मुगल बादशाह जहीरूद्दीन बाबर(भाग-9)
ये बात बिल्कुल साफ है कि 1519 ई.
के शुरू में बाबर ने बाजोड़ और भेरा पर अपने
हमले को हिंदुस्तान पर पहला हमला बताया है। उसने अपने बेटे हिंदु बेग को
भेरा का गवर्नर बनाया और खुद काबुल की तरफ लौट गया । लेकिन कुछ वक्त के बाद वहां
हिंदु बेग के खिलाफ बगावत हो गई भेरा बाबर के हाथों से निकल गया । बाबर ने वहां के
लोगों को खुश करने के लिये वहां के सरदार युसुफ जई से इत्तिहाद किया था और उनके
सरदार की लड़की के साथ शादी भी कर ली थी ।
दरिया झेलम के किनारे भेरा शहर के
काम्याब मुहासरे के फौरन बाद बाबर को काम्याबी हासिल हुई लेकिन फिर भी उसने अपने सिपाहियों को वहां की
अवाम से अच्छे से पेश आने का हुक्म दिया और वहां की अवाम की जान माल की पूरी
हिफाजत की गई इस तरह बहुत हद तक वहां के लोगों के दिलों में जगह बनाने में काम्याब
हो गया।
बाबर अपने रोजनामचे में लिखता है।
उस वक्त से अब तक हमने हिंदुस्तान पर पांच बार चढ़ाई की है और इस मकसद के लिये
हमने बहुत मेहनत से काम लिया यहां तक कि हमें पांचवी बार में हिंदुस्तान को फतह
करने में काम्याबी हासिल हो गई।
उससे पहले जनवरी 1505ई. में बाबर
ने मुल्तान , कोहाट और तरबेल के इलाकों पर कब्जा किया था। लेकिन इसी
साल मई में वो दरिया-ए-सिंध को पार किये
बगैर वापस चला गया था। इस तरह सितम्बर 1507ई. में उसे मदरावड़ के मकाम पर अपने
सरदारों और सालारों के बीच इख्तिलिफात की वजह से काबुल वापस जाना पड़ा था।
बाबर ने खुद 1505ई. और 1507ई. में
अपनी दो जंगों को पहली या दूसरी जंग शामिल नहीं किया। इसके अलावा हिंदुस्तान पर
हमला करने की एक और मुहिम1519ई. में भी हुई इस मुहिम के दौरान वो पेशावर तक आ
पहुंचा था लेकिन हालात की बदनसीबी कि उन्हीं दिनों बदख्शां शहर में उसके खिलाफ
हंगामें खड़े हो गये जिसकी वजह से उसे वापस जाना पड़ा।
1520ई. में उसने हिंदुस्तान पर
तीसरी बार हमला किया और भेरा पर दोबारा कब्जा करने के बाद सियालकोट की तरफ बढ़ा
और आसानी से उस पर कब्जा कर लिया उसके बाद सैयदपुर की मुहिम पर भी उसने काबू पा
लिया था । लेकिन अभी तक उसकी बद नसीबी ने
उसका साथ नहीं छोड़ा था ।उसकी गैर मौजूदगी में अचानक कंधार में उसके खिलाफ बगावत
उठ खड़ी हुई उसे जब बगावत का पता चला तो
वो वापस कंधार चला गया। कहते हैं1524ई. में बाबर ने हिंदुस्तान पर चौथी बार हमला
किया इस बार पंजाब के हाकिम दौलत खान लोधी ने उसे हमले की दावत दी थी । क्योंकि
दिल्ली के सुल्तान के साथ उसके रिश्ते सख्त हो चुके थे।
पंजाब के दौलत खान लोधी की तरफ से
हमले की दावत की वजह से हिंदुस्तान में मुगलिया सल्तनत आसानी से कायम हो गई।
दौलत खान लोधी ने बाबर को ये दावत इब्राहीम लोधी के बदतरीन रवैये की वजह से दी थी।
बहुत से दुश्मन पैदा हो चुके थे ।
उसकी हुकूमत के बहुत से हिस्सों में बगावत हो चुकी थी उसके तमाम रिश्तेदार उसके
खिलाफ थे लेकिन उसके बदतरीन दुश्मनों में पंजाब का हुक्मरां दौलत खान लोधी सबसे
ऊपर था और खुद इब्राहीम लोधी का चाचा आलम
खान थे। आलम खान ने तो गुजरात के सुल्तान मुजफ्फर के पास पनाह ली थी और इब्राहीम
लोधी के खिलाफ कार्यवाही में लगा हुआ था । इब्राहीम लोधी के उसके गर्वनरों के साथ भी नहीं बनती थी वो भी
उसके खिलाफ थे ।
इतिहासकार कहते हैं कि ग्वालियार
फतह करने के बाद देहली के बादशाह इब्राहीम लोधी जवानी के गुरूर और फतह के नशे में
बदमिजाज हो गया था और बगैर किसी वजह के एक दम से उन उमराअ के खिलाफ हो गया जो उसके
बाप के वक्त से हुकूमत कर रहे थे उन से बदसुलूकी से पेश आना और छोटी छोटी बातों
पर उनको सजा देने लगा। जिसकी वजह से उसके सालार उससे बदगुमान होने लगे इस पर उसने कई उमराअ को कैद में डाल दिया और
बहुत से उमराअ को बड़ी सजाएं दीं । उसके चंद बेहतरीन सालारों में मिया,वहवा,हुसैन मोहम्मद मियां मारूफ, इस्लाम खान और उसका चाचा आलम खान
थे वो उसके मुखालिफ हो गये।
हालांकि इब्राहीम लोधी के बाप
सिकंदर लोधी के जमाने में उन्होंने सल्तनत की बड़ी खिदमत की थीं जहां तक मियां
बहवा की बात है तो उसने लगभग 28 साल तक इब्राहीम लोधी के बाप सिकंदर लोधी की सल्तनत
में वजीर की हैसियत से खिदमत की थी। इसी
मियां बहवा को बदमिजाज इब्राहीम लोधी ने जंजीरों में जकड़कर मलिक आदम काकड़ के
सुपुर्द कर दिया। उसने कई हासिदों के कहने पर उसके और बहुत से दूसरे उमराअ के लिये
एक ऐसी जगह तैयार करवाई जिसके नीचे एक तहखाना बनाया गया था।
दो महीनों के बाद जब ये तहखाना सूख
गया तो उसे चुपके से बारूद की थैलियों से भर दिया गया उसके बाद बदबख्त इब्राहीम
लोधी ने मियां बहवा और दूसरे उमराअ को जो उसके खिलाफ थे और वो जिनको वो ठिकाने
लगाना चाहता था कैद से रिहा कर दिया और इनआम देकर उन्हें खुश कर दिया ताकि उनके
दिल से डर दूर हो जाये।
एक दिन उन सबको बुलाकर कहने लगा।
मेरे बहुत से सालारों ने मेरे
खिलाफ बगावत कर दी है हालांकि मेरे बाप ने उन्हें खाक से उठाकर परवान चढ़ाया है ये जो इमारत मैंने बनवाई आप
लोग इसमें ठहरें ।और सोच समझकर मुझे बतायें कि जो उमराअ मेरे खिलाफ बगावत कर रहे
हैं उनके के खिलाफ क्या सुलूक किया जाय? आप लोग जो कीमती राय देंगे मैं उसी पर काम करूंगा।
वो सारे उमराअ उसकी बातों में आ
गये और नई बनवाई हुई इमारत में बैठकर बातों में लग गये अभी उन्होंने बातें शुरू
ही की थीं कि आग बुलंद हुई और बारूद ने अपना काम किया मियां बहवा और उसके दूसरे उमराअ
और सालार जो सालों से लोधियों की खिदमत कर
रहे थे दरख्तों के पत्तों की तरह हवा में उड़कर खत्म हो गये ।
बड़े बड़े सालारों को एक एक करके
खत्म कर दिया और कुछ सख्त सजाएं दीं। आखिर इब्राही लोधी ने लाहौर के हाकिम दौलत खान लोधी को बुलवाया जो पिछले बीस
साल से पंजाब में काम्याब हुकूमत कर रहा था।
दौलत खान जानता था कि इब्राहीम
लोधी बदला लेने पर उतरा हुआ और एक के बाद दूसरे को बुलाते हुए अपने बाप के जमाने
के वजीरों और सरदारों को खत्म करना चाहता है। हालांकि दौलत खान लोधी इब्राहीम
लोधी का रिश्तेदार था उसका चचाजाद भाई था। उसने समझ लिया कि इब्राहीम लोधी दूसरे
सालारों की तरह उसका भी खात्मा करना चाहता है। जब इब्राहीम लोधी ने उसे बुलवाया तो
उसने बीमारी का बहाना कर दिया लेकिन हुक्म को मानते हुए उसने अपने बेटे दिलावर
खान को इब्राहीम लोधी के पास भेज दिया।
दौलत खान लोधी का बेटा दिलावर खान
जब इब्राहीम लोधी के पास पहुंचा तो इब्राहीम लोधी ने पूछा तुम्हारा बाप क्यों
नहीं आया ?
उसने अर्ज किया कि वो बीमार था
जिसकी वजह से वो नहीं आया।
इब्राहीम ने कहा अगर आगे से तुम्हारा
बाप नहीं आयेगा तो दूसरे उमराअ की तरह मुसीबत में फंस जायेगा।

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