मुगल बादशाह औरंगजेब आलमगीर (भाग-11)
बाद में खानजहां
के नाम से मश्हूर हुआ।
इस बीच शिवाजी ने
काफी ताकत इकट्ठी कर ली थी। उसने बहुत से मुगल इलाकों पर कब्जा कर लिया था और
उसने लोगों से जमीन की आमदनी का चौथा हिस्सा जबरदस्ती वसूल करना शुरू कर दिया
था। इस बीच हालात शिवाजी के हक में हो गये इसलिए कि बीजापुर का सुल्तान 1672 ई.
में इंतिकाल कर गया तो शिवाजी ने बीजापुर के कुछ इलाकों पर भी नजरे गाढ़ दीं।
इस मौके पर
मुगलों के लिए हालात अजीब हो गये थे इसलिए कि खैबर के अफगानों ने भी बगावतें कर
रखी थीं और औरंगजेब के लश्कर का बड़ा हिस्सा और अच्छे अच्छे सालार खैबर की
बगावतों को दबाने में लगे हुए थे शिवाजी की तरफ छोटे छोटे लश्कर भिजवाते रहे जिन्हें
काम्याबी न हुई इसलिए शिवाजी के हौंसले बढ़ गये उन हालात में जब शिवाजी ने देखा
कि मुसलमानों के छोटे छोटे लश्कर उसका मुकाबला नही कर सके और हर एक को हराने में
काम्याब हो गया तब उसने दक्किन के इलाकों में छत्रपति होने का ऐलान कर दिया जिसका
मतलब था कि वो उन इलाकों का बादशाह है।
उसके बाद उसने
कार्यवाहियां करते हुए उसने कर्नाटक और मैसूर के कुछ इलाकों पर भी कब्जा कर लिया
और उन इलाकों में लगभग एक सौ किले शामिल
थे औरंगजेब अभी तक खुलकर उसके खिलाफ कर्यवाही नहीं कर पाया था कि इसलिए कि वो खैरब
की बगावतों को खत्म करने में बुरी तरह लगा हुआ था।
दूसरी तरफ जब
औरंगजेब आमलगीर ने खैबर में अफगानों की बगावतों को एक तरह से खत्म कर दिया तब
शिवाजी को फिक्र हुई वो समझ गया था कि औरंगजेब ने अगर अफगानों निपटने के बाद अगर उसकी
तरफ रूख किया तो वो उसको उधेड़ कर रख देगा । इसलिए उसने बीजापुर के एक सालार सदी
मसूद के साथ एक समझौता कर लिया जिसके तहत ये पाया गया कि अगर औरंगजेब का लश्कर
शिवाजी पर हमला करेगा तो शिवाजी की मदद बीजापुर का लश्कर करेगा और औरंगजेब ने
बीजापुर पर हमला करने की कोशिश की तो शिवाजी उनकी मदद करेगा।
ये समझौता होने
के बाद शिवाजी ये समझने लगा था कि अब औरंगजेब उसे हरा नहीं सकेगा इसलिए वो अलग अलग
इलाकों में बे नथे बैल की तरह दनदनाने लगा था।
दूसरी तरफ
औरंगजेब भी उसकी हरकतों से बेखबर नहीं था। औरंगजेब अफगानों की बगावत से निपट चुका
था इसलिए उसने शिवाजी का मुकाबला करने के एक ऐंसे सालार को चुना जो फतह को अपना
मुकद्दर और शिकस्त को अपनी जिल्लत और जिल्लत को दुश्मन का मुकद्दर बनाने का
हुनर जानता था। उसका नाम रन मस्त खान था।
रन मस्त खान
मुगलों के बड़े सालारों में एक था वो बड़ा खूंखार तुर्क था और जंग के दौरान दुश्मन
की सफों को उधेड़कर रख देता था। आखिर
शिवाजी पर हमला करने के लिए रन मस्त खान और दिलेर खान को एक लश्कर के साथ रवाना
किया गया ।
दिलेर खान और रन
मस्त ,खान जब अपने लश्करों के साथ दक्किन पहुंचे तो
समझौते के तहत बीजापुर और शिवाजी के लश्करों ने मिलकर उनका मुकाबला करने की ठान
ली। तय ये पाया कि बीजापुर का लश्कर सामने की तरफ से हमला करेगा और पीछे की तरफ
से शिवाजी मुगलों पर टूट पड़ेगा और उन्हें काटकर रख देगा।
शिवाजी की बदकिस्मती
कि उसे ये पता नहीं था कि लश्कर में रन मस्त खान भी शामिल है। इसलिए कि वो रन मस्त
खान को वो अच्छी तरह जानता था चूकि लश्कर का सालार दिलेर खान था दिलेर खान और रन
मस्त खान जब बीजापुर और शिवाजी के लश्करों के पास आए तो रन मस्त को उनके मुखबिरों
के जरिये खबर मिल गई कि उनके लश्कर पर सामने से बीजापुर का लश्कर हमला करेगा और
शिवाजी पीछे से हमला करेगा।
इसलिए रन मस्त
खान ने लश्कर के अगले हिस्से में दिलेर खान को रखा ताकि वो बीजापुर के लश्कर का
मुकाबला करे और पिछले हिस्से में वो खुद रहा ताकि वो शिवाजी पर हमला करे।
जब जंग शुरू हुई
तो बीजापुर के लश्कर ने सामने से हमला किया दिलेर खान ने उन्हें रोककर रख दिया
इतनी देर में जब पीछे से शिवाजी ने हमला किया तो एक कयामत उठ खड़ी हुई पलटकर जब रन
मस्त खान ने उन पर हमले किये और मराठों को काटना शुरू किया तब शिवाजी चकरा कर हर
गया। उसकी समझ में कुछ न आया कि ये कौनसा लश्कर है जिसने मराठों के आधे लश्कर को
लम्हों में काटकर रख दिया।
रन मस्त खान ने
इस कदर तेजी से काम लिया कि उसने लम्हों के अंदर शिवाजी के पड़ाव को घेर लिया और
मराठों को बुरी तरह काटते हुए उनकी हर चीज पर रन मस्त कब्जा करता चला गया था जंग
के दौरान शिवाजी को पता चला कि उसके मुकाबले पर तो रन मस्त आ गया है तो उसके पांव
तले से जमीन खिसकना शुरू हुई और भाग गया।
रन मस्त ने आंधी
तूफान की तरह शिवाजी का पीछा किया और उसका पीछा करते हुए उसने लगभग 4000 मराठाओं को मौत के घाट उतार दिया शिवाजी बड़ी
बेबसी में भागा था। कहते हैं कि तीन दिन तक वो इधर उधर मारा मारा फिरता रहा रन मस्त
के हमले में वो घायल हो गया था फिर वो अपने इलाके में पहुंचा और उसे बुखार हो गया
और इसी बुखार से वो 53 साल की उम्र में मर गया।

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