मुगल बादशाह जलालुद्दीन अकबर (भाग-11)
अकबर अपने लश्कर
के साथ 23 अक्टूबर 1567ई. चित्तौड़ पहुंच गया। चित्तौड़ का किला एक ऊंची पहाड़ी
के ऊपर शहर से अलग था। उसक किले की लंबाई साढ़े तीन मील (3. 1/2मील) थी और ये किला
बीच में लगभग (1200 गज )चौड़ा था समुद्री सतह से उस किले की ऊंचाई (1980 फिट) और
जमीन से लगभग (1500 फिट) ऊंचा था ।
इस किले पर पहले
भी दो बार मुसलमान हमला कर चुके थे और दोनों बार उसे फतह कर लिया था। एक बार 1303
ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने उस पर हमला किया और उसे फतह कर लिया और दूसरी बार 1534
ई. में गुजरात के हाकिम बहादुर शाह ने उस किले पर
हमला करके किले की ईंट से ईंट बजा दी थी । अब तीसरी बार अकबर चित्तौड़ पर हमला कर
रहा था।
चित्तौड़
पहुंचकर अकबर अपने लश्कर के साथ एक महीने तक वहां ठहरा और चित्तौड़ पर हमला करने
की तैयारियां करता रहा उसके इरादे चित्तौड़ को फतह हासिल किये बगैर वापस जाने के
नहीं थे।
अकबर के इस तरह
रूकने से उदय सिहं घबरा गया और अपनी राजधानी छोड़कर पास के रावली नाम के पहाड़ों
मे जाकर छुप गया और किला उसने अपने दो राजाओं
राजा जयमल और राजा पट्टा के सुपुर्द किया था।
अकबर ने अपने एक
सालार हुसैनी कुली को राजा उदय सिहं के पीछे भिजवाया लेकिन राजा उदय सिंह
पहाडि़यों में जाकर छिप गया और हुसैन कुली वापस आ गया।
अकबर ने पूरी
ताकत से चित्तौड़ पर हमला कर दिया था और चित्तौड़ शहर की ईंट से ईंट बजाकर रख दी
थी । हर दिन अनगिनत राजपूत अकबर के सिपाहियों के हाथों मारे जाने लगे थे आखिर
3फरवरी को रात के वक्त अकबर और राजपूतों के बीच होलनाक जंग हुई । रात के वक्त
राजा जयमल और राजा पट्टा ने पूरी ताकत से मुगलों का मुकाबला किया लेकिन अकबर के
सिपाहियों ने बुरी तरह राजपूतों को काटते हुए एक तरह से उनका दम खम तोड़ दिया था।
राजपूत लश्कर
काफी बड़ा था लेकिन मुगलों के हमले में लश्कर का बहुत बड़ा हिस्सा मारा जा चुका
था और बाकी हारकर वापस किले के अंदर चले गये ।
राजपूतों ने जब
अंदाजा लगा लिया कि मुगलों से मुकाबला नहीं किया जा सकता और अगर जंग लंबी चली तो
मुगल किले की दीवार तोड़कर किले के अंदर दाखिल हो जायेंगे और सारे लोगों को मार
डालेंगे। इसलिए राजपूतों ने आग का बहुत बड़ा अलाव गर्म किया और अपनी औरतों के साथ
वो इस आग में जलकर भस्म हो हो गये जिसे जोहर की रस्म कहते थे इसलिए कि उनके यहां
ये रिवाज था कि जब राजपूत अपनी हार से ना
उम्मीद हो जाते हैं तो अपनी जिंदगी का खात्मा खुद कर लेते हैं। इस जंग मे राजा
जयमल के अलावा राजा पट्टा सिंह भी मारा गया । इस तरह अकबर अपने लश्कर के साथ चित्तौड़
के किले में दाखिल हुआ किले के अंदर 8000 हजार राजपूत और लगभग 44000 हजार किसान जिन्हें ट्रेनिंग
देकर राजपूतों ने अपनी फौज में शामिल कर लिया था। जिस वक्त अकबर चित्तौड़ शहर
में दाखिल हुआ तो एक तरह से शहर के अंदर उस वक्त भी लगभग 48000 हजार राजपूतों का
लश्कर था जिसकी वजह से किले के अंदर भी घमासान की लड़ाई हुई लेकिन अकबर के
सिपाहियों ने किले के अंदर भी बेहतरीन हिम्मत का मुजाहिरा करते हुए न सिर्फ चित्तौड़
के किले के अंदर भी राजपूतों को शिकस्त दी
बल्कि उनका कत्ले आम भी किया उनकी ताकत और घमण्ड को भी तोड़ दिया और उनके
लश्कर को भी ना होने के बाराबर कर दिया।
चित्तौड़ के लश्कर
के खिलाफ ये अकबर की शानदार फतह थी इस जंग में राजा जयमल और पट्टामल के अलावा उसके
बीवी बच्चे और उसके रिश्तेदार भी मारे गये।
अगले रोज जब सूरज
निकला तो चित्तौड़ के किले में राजपूतों की बजाय अकबर की हुकूमत थी । बचे खुचे
राजपूत इधर उधर छुपते फिर रहे थे और उनको खत्म कर दिया गया था ।
उदय सिंह का बेटा
राणा प्रताप पहाड़ी इलकों में जाकर अपनी फौजी ताकत बढ़ाने लगा था। लेकिन उस मौके
पर उसमें इतनी हिम्मत नहीं हुई कि वो पहाड़ियों से निकलकर अकबर से टकराए हालांकि
दोनों बाप बेटे के पास बहुत बड़ा लश्कर था ।
चित्तौड़ को फतह
करने के बाद अकबर ने उसमें कयाम किया बड़ी तेजी से उसका इंतिजाम ठीक करने लगा ।
अकबर जानता था कि चित्तौड़ का राजा उदय सिंह और उसका बेटा राणा प्रताप पहाड़ी
इलकों में चले गये हैं और अपनी ताकत को बढ़ा रहे हैं । लेकिन उनकी मौजूदगी को अकबर
ने कोई अहमियत नहीं दी और वो चित्तौड़ के किले में ठहरा रहा। चित्तौड़ का
इंतिजाम ठीक करने के बाद उसने ग्वालियार की तरफ जाने का फैसला किया और जाने से
पहले उसने उदय सिंह की पूरी रियासत जिसका नाम रियासत मेवाड़ था उसका इंतिजाम अपने
सालार आसफ खान के सुपुर्द कर दिया। उसके बाद वो आगरा की तरफ चला गया था।
आगरा की वापस
लौटते वक्त अकबर के साथ एक हादसा हुआ । वो इस तरह कि जस वक्त अकबर चित्तौड़ से
आगरा की तरफ जा रहा था रास्ते में एक खूंखार शेर अकबर के लश्कर के सामने आ गया
शेर को देखकर अकबर बहुत खुश हुआ। अपने सिपाहियों को हुक्म दिया कि कोई भी शख्स
इस शेर को मारने की कोशिश न करे अकबर ने खुद एक तीर चलाया जो शेर को लगा। शेर जख्मी
होकर बिफर गया और अकबर पर हमला करने के लिए आगे बढ़ा लेकिन अकबर के लश्कर का एक
सालार जिसका नाम आदिल था और जो अकबर के पास ही घोड़े पर सवार था उसने चीते की तरह
छलांग लगाई और शेर को अकबर की तरफ आने से रोक दिया इतनी देर में उसके कुछ और साथी
आ गये और सालार ने शेर को मार डाला।

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