मुगल बादशाह जहीरूद्दीन बाबर (भाग-14)
सुल्तान
मोहतरम !
मेरे ख्याल में इस वक्त जरूरत यही है इसलिये हमें वही करना चाहिये जो वक्त की
जरूरत हो आगे जो सुल्तान की राय वही ठीक है।
इब्राहीम लोधी ने अपने सालार महमूद खान की ये बातें बड़े गौर से सुनीं । जब वो
खामोश हुआ तो उससे कहने लगा।
महमूद खान ! बादशाहों
के लिये लड़ाई मुंह फेरना उनके शान के खिलाफ
है जरा देखो तो हमारे बड़े बड़े उमराअ
और दोस्त सब मैदान-ए- जंग में काम आ चुके हैं और गिरे पड़े हैं ऐसी हालत
में मैं उन्हें छोड़कर कहां जाऊंगा? मैदान-ए-जंग में मैं , मैं अपने घोड़े के पांव सीने तक
खून में डूबे देख रहा हूं ।
महमूद खान !
मुझे किसी से कोई शिकवा कोई गिला नहीं है
जब तक हमारा वक्त थ हमने बादशाही की और मनमानीयां की अब ये बेवफा आसमान मुगलों की
मर्जी के मुताबिक चल रहा है इसलिये किसी से कोई शिकवा नहीं।
यहां तक कहने के बाद इब्राहीम लोधी रूका फिर दुख: भरे अंदाज में वो दोबारा कह
रहा था।
‘’
अब हमारे जीने का मजा ही क्या रह गया है? बेहतर यही है कि हम भी खाक व खून
में मिलकर दोस्तो के साथ मिल जायें। ‘’
उसके बाद इब्राहीम लोधी अपने पांच हजार उमराअ, और खास लश्करियों के साथ जो बाकी
रह गये थे। मैदान –ए- जंग में कूद पड़ा और बाबर के लश्कर के बीच हमला कर दिया इस
मौके पर इब्राहीम लोधी और बाबर के बीच
बड़ा होलनाक टकराव हुआ उस टकराव के नतीजे में इब्राहीम लोधी जंग में काम आ गया।
कहते हैं जब इब्राहीम लोधी के जंग में मारे जाने की खबर मिली तो उसने दौलत खान
के बेटे दिलावर खान को अपने पास बुलाया और उसे लेकर मैदान में पड़ी लाशों की तरफ
गया कि इब्राहीम लोधी की लाश को तलाश और पहचान कर सके।
दिलावर खान बाबर और उसके सालारों के साथ जंग के मैदान में दाखिल हुआ । चारों तरफ अनगिनत लाशें पड़ी हुई थीं उन्हीं
लाशों में खून में नहाई हुई लाश इब्राहीम लोधी की थी । जबकि उसका ताज सर से अलग
पड़ा हुआ था । दिलावर खान ने जब इब्राहीम लोधी का ये हाल देखा तो रो पड़ा इसलिये
कि इब्राहीम लोधी उसका रिश्तेदार था फिर बाबर को मुखातिब करते हुए कहने लगा ।
‘’
यही इब्राहीम लोधी है’’
बाबर खुद इब्राहीम लोधी की लाश के पास आया और जब उसने चार तकियों वाले तख्त
पर बैठने वाले सुल्तान को खाक और खून में लथपत देखा तो उसकी इस हालत को देखकर खुद
बाबर भी कांप उठा था। बाबर ने खुद झुकर इब्राहीम लोधी का कटा हुआ सर उठाया और उसे
मुखातिब करते हुए कहने लगा।
‘’ आफरीं है तुम्हारी जवां मर्दी पर’’
उसके बाद उसने हुक्म दिया कि कीमती कपड़ा लाया जाय और उससे इब्राहीम लोधी का
कफन तैयार किया जाय। साथ ही उसने अपने एक
और सालार जहांगीर कुली को हुक्म दिया कि सुल्तान इब्राहीम लोधी को गुस्ल देकर
जिस जगह मैदान में वो मरा है वहीं उसे
दफ्न करने का इंतेजाम किया जाय। उसके बाद बाबर ने अपने कुछ सालारों को हुक्म दिया
कि वो इब्राहीम लोधी के तमाम माल, हथियार , और जानवरों पर कब्जा कर लें। उस वक्त बाबर के हाथ सत्ताईस सौ (2700) घोड़े
पंद्राह सौ (1500) हाथी , खजाना और दूसरी कीमती सामान भी हाथ आई।
पानीपत की जंग के बाद हालात अजीब हो गये थे
अपनी सत्तर साल की हुकूमत में अफगान बड़े मालदार हो गये थे । उनमें से ज्यादातर
लोगों ने अपने घरों और माल दौलत को छोड़कर
अपनी जान बचाने के लिये बंगाल की तरफ निकल गये। उनके बीच इख्तिलाफ पैदा हो चुके
थे जबकि बाबर इब्राहीम लोधी के पड़ाव की हर चीज पर कब्जा करने लगा था।
लोधी खानदान में तीन बादशाह हुए एक बहलोल लोधी , सिकंदर लोधी, इब्राहीम लोधी की सल्तनत आठ साल
आठ महीने अठारह दिन रही और पानीपत का जो कस्बा है उसके पश्चिमी हिस्से में जहां
जंग हुई थी उसे उसी जगह दफ्न किया गया था।
पानीपत के मैदान में शानदार फतह हासिल करने के बाद बाबर ने सबसे पहले अपने लश्कर
को लूट मार करने से रोका। फिर देहली और आगरा के खजानों की हिफाजत की तरफ ध्यान
दिया । बाबर अपने लश्कर के साथ खुद दिल्ली में दाखिल हुआ और आगरा की तरफ अपने
बेटे हुमायुं को भेजा। हुमायुं को आगरा के किले में दाखिल होने से पहले उलझना पड़ा
लेकिन वो काम्याब रहा और आगरा में दाखिल होने के बाद उसमें जितने भी खजाने थे उन
पर कब्जा कर लिया हुमायुं ने जिस वक्त आगरा पर कब्जा किया तो उस मौके पर ग्वालियार
के राजा के बीवी बच्चे भी आगरा में थे क्योंकि इस जंग में राजा विक्रमजीत ने
इब्राहीम लोधी का साथ दिया था। ये सब हुमायुं के हाथों गिरफ्तार हुए जैसे ही
हुमायुं को खबर मिली कि ये ग्वालियार के राजा विक्रमजीत के घर वाले हैं तो उनके साथ बहुत ही इज्जत के साथ पेश आया। हुमायुं के इस बर्ताव से खुश होकर राजा
की बीवी और बच्चों ने कीमती हीरे जवाहरात हुमायुं की खिदमत में पेश किये। उन्ही
हीरों में दुनिया का मश्हूर कोहेनूर हीरा था।
27 अप्रैल 1526 को बाबर देहली पहुंचा और देहली की जामा मस्जिद में जुमे के
खुत्बे में बाबर को शहंशाह –ए- हिंदुस्तान के नाम से याद किया गया। गर्मी के
मौसम आने की वजह से बाबर के बहुत से सालार परेशान हो रहे थे उन्होंने बाबर को मश्वरा
दिया कि वो अपने दादा तैमूर लंग की तरह हिंदुस्तान छोड़ दे । बाबर ने उनका कहा
मानने से इनकार कर दिया और उनसे कह दिया कि उनमें से जो जाना चाहें जा सकते
हैं लेकिन वो हमेंशा हिंदुस्तान में रहकर
हुकूमत करेगा।

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