बंगाल और उत्तर
पश्चिमी इलाकों में बगावतों को खत्म करने और हालात को संवारने के बाद कई जगहों पर
औरंगजेब के खिलाफ बगावतें उठ खड़ी हुईं।
पहली बागवत 1669
ई. में मथुरा के जाटों ने की थी। मथुरा में जो उस वक्त औरंगजेब का गवर्नर था उसके
खिलाफ जाटों ने मुहिम शुरू की चारों तरफ उन्होंने तबाही मचाकर रख दी उन जाटों की
बगावत को दबाने के लिये औरंगजेब ने अपने एक सालार
हसन अली खान को रवाना किया उसने जाटों को बदतरीन शिकस्त दी और इस तरह
मथुरा के जाटों की बगावत को खत्म कर दिया गया।
दूसरी बगावत 1672
ई. में दिल्ली के पास तरनोल में सतनामियों ने खड़ी की। सतनामियों को मुंडे भी कहा
जाता था क्योंकि अपने तमाम बाल यहां तक कि अपनी भवें भी साफ रखते थे।
सतनामियों ने
राजधानी को जाने वाला अनाज भी रोक दिया । उसके अलावा राजधानी देहली को जहां जहां
से जरूरतों का सामान जाता था वो उन सतनामियों ने रोकना शुरू कर दिया । सतनामियों
के बगावत करने की वजह ये थी कि मुगलों के एक सिपाही के साथ किसी सतनामी का मामूली
झगड़ा हो गया था और इस झगड़े को सतनामियों ने मजहब का रंग दे दिया था।
इस बीच सतनामियों
की बागवत को और ताकत मिली कि एक हिंदू औरत ने खुद को देवी कहते हुए मुसलमानों के
खिलाफ जंग करने का हुक्म दिया और वहां के हिंदूओं से वादा किया वो अपनी ताकत के
बलबूते पर हिंदूओं को जीत दिलायेगी ।
सतनामियों और नई
उठने वाली देवी का खात्मा करने से पहले छोटे मुगल दस्ते भेजे गये लेकिन
सतनामियों के खिलाफ कोई काम्याबी हासिल न हुई। उन नाकामियों की वजह से हिंदूओं
को यकीन हो गया कि उनकी देवी ताकतों की मालिक है इसलिए उनके हौंसले बढ़े और उन्होंने
तरनोल में और उसके आसपास के इलाकों में लूट मार मचाना शुरू कर दिया।
औरंगजेब को जब इन
हालात की खबर हुई तो वो बड़ा गुस्सा हुआ आखिरकार औरंगजेब ने एक लश्कर उनको दबाने
के लिये भेजा उस लश्कर ने न सिर्फ सतनामियों बल्कि देवी होने का दावा करने वाली
उस औरत पर भी हमला करके उन्हें रौंद कर रख दिया और बगावत को सख्ती से कुचल दिया
गया।
तीसरी बगावत सिक्खों
की तरफ से उठ खड़ी हुई ये बड़ी सख्त बगावत थी। दरअसल सिक्खों के पेशवा गुरूनानक
ने सोलहवीं सदी के शुरू में सिक्ख मजहब की बुनियाद डाली थी सतरहवीं सदी तक सिक्ख
एक फौजी ग्रुप बन चुका था गुरूनानक जब तक जिंदा रहा उसका सिर्फ ये नारा था।
खुदा एक है, सच्चा है, उसे मौत नहीं , उसे देखा नहीं जा सकता, और वो अकेला है।
उसके अलावा
गुरूनानक ने बड़ी सख्ती से मूर्ती पूजा की मुखालिफत की थी और उन्होंने सिक्खों को उन्हीं अकीदों का
सबक दिया था जो मुसलमान होने के बुनियादी अकीदे हैं।
बाबा गुरू नानक
के बाद जिसने भी उनके मिशन को पूरे करने के लिये मेहनत की और सिक्खों की कमान
संभाली उसे गुरू का नाम दिया गया।
सिक्खों के कुल
दस गुरू हुए जिनमें आखिरी गुरू गोविन्द थे धीरे धीरे सिक्खों की एक फौज तैयार हो
गई।
जहांगीर के दौर
में उन्होंने कई जगहों पर बगावतें भी खड़ी की थीं लेकिन 1661 ई. में सिक्खों के
बीच में इस बात को लेकर फूट पड़ गई कि एक साथ दस लोगों ने गुरू होने का दावा कर
दिया आखिर सिक्खों ने इस मुश्किल को हल करने के लिए एक शख्स तेग बहादुर को अपना
गुरू मान लिया।
गुरू बनते ही तेग
बहादुर ने अपनी ताकत के नशे में औरंगजेब आलमगीर के खिलाफ खुली बगावत कर दी लेकिन
जब आलमगीर उसके खिलाफ हरकत में आया तो तेग बहादुर की सारी ताकत बिखेर दी और तेग सिंह को गिरफ्तार करके देहली
लाया गया और वहां शाही हुक्म के तहत उसे मौत के घाट उतार दिया गया । तेग बहादुर
के बाद उसका बेटा गोविन्द सिंह गुरू बन बैठा और अपने बाप के कत्ल के बाद उसने
सिक्खों को हथियारबंद करना शुरू कर दिया ।
ये लोग हुकूमत को
खतरा साबित होने लगे गोविन्द सिंह ने हर सिक्ख के लिये फौजी ट्रेनिंग जरूरी कर
दी साथ ही उसने सिक्खों के लिए वर्दियां बनवाई और हर तरह की कुर्बानी देने का
उनसे वादा लिया और मुसलमानों के खिलाफ खुली कार्यवाहीयां शुरू कर दीं।
सिक्खों के साथ
साथ उस गुरू गोविन्द ने हिंदूओं को भी मुसलमानों के खिलाफ उठाया उसने अपनी सेना
का नाम खालसा रखा और उसने वादा किया कि वो सिक्खों की हुकूमत कायम करेगा।
सिक्ख मजहब
अपनाने वालों में ज्यादातर जाट थे गुरू गोविन्द सिंह ने जात पात के फर्क को बिल्कुल
खत्म कर दिया जिससे सिक्खों को ताकत मिली और उनके सिपाही बढ़ते गये और उनकी सेना
खालसा में बहुत से लोग शामिल होना शुरू हो गये । गुरू गोविन्द सिंह पहले उत्तरी
हिस्सों में जम्मू से गढ़वाल तक छोटे छोटे पहाड़ी राजाओं और वहां के मुसलमान
सरदारों पर हमले करता रहा । कभी कभी
मुगलों के छोटे लश्कर से झड़पें होती रहती थीं । आखिरकार गुरू गोविन्द
सिंह ने एक बहुत बड़े लश्कर के साथ आनन्द पुर के किले में रूक गया। औरंगजेब ने
जब देखा कि गुरू गोविन्द अपनी हद से आगे बढ़ता जा रहा है और सिक्खों को फौजी
ट्रेनिंग देने में लगा हुआ है तब औरंगजेब गोविन्द सिंह के खिलाफ हरकत में आया इतनी
सख्ती से गोविन्द सिंह पर हमले शुरू किये कि गोविन्द सिंह आनन्द पुर से भाग कर
पंजाब के मैदानी इलाकों की तरफ बढ़ा।
लेकिन अब मुगल
उसके पीछे लग गये थे गोविन्द सिंह एक जगह से दूसरी जगह भागता रहा आखिर एक जाट के
घर में उसे घेर लिया गया इस बीच उसके दो लड़के मारे गये और वो खुद भाग निकलने में
काम्याब हो गया गोविन्द सिंह जगह जगह फिरता रहा और कई बार मुगलों के हमलों से
बचा आखिर सरहिंद की तरफ बढ़ा सरहिंद में
फिर मुगलों के साथ टकराव हुआ और वहां उसके दो और लड़के मारे गये इस तरह गोविन्द
सिंह बड़ा मायूस हुआ जब उसने देखा कि सिक्ख भी उसका साथ छोड़ते जा रहे हैं और
उसकी ताकत भी खत्म हो रही है तब वो बीकानेर के रास्ते से दक्किन की तरफ भाग गया।

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