मुगल बादशाह जहीरूद्दीन बाबर (भाग-17)
कहते हैं कि
दोपहर की तेजी ने भी घमासान की जंग में कोई कमी नहीं डाली राजपूत हर हाल में मुसलमानों को हराने के लिये
पूरी ताकत से हमला कर रहे थे । जब राजपूतों का एक लश्कर मुगलों से हार कर पीछे
हटता तो वो राणा सांगा की जगह किसी दूसरे राजा का लश्कर उसकी जगह ले लेता और
मुगलों पर टूट पड़ता
असर के वक्त
बाबर ने ज्यादातर अपने लश्कर के दो पहलुओं से दुश्मन पर दबाव डाले रखा और जो लश्कर का बीच का हिस्सा था उसकी हिफाजत
के लिये भी सिपाही तैनात थे । इस जंग में राजपूतों को उनकी उम्मीदों से ज्यादा
नुकसान उठाना पड़ा था एक मौके पर उन्होंने जब अपनी सफों को नये सिरे से ठीक करके
जख्मियों को पीछे ले जाते हुए नये अंदाज में बाबर पर हमला करने की शुरूआत करना
चाही तब बाबर ने भी अपना पेंतरा बदलते हुए नया अंदाज अपनाया ।
बाबर ने अचानक
अपने लश्कर को हुक्म दिया कि एक साथ पूरी ताकत से राजपूतों पर टूट पड़े ।
बाबर का हुक्म
मिलना था कि तोपों को आगे खींचा गया तीरंदाज बड़ी तेजी से आगे बढ़ते हुए तोपों के
साथ साथ आगे बढ़े इस तरह बाबर ने अपने पूरे लश्कर के साथ अपनी पूरी ताकत से
राजपूतों पर हमला कर दिया था। ये बाबर की तरफ से राजपूतों के मुंह पर थप्पड़ था ।
राजपूतों ने इस हमले को रोकने की कोशिश की और जवाबी कार्यवाही करते हुए मुसलमान
लश्कर पर टूट पड़े।
लेकिन इतनी
देर में बाबर के सिपाहियों ने राजपूतों को तीन तरफ से घेर कर उनका कत्ल शुरू कर
दिया था और उनको बिखेरना शुरू कर दिया इस
मौके पर राणा सांगा बुरी तरह जख्मी हुआ
और उसे पीछे हटा लिया गया ।
सूरज छुपते
छुपते राजपूतों को बदतरीन शिकस्त का
सामना करना पड़ा और वो मेवाड़ के पहाड़ी रास्तों का रूख करते हुए भाग खड़े हुए।
बाबर ने अपने
लश्रक के साथ राजपूतों का पूरी ताकत से पीछा किया उन्हें अपने आगे भगाता हुआ और
उन्हें मारता हुआ चला गया था और फिर रात हो जाने की वजह से उसने पीछा करना छोड़
दिया इस तरह राणा सांगा के पड़ाव की हर चीज पर कब्जा कर लिया गया था।
कहते हैं उस
जंग में राजपूतों के लश्कर के बहुत सारे सिपाही मारे गये मरने वालों में उनके
बड़े बड़े सरदारों के अलावा राव नगर का सिपेहसालार मारा गया। सलम्बरा का राजा
चंदा दत्त अपने तीन सौ सिपाहियों के साथ मारा गया। मारवाड़ के राजकुमार अपने
सरदारों के साथ मारा गया। सोनी गढ़ का राजाराव उस जंग में काम आया। मेवाड़ के रईस और नामी गिरामी लोग उस जंग में मारे गये।
कहते हैं कि
मुगलों ने मरने वालों के सरों का मीनार बनाया
और बाबर को गाजी कर खिताब दिया गया ।इसमें कोई शक नहीं कि बाबर ने वो लड़ाई
जीती थी जिसने मुगलों के लिये हिंदुस्तान में हुकूमत के रास्ते खोल दिये थे ।
राणा सांग अपने जख्मों से उभर ना सका और एक साल के अंदर ही मर गया । उसकी औलाद ने
भी फिर कभी मुगलों से टकराने की हिम्मत नहीं की पानीपत के मैदान में बाबर ने उत्तरी
हिंदुस्तान के मुसलमान रियासतों को तोड़ा था । जबकि कुनवाह के मैदान में बाबर ने
हिंदुस्तान के राजपूतों की कमर तोड़ दी थी ये पहला मौका था कि बाबर को अपनी
जिंदगी में इतनी बड़ी फतह हासिल हुई थी इससे पहले वो एक जगह से दूसरी जगह एक शहर
से दूसरे शहर अपने दुश्मनों से मुकाबला करता रहता था हर वक्त परेशान और उलझा हुआ
रहता था । लेकिन पानीपत और उसके बाद
कुनवाह में राजपूतों को हराने के बाद उसे
अब कोई खतरा नहीं था अब वो रात में आराम
से सो सकता था फिर भी उसके आसपास उसके विरोधियों की कमी नहीं थी लेकिन उसे उन सबसे
ज्यादा फर्क नहीं पड़ता था उसके अलावा वो शराब छोड़कर और शराब के बर्तन तोड़कर वो
खुदा की रहमत पर ज्यादा भरोसा करने लगा था अब वो ये ख्याल करता था जिस तरह खुदा
ने उसके तौबा करने के बाद उसे दुश्मनों के खिलाफ बड़ी फतह हासिल हुई थी अब उसको
ये भरोसा हो गया था कि आगे भी वही खुदा मदद करेगा।
बाबर ने
पानीपत में फतह हासिल करने के बाद अपने छोटे छोटे फौजी दस्तों को आगरा और कुछ
दूसरे इलाकों में भिजवाया ताकि वो वहां के हालात का पता लगा सकें और जहां भी
सरकारी खजाने हों उनपर कब्जा कर लें कुनवाह में राजपूतों को बुरी तरह शिकस्त
देने के बाद उसने ऐसा नहीं किया इसलिये कि राजपूतों का इलाका झुलसती और तपती रेत
की वादियों में रेगिस्तान था और उसके अंदर बाबर किसी तरह आगे जाना चाहता था साथ
ही साथ इस मौके पर उसके सामने ये भी परेशानी थी सिपाहियों के अलावा उसके कुछ सालार
भी हिंदुस्तान की गर्मी बर्दाश्त न करते हुए वापस काबुल जाने का इरादा रखते थे लेकिन
बाबर ने उसके इरादों को दबाने के लिये बाबर ने एक दाव इस्तेमाल किया जिसकी वजह से
उनमें से बहुत से सालारों ने अपने वतन अंदजान और काबुल वापस जाने से इंकार कर
दिया।
सबसे पहले
उसने अपने बड़े ओहदे के सिपाहियों को जागीरें दीं
और उनको उनकी जागीरों की तरफ रवाना किया उनके जिम्मे ये काम था कि उन
जागीरों में जहां जहां भी दुश्मन छुपे हो
उन पर हमला करके उनके जागीरों पर कब्जा कर लें।
इस तरह
सिपाहियों ने तो वापस काबुल जाने का इरादा छोड़ दिया इसके बाद बाबर ने अपने
सालारों की तरफ ध्यान दिया बाबर ने माल और दूसरे कीमती तोहफों से इस कदर नवाजा कि
वो खुश हो गये । उसके बाद बाबर ने उन्हें मुखातिब करते हुए कहा अब भी अगर वो वापस
जाना चाहते हैं तो बाबर उन्हें रोकेगा नहीं इस पर वो बहुत शर्मिंदा हुए और उन्होंने बाबर के साथ हिंदुस्तान में ही रहना पसंद
किया।
इस जंग में
इब्राहीम लोधी के अफगान साथी भी राणा सांगा का साथ दे रहे थे इसलिये राणा सांगा के
साथ साथ उन्हें भी हार का सामन करना पड़ा । उनमें से एक शख्स था जिसका नाम हसन
खान था जो मेवात का हुक्मरां था वो भी इस जंग में मारा गया । जबकि इब्राहीम लोधी
का भाई सुल्तान महमूद लोधी जो राणा सांगा के लश्कर में शामिल था जब राजपूतों को
शिकस्त हुई तो महमूद लोधी भाग निकला । राणा सांगा को शिकस्त देने के बाद
बाबर अपने लश्कर के साथ बढ़ा और 17
अप्रैल 1527 ई. को बाबर की हुकुमत हिंदुस्तान के दूर दराज इलाकों तक फैल गई थी।
इस मौके पर बाबर ने बड़ी फैयाजी से काम लिया उसने राणा सांगा के साथ जंग में मरने
वाले हसन खान के बेटे ताहिर खान को मेवात के इलाके का हाकिम बनाया और साथ ही उसे
पचास लाख की रकम भी उसके खर्च के लिये दी साथ ही अलवर का इलाका उसने अपने सालार
तिब्बती बेग के नाम कर दिया था जिसने लश्कर के एक हिस्से की कमांडरी करते हुए
राजपतों के खलाफ बहादुरी का सबूत दिया था। अलवर शहर से जंग में मरने वाले हसन खान
का जिस कदर खजाना मिला वो बाबर ने अपने बेटे
हुमायुं मिर्जा के हवाले कर दिया था। इस तरह बाबर ने एक के बाद दूसरी जीत हासिल करते हुए अपनी हालत को ज्यादा
मजबूत कर लिया था।

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