मुगल बादशाह जलालुद्दीन अकबर (भाग-12)
चित्तौड़ फतह
करने के बाद राजपूतों का एक बड़ा किला मुगलों के हाथों फतह हो गया था। अब उनके दो
और किले रह गये थे । एक रणथम्बूर और दूसरा कालिंजर । अकबर ने इरादा कर लिया था कि
हर हाल में वो राजपूत राजाओं को अपने सामने झुकाकर रखेगा इसलिए चित्तौड़ की फतह
के बाद अपने लश्कर के साथ उसने रणथम्बूर का रूख किया।
राणथम्बूर का
हाकिम उन दिनों सूरजन था उसने अकबर का मुकाबला करने की ठान ली । अकबर ने सबसे पहले
रणथम्बूर का इतनी सख्ती से मुहासरा किया कि किले के अंदर कोई चींज अंदर न जाने
देता न किले से बाहर आने देता मुहासरे में सख्ती करने के बाद अकबर ने दूसरा कदम
ये उठाया कि रणथम्बूर के पास ही पहाड़ी इलाका था जिसे मदन पहाड़ भी कहा जाता था।
उस पहाड़ी इलाके पर अकबर ने तोपें लगाने का हुक्म दिया । उससे पहले जो कोई भी
रणथम्बूर पर हमला करता था आज तक किसी ने पहाड़ों पर तोपें लगाकर उसे फतह नहीं
किया इस तरह अकबर पहला बादशाह था जिसने ये हुक्म दिया था और उसका हुक्म मानते
हुए उसके सिपाहियों ने बड़ी मेहनत के बाद तोपों को पहाड़ पर लगा दिया और जब तोप ने
गोले दागते हुए रणथम्बूर को निशाना बनाना शुरू किया तो एक एक गोले से कई कई मकान
गिरने लगे ये हालत राजा सूरजन के लिए परेशान कर रही थी उसने अंदाजा लगा लिया था कि
वो मुसलमानों से मुकाबला नहीं कर सकता । इसलिए वो अपनी बीवी बच्चों को लेकर किले
से निकला अकबर से माफी मांगकर अकबर की इताअत कुबूल कर ली इस तरह रणथम्बूर जैसा
मजबूत किला भी अकबर ने फतह कर लिया और उसके अंदर जिस कदर खजाने और दूसरी कीमती
चीजे थी सब पर अकबर का कब्जा हो गया था।
रणथम्बूर को फतह
करने के बाद अकबर ने राजपूतों के किले कालिंजर का रूख किया कालिंजर का राजा राजा
रामचंद्र था अकबर जब अपने लश्कर के साथ कालिंजर की तरफ बढ़ा तब रामचंद्र ने किसी
किस्म का विरोध नहीं किया इसलिए कि उसे खबर हो चुकी थी कि उससे पहले अकबर ने चित्तौड़
और रणथम्बूर जैसे मजबूत किलों को फतह कर लिया था । इस बात से वो डरा हुआ था अगर
उसने भी मुकाबला करने की कोशिश की तो नुकसान उठाना पड़ेगा।
इस बात का ध्यान
में रखते हुए रामचंद ने अकबर की इताअत करने का फैसला कर लिया। इसलिए जब अकबर अपने
लश्कर के साथ कालिंजर पहुंचा तो रामचंद्र ने उसकी खिदमत में हाजिर होकर किला अकबर
के हवाले कर दिया और उसकी इताअत कुबूल कर ली । कालिंजर ये वही किला जिसे फतह करते
हुए शेर शाह सूरी ने अपनी जान हार दी थी फिर भी उसने इस किले को फतह कर लिया था
लेकिन बाद में ये राजपूतों के कब्जे में चला गया था । कालिंजर पर अब अकबर का कब्जा
हो गया था।
राजपूतों के बड़े
बड़े किले जब अकबर ने फतह कर लिए तब छोटे छोटे राजपूत राजाओं ने भी अकबर की इताअत
कुबूल कर ली । सबसे पहले जोधपुर के राजा मालदेव का बेटा चंद्रसेन अकबर के दरबार
में हाजिर हुआ और अपनी इताअत का इजहार किया लेकिन ये इताअत ज्यादा देर कायम न रह
सकी चूंकि बाद में चंद्रसेन ने बागवत शुरू कर दी थी और स्वाना के पहाड़ी इलाकों की तरफ चला गया और
बागी हो गया। अकबर ने जोधपुर पर हमला किया और उसे फतह करके बीकानेर के हाकिम राय
सिंह की निगरानी में दे दिया।
राय सिंह खुद भी
अपने बाप कल्याणमल के साथ अकबर के दरबार में हाजिर हुआ और दोनों ने अकबर की इताअत
कर ली। उनकी इस कार्यवाही से खुश होकर अकबर ने कल्याणमल और उसके बेटे राय सिंह को
बीकानेर का राजा रहने दिय लेकिन कल्याणमल का बेटा अकबर के दाबारियों में शामिल हो
गया और उसे ऊंचा ओहदा दिया गया साथ ही बीकानेर के राजा कल्याणमल ने अपनी एक बेटी
की शादी भी अकबर से कर दी थी।
अकबर की बहुतसी
बीवियां थी लेकिन अभी तक उसके कोई औलाद नहीं थी उसके जुड़वां लड़के पैदा हुए लेकिन
जल्द ही मर गये इसलिए वो औलाद की आरजू करने लगा था। सबसे पहले उसकी बीवी जोधा बाई
के यहां एक लड़का पैदा हुआ ये जोधाबाई आमेर के राजा भारीमल की बेटी थी इसी लड़के
का नाम सलीम रखा गया और यही शहजादा सलीम बाद में जहांगीर के नाम से हिंदुस्तान का
बादशाह बना।
सलीम के बाद
दूसरी बीवी से नवंबर के महीने में अकबर के यहां एक बेटी पैदा हुई जिसका नाम खानम
सुल्तान रखा गया। इतिहास में ये शहजादी खानम के नाम से पहचानी जाती है। इसके बाद
अकबर की बीवी सलीमा बेगम के यहां एक बेटा पैदा हुआ जिसका नाम मुराद रखा गया। उसके
बाद उसका तीसरा बेटा पैदा हुआ जिसका नाम दानियाल रखा गया था। दानियाल के बाद अकबर
के यहां दो बच्चियां पैदा हुईं एक नाम शकूरून्निशा और दूसरी का नाम आराम बानो बेगम
रखा गया था । शकूरून्निशा बेगम की शादी शाहरूख मिर्जा से कर दी गई थी ।
राजपूतों को
हराने के लिए अकबर नागौर शहर पहुंचा वहां उसने पानी के तीन होजों की सफाई करवाई।
किले की मरम्मत भी कराई उसके अलावा वहां उसने एक बहुत बड़ा फव्वारा बनवाया जो अब
तक मौजूद है नागौर में कुछ दिन रूककर अकबर अजोधन चला गया वहां उसने फरीदुद्दीन गंज
शकर के मजार पर हाजिरी दी वहां से दीपालपुर होते हुए लाहौर पहुंचा कुछ दिन लाहौर
में ठहरने के बाद वो अजमेर गया वहां से फतहपुर सीकरी पहुंचा और फतहपुर सीकरी में
उसने एक अजीमुस्शान शहर आबाद करने का फैसला किया।

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