को जोनपुर पर हमला करने की हिम्मत मिली।
जोनपुर पहुंचकर अकबर ने ये भी ऐलान कर दिया कि जब तक अजबक
बागियों का पूरे तरीके से खात्मा नहीं हो जाता तक तब वो जोनपुर में ही रूकेगा।
अकबर के इस फैसले की खबर जब हिमालय के जंगलों में रह रहे
खान जमान को हुई तो वो परेशान हुआ। उसे यकीन हो गया था कि अकबर अगर जोनपुर में
रूका रहा तो वो अजबकों की ताकत को खत्म करे बगैर वापस नहीं जायेगा उन हालात में खान जमान ने
अकबर के वजीर मुनअम खान से राब्ता किया और उससे कहा कि अकबर से सिफारिश करे कि वो
उसे माफ कर दे अगर ऐसा हो जाय तो वो अकबर की इताअत करेगा लेकिन इस बार मुनअम खान
की इतनी हिम्मत न हुई कि वो अकबर के सामने खान जमान की शिफारिश करता।
लेकिन खान जमान की खुशकिस्मती कि मुनअम खान के अलावा कुछ
दूसरे सालारों ने इस मामले को अकबर के सामने रखा और खान जमान को माफ करने की
सिफारिश की आखिर अकबर ने बड़ी मुश्किल ने उन बागियों का माफ करके उनको उनका पुराना ओहदा वापस कर दिया । इस तरह ये
मामला खत्म करने के बाद 29 मार्च 1556ई. को अकबर जोनपुर से आगरा की तरफ चला गया
था।
अजबकों की बगावत को दबाने के बाद अकबर आगरा में ठहरा हुआ था
कि उसके लिए एक और नई मुसीबत उठ खड़ी हुई उसे खबर मिली कि उसके भाई मिर्जा हाकिम
ने एक तरह से उसके खिलाफ बगावत कर दी और लाहौर पर कब्जा कर लिया है। किस्सा कुछ
इस तरह है कि अकबर का छोटा भाई मिर्जा हाकिम काबुल का हाकिम था उस पर अचानक बदख्शां
के हाकिम सुलेमान मिर्जा ने हमला कर दिया और हाकिम मिर्जा को हराने के बाद उसने हाकिम मिर्जा
सुल्तान को काबुल का हाकिम बना दिया और बदख्शां वापस चला गया। सुलेमान खान के
वापस जाने के बाद हाकिम मिर्जा हरकत में
आया उसने मिर्जा सुल्तान पर हमला कर दिया और उसे काबुल से बाहर निकाल दिया एक बार
फिर उसने काबुल पर कब्जा कर लिया जब मिर्जा हाकिम को ये खबरे मिलने लगीं कि बदख्शां
का हाकिम सुलेमान खान फिर उस पर हमला करने
के लिए तैयारी कर रहा है तो फिर उसने तेज रफ्तार कासिद अपने भाई अकबर की तरफ भिजवाया और उसे पूरे
हालात बताए और बदख्शां के हाकिम के खिलाफ मदद मांगी।
जब हाकिम मिर्जा के ये कासिद अकबर के पास पहुंचे उस वक्त
अकबर अजबकों की बगावतों को दबाने में लगा हुआ था फिर भी वो अपने भाई की मदद के लिए
फौरन ही तैयार हो गया और अपने मुल्तान के हाकिम मोहम्मद कुली खान के नाम पैगाम
भिजवाया कि वो काबुल के बदलते हुए हालात पर गहरी नजर रखे और जब भी बदख्शां का
हाकिम सुलेमान मिर्जा काबुल पर हमला करने की कोशिश करे तो मोहम्मद कुली एक लश्कर
लेकर काबुल का रूख करे और उसके भाई हाकिम
मिर्जा की मदद करे ।
हाकिम मिर्जा के
कासिद अकबर का जवाब सुनकर खुश हो गये थे और वो वापस चल दिए इस बीच बदख्शां का
हुक्मरां सुलेमान मिर्जा ने बदख्शां से निकलकर काबुल पर हमला कर दिया । हकिम
मिर्जा उसका मुकाबला न कर सका और काबुल से निकलकर अपने छोटे से लश्कर के साथ भाग
खड़ा हुआ।
हाकिम मिर्जा जिस वक्त
सिंध नदी के पास पहुंचा तो उसकी मुलाकात उन कासिदों से हुई जो अकबर के पास से
लौट रहे थे । सिंध नदी के किनारे हाकिम मिर्जा को उसके कुछ साथियों ने समझाया कि
इन दिनों अकबर को पूरा ध्यान अजबकों की तरफ लगा हुआ है अजबकों ने चारों तरफ
हंगामें खड़े किये हुए हैं और कुछ वक्त
तक अकबर उनके साथ उलझा रहेगा। इसलिए हाकिम मिर्जा काबुल तो नहीं जा सकता सुलेमान
खान ने वहां से निकालकर कब्जा कर लिया है इसलिए बेहतर यही है कि मिर्जा हाकिम
लाहौर पर कब्जा कर ले । लाहौर में अपनी ताकत को मजबूत करने के बाद फिर काबुल पर
हमला करके फिर काबुल वापस ले ले।
हाकिम मिर्जा ने इस बात को पसंद किया और सिंध नदी के किनारे
अपने लश्कर के साथ उसने लाहौर का रूख किया । लाहौर वालों को जब खबर हुई कि अकबर
का छोटा भाई हाकिम मिर्जा लाहौर पर कब्जा
करने के लिए आ रहा है तब उनमें से अकबर के वफादार सरदारों ने किले के दरवाजे बंद
कर लिए । उन सरदारों में कुतुबुद्दीन और हनीफ मोहम्मद खान थे। लाहौर पहुंचकर
हाकिम मिर्जा ने महदी कासिम के बाग में पड़ाव डाला और पंजाब के अलग अलग सदारों से मदद हासिल करने
की कोशिश करने लगा ।
आखिर भाग दौड़ करने के बाद हाकिम मिर्जा लाहौर के कुछ उमराअ
की हिमायत हासिल करने में काम्याब हो गया इस तरह वो लाहौर शहर में दाखिल हो गया ।
अब हालात ये थे कि अकबर के जो वफादार थे वो बहुत थोड़े से लश्कर के साथ लाहौर के किले में कैद हो गये जिन सालारों ने
हाकिम मिर्जा का साथ दिया उनके साथ हाकिम मिर्जाने शहर के रूका इस बीच कई बदलाव
हुए पहली ये कि अकबर के कुछ सालारों ने मिर्जा हाकिम को ये भरोसा दिलाया कि वो
अकबर के मुकाबले में उसकी हिमायत करेंगे । दूसरे ये कि अजबकों के सरदार खान जमान
ने खुले तौर पर अकबर की मुखालिफत करते हुए मिर्जा हाकिम को अपना बादशाह मान लिया
और अपने इलाके में उसने हाकिम मिर्जा के नाम का खुत्बा भी पढ़वाया । उन हालात ने अकबर को एक बार फिर से परेशान
करके रख दिया फिर भी अकबर एक लश्कर लेकर आगरा से निकला और बड़ी तेजी से उसने
लाहौर का रूख किया था।
अकबर के वफादार सालार जो अपने लश्कर के साथ लाहौर के किले
में फंसे हुए थे एक दिन वो किले की दीवार पर चढ़कर खुशियां मनाने लगे और नक्कारे
पीटने लगे उस वक्त हाकिम मिर्जा शहर के अंदर सो रहा था। नक्कारों की आवाज सुनकर
उसकी आंख खुल गई उसने अपने साथियों से पूछा कि ये किले में बंद अकबर के हिमायती
खुशी क्यों मना रहे हैं ? उसे बताया गया कि अकबर एक बहुत बड़े लश्कर के साथ लाहौर का
रूख कर रहा है और लाहौर के पास पहुंच चुका है।

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