मुगल बादशाह औरंगजेब आलमगीर (भाग-10)
शिवाजी ने जब
अंदाजा लगाया कि औरंगजेब का मामू शाइस्ता खान तो उसे खत्म कर देगा इसलिए उसने
शाइस्ता खान को नुकसान पहुंचाने के लिए एक चाल चलने का इरादा किया।
शाइस्ता खान के
सालारों में से एक सालार जसवंत सिंह था। शिवाजी ने अंदर ही अंदर जसवंत सिंह से
राब्ता किया और जसवंत सिंह को कहला भेजा कि अगर वो शाइस्ता खान के हरम पर हमला
करे तो जसवंत सिंह उसका साथ दे जसवंत सिंह ने उसकी पेशकश कुबूल कर ली।
शिवाजी ने मक्कारी
से आधी रात में पूना में कुछ लोगों के साथ शाइस्ता खान के हरम में दाखिल होकर कई
लोगों को जख्मी कर दिया औरतों बच्चों को तक नहीं छोड़ा शाइस्ता खान का एक लड़का
, एक सालार, चार नौकर और हरम की छ: औरतें कत्ल कर दी गईं और शाइस्ता खान के दो बेटों के
अलावा कई औरतों को सख्त जख्म आये और इस कार्यवाही के बाद शिवाजी वहां से फरार
होने में काम्याब हो गया। पूना में ये कार्यवाही करने के बाद शिवाजी के हौंसले
बढ़ गये और अब उसने सूरत शहर को अपना निशाना बनाने का इरादा कर लिया । सूरत शहर
में उस वक्त अंग्रेज भी ठहरे हुए थे वहां अंग्रेजों ने कुछ कारखाने बना रखे थे और
कई अंग्रेज खानदान भी वहां आबाद थे रात के अंधेरे में शिवाजी ने सूरत पर हमला करके
लगभग आधे शहर को आग के हवाले कर दिया और एक करोड़ रूपिये से ज्यादा का माल लूट
लिया।
कहते हैं शिवाजी
चार हजार सिपाहियों के साथ सूरत शहर में दाखिल हुआ उसने सूरत के हाकिम और बड़े
ताजिरों को पैगाम भेजा कि वो तमाम दौलत अभी उसके हवाले कर दें वर्ना पूरे शहर को
आग लगा दी जाएगी जब कोई जवाब न आया तो शिवाजी ने शहर के एक हिस्से को आग लगा दी
इसी बीच शिवाजी एक अमीर मुसलमान के घर पहुंचा उस ताजिर से शिवाजी ने दौलत मांगी उस
मुसलमान की खुश्किस्मी थी कि उसके पड़ोस में एक अंग्रेज रहता था जिनके सूरत शहर
में कारखाने थे इसलिए उस मुसलमान ने अपने घरवालों के साथ अंग्रेज के घर में पनाह
ले ली।
शिवाजी ने
अंग्रेज को धमकी दी कि वो अलग रहे वर्ना तीन लाख रूपिया दे नहीं तो उन्हें मार
दिया जाएगा या उनके कारखाने को आग लगा दी जाएगी।
कारखाने के मालिक ने शिवाजी की इस घटिया धमकी को ठुकराते हुए साफ कह दिया
कि उसे शिवाजी का चैलेंज कुबूल है इस पर शिवाजी
वापस चला गया।
सूरत और पूना के
हालात को देखते हुए औरंगजेब आलमगीर ने अपने मामू शाइस्ता खान को वापस बुला
लिया और उसकी जगह राजा जयसिंह को शिवाजी
की तरफ रवाना किया।
राजा जायसिंह की
खुशकिस्मती कि जिस वक्त राजा जयसिहं उन इलाकों में पहुंचा उस वक्त शिवाजी अपने
लश्कर और अपने खानदान के साथ पोरबंदर के किले में ठहरा हुआ था। राजा जय सिंह ने
बड़ी तेजी से और चुपके से आगे बढ़ते हुए पोरबंदर नाम कि उस किले को घेर लिया जहां
शिवाजी ठहरा हुआ था और घेरा सख्त कर दिया जब शिवाजी ने देखा कि मुगलों को लश्कर
चारों तरफ फैल गया है और भागने की का कोई रास्ता नहीं है तो उसने धोकाधड़ी से काम
लेते हुए जयसिंह से समझौते का इरादा किया और किले से निकलर वो राजा जयसिंह के
सामने हाजिर हुआ और उससे समझौता करने की दरख्वास्त की ।
आखिर पोरबंदर में
राजा जयसिंह और शिवाजी के बीच एक समझौता हुआ उस समझौत के तहत शिवाजी ने अपने किलों
मे से 23 मुगलों के हवाले कर दिये और अपने पास सिर्फ 22 किले रखे साथ ही उसने ये
भी दरख्वास्त की उसके बेटे सम्भू जी को मुगल अपने लश्कर में शामिल कर लें और
उसकी ये इल्तिजा भी कुबूल कर ली गई उसने जो पिछले दिनों बहुत से इलाकें में लोगों
को जो नुकसान पहुंचाया था उसकी वजह से 40 लाख की रकम का जुर्माना किया उसने ये रकम
13 किस्तों में भरने की हामी भरी। इस
समझौते के बाद औरंगजेब ने उसकी पिछले गैरजिम्मेदाराना धोकेबाजियों को माफ कर
दिया। इस समझौते के बाद शिवाजी औरंगजेब आलमगीर से मिलने आगरा पहुंचा और उसकी दरख्वास्त
पर औरंगजेब ने एक 5 हजार के लश्कर का सालार बनाया लेकिन इस ओहदे से शिवाजी खुश न
हुआ और भागकर वापस चला गया और अपने बेटे सम्भू जी को भी अपने साथ ले गया।
इसलिए कि शिवाजी
की नियत में खोट था। इसलिए वापस जाकर उसने फिर से कार्यवाहियां शुरू कर दीं सारे
मराठों को मिलाने के बाद एक के बाद एक कार्यवाहियां करते हुए उसने तमाम किलों पर
फिर से कब्जा कर लिया जो उसने मुगलों के हवाले किये थे उसके अलावा अपने इलाकों
में अपनी हालत को मजबूत करने के लिए उसने मुगलों के इलाकों में लूटपाट करना शुरू
कर दिया था।
उसको सबक सिखाने
के लिए इस बार औरंगजेब आलमगीर ने अपने बेटे शाह आलम और अपने एक सालार दिलेर खान को
रवाना किया लेकिन दिलेर खान और शाह आलम के बीच कुछ इख्तिलाफ हो गये जिसकी वजह से
वो शिवाजी पर काम्याबी हासिल न कर सके जबकि शिवाजी ने पहले की तरह लूटमार का
सिलसिला जारी रखा औरंगजेब ने आखिर महाबत खान और दिलेर खान को शिवाजी के खिलाफ
रवाना किया लेकिन उन्हें भी काम्याबी हासिल न हो सकी आखिर एक और सालार बहादुर
खान को रवाना किया गया यही बहादुर खान बाद में खानजहां के नाम से मश्हूर हुआ।

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