मुगल बादशाह जहीरूद्दीन बाबर (भाग-19)
जहीरूद्दीन
बाबर सिर्फ एक काबिल सालार के तौर पर अपने
लश्कर में देखा जाता था बल्कि वो एक हमदर्द हुक्मरां के तौर पर भी वो अपनी
रियाया के नजरों में काबिल-ए- कद्र था।
मध्य एशिया
में जंगों के दौरान बाबर को बदतरीन और सख्त जान दुश्मनों से पाला पड़ा लेकिन जंग
के नये नये तरीकों , जंगी चालों में इतना माहिर था कि सख्त से सख्त दुश्मन के कदम भी अनन
फानन में उखाड़ देता था । उसपर बुरे से बुरे हालात आये लेकिन उसने कभी हार नहीं
मानी उसे दो बार तख्त से हाथ धोना पड़ा
मगर उसने नये मंसूबे के साथ दुश्मन से टक्कर ली और अपना ताज व तख्त छीन लिया।
इसलिये इतिहास में उसे एक बहादुर और निडर
सालारों में शुमार किया जाता है।
एक हुक्मरान
की हैसियत से उसे पूरी दुनिया में जाना जाता है उसकी सल्तनत पश्चिम में भेरा से
पूरब में बिहार तक फैली हुई थी उत्तर में
हिमालय और दक्षिण में चंदेरी तक उसका परचम लहराता था ।
इसके अलावा
बाबर ने लूट मार का खत्मा करके अपनी रियाया को अमन व सुकून की जिंदगी से मालामाल
कर दिया वो रियाया को ज्यादा से ज्यादा सहूलते पहुंचाने में हमेशा आगे रहता
था उसने अपनी रियाया को अपनी औलाद की तरह
समझा और उसने मुस्लिम और गैर मुस्लिम में कोई फर्क नहीं किया।
बाबर जिंदगीभर
जंगों में इस कदर उलझा रहा कि उसे अपनी मर्जी के मुताबिक रियाया की खिदमत का मौका
नहीं मिल सका बाबर में मुगलों की ताकत और तुर्को का हौंसला था । उसने मुश्किलों का
सामना बड़ी बहादुरी से किया उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है । कभी तख्त का छिन जाना
कभी कांटों की सेज पर जिंदगी गुजारता रहा। उसके बावजूद बाबर के चहरे पर कभी
परेशानी के आसार दिखाई नहीं दिये। इतिहास में उसका एक मकाम है जिससे किसी को इंकार
नहीं। उसकी जिंदगी के वो तीन साल सबसे बदतरीन थे जब वो ताशकंद में खुफिया जिंदगी
गुजार रहा था उस वक्त उसकी जिंदगी से
आराम व सुकून बिल्कुल गायब था बाबर खुद कहता है कि शायद ही कोई ऐसी जगह हो जहां
मुझे दूसरी बार रोजा रखने का मौका मिला हो।
लेकिन उसकी
हिम्मत व बहादुरी का नतीजा था कि उसने मुसीबतें झेलने के बावजूद न सिर्फ दोबारा
तख्त हासिल कर लिया बल्कि उसने मध्य एशिया में एक अजीमुश्सान मुगलिया हुकूमत
की बुनियाद डाल दी थी।
बाबर न सिर्फ
एक रहमदिल इंसाल बल्कि समझदार हुक्मरां
और निडर सालार उसके अलावा बाबर आलिम फाजिल
शख्स और रोजनामचा लिखने वाला था उसकी
लिखी हुई ‘’ तुर्क
बाबरी’’ या ‘’ बाबर नामा’’ को आज तक एक बुलंद मकाम हासिल है।
बाबर की अपनी
जिंदगी के हालात को जिसे ‘’ तुर्क बाबरी’’
कहते हैं उसका तर्जुमा उसके बाद हुमायुं के वजीर बेरम खान के लड़के
अबदुर्रहीम खानखाना ने किया था उसके
इंग्लिश में भी दो तर्जुमें हो चुके हैं ।हिंदुस्तान की जीमन के बारे में बाबर
लिखता है।
हिंदुस्तान
में पीने का पानी केवल दरिया या नदियों से आता है उसके अलावा पानी के साधन मौजूद
नहीं । यहां के बागों में खूबसूरती नहीं है यहां के लोग अपने मकान खुले हुए नहीं
बनाते बल्कि वो अपने मकान को इस तरीके से बनाते हैं कि उसमें खिड़कियां तक नहीं
छोड़ते।
हिंदुस्तान
के किसान और वो लोग जिन लोगों की आय कम है
वो लगभग उनको नंगा बदन कहा जा सकता है इसलिये कि वो अपने बदन को एक चीज से ढांकते
हैं जिसे लंगोट कहा जाता है एक कपड़ा होता है जिसके दो पायंचे से बनाकर उसका दूसरा
कोना दोनों टांगो के बीच से निकालकर बीच में कस दिया जाता है औरतें भी इसी तरह एक
कपड़ा बांध लेती हैं जिसका एक हिस्सा उनकी कमर के पर लिपटा रहता है और दूसरा हिस्सा
सर तक पहुंच जाता है जिसे ‘’ साड़ी’’ का नाम दिया गया है ।
बाबर आगे
लिखता है कि यहां किसी चीज की ज्यादती है तो वो हैं सोना और चांदी के ढेर हैं
उसके अलावा बरसात के मौसम में हवा खुश्गवार हो जाती है कई बार दिन में दस पंद्रह
बार बारिश हो जाती है और पलक झपकते ही चारों तरफ पानी ही पानी हो जाता है और सूखे
हुए तालाब लबालब भर जाते हैं। बारिश के
दौरान हवा के झोकों का जवाब ही नहीं होता मगर बरसात के मौसम में हवा धीमी और नम हो
जाती है ।
इन सबके
बावजूद बाबर अपनी अनथक मेहनत और बहादुरी की वजह से हिंदुस्तान का शहंशाह बन गया
था। इतिहासकार लिखते हैं कि हुमायुं बदख्शां में एक साल रूकने के बाद जब आगरा
लौटा यहां आकर वो फिर से बीमार हो गया उसकी बीमारी देखकर बाबर को फिक्र हुई उसका
बेहतरीन इलाज कराया जब कोई इलाज कारगर नहीं हुआ तो हुमायुं की सेहत के लिये दुआ
मांगते हुए कहने लगा ।
‘’ हुमायुं
के लिये मुझसे ज्यादा कीमती चीज और क्या हो सकती है? इसलिये मैं हुमायुं कि लिये अपनी
जान की कुर्बानी पेश कर सकता हूं और खुदा इस कुर्बानी को कुबूल फरमाएगा।
कहते हैं कि इस दुआ के बाद वो बीमार हुआ और हुमायुं बिल्कुल सेहतमंद हो गया ।
आखिर अपनी बीमारी के दौरन एक दिन बाबर ने अपने सारे बड़े उमराअ और सालारों को
बुलाया और उनसे कहने लगा।
‘’
मेरे दिल में ये ख्याल था कि मैं अपनी सल्तनत अपने बेटे हुमायुं के हवाले करके
खुद इससे अलग हो जाऊं इसलिये कि खुदा-ए- करीम ने अपने फजल से मेरे दिल की बहुत सी
मुरादें पूरी कर दीं हैं लेकिन अब मुझे बीमारी ने दबा लिया है इसलिये मैं तुम सबको
वसीअत करता हूं कि मेरे बाद मेरे बेटे
हुमायुं को अपना बादशाह मानना उसके वफादार रहना मुझे खुदा से उम्मीद है कि
हुमायुं मेरे दिल की उम्मीदें पूरी करेगा।
अपने सालारों और उमराअ को वसीयत करने के बाद बाबर ने अकेले में अपने बेटे
हुमायुं को बुलाया और उससे कहने लगा।
''
तुम्हारे भाईयों को मैं तुम्हारी हिफाजत में छोड़ता हूं उनसे मोहब्बत और सारी
रियाया से मेहरबानी से बर्ताव करना इस
वसीयत के तीन बाद 26 दिसंबर 1530 ई. को बाबर ने आगरा में वफात पाई उसकी वसीयत के
मुताबिक उसे आराम बाग आगरा में दफ्न किया गया और बाद में उसे काबुल भेज दिया गया
था ।
(समाप्त)
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