मुगल बादशाह औरंगजेब आलमगीर (भाग-2)
तख्त पर बैठने
के बाद सबसे पहले औरंगजेब आलमगीर ने दक्षिणी बिहार के इलाकों प्लामू और चटा गांव
को फतह करके अपनी सल्तनत में शामिल किया प्लामू को औरंगजेब के हाकिम दाऊद खान ने
1661ई. में और बंगाल के हाकिम शाइस्ता खान ने 1666 ई. में चाटगांव फतह किया।
उसके अलावा
1665ई. में औरंगजेब आलमगीर की ताकत को देखते हुए लद्दाख के हाकिम ने औरंगजेब की
इताअत कुबूल कर ली थी अपनी सल्तनत में उसने औरंगजेब आलमगीर के नाम के सिक्के
जारी कर दिए थे और पहली बार उसकी राजधानी में आजान की आवाज गूंजी थी इसी बीच वहां
के हिंदूओं ने आपस के झगड़ों से फायदा उठाकर औरंगजेब के खिलाफ बगावत खड़ी करने की
कोशिश की थी। लेकिन औरंगजेब ने हर बागी को बड़ी सख्ती से कुचल कर रख दिया था।
सबसे पहले मंधेला
के चंपत राव मंधेला और नवा नगर काठियावाड़ के राय सिंह ने बगावतें कीं लेकिन
औरंगजेब ने उन पर हमला करके उनकी बगावतों को सख्ती से कुचल दिया उसके बाद बीकानेर
के करण सिंह ने जब सर उठाने की कोशिश की तो उसे भी खूब रगेदा गया । उसके बाद उसने
औरंगजेब से माफी मांगी। इस तरह औरंगजेब ने बहुत से इलाकों में अमन कायम कर दिया।
औरंगजेब के जमाने
की पहली लड़ाई आसाम में लड़ी गइ सोलहवीं सदी के शुरू में एक शख्स ने बंगाल के उत्तरी
इलाके कूच बिहार में अपनी हुकूमत कायम कर ली थी । उसकी नस्ल में तीसरा राजा लक्ष्मी
नारायण था जिसने अकबर की अताअत कुबूल कर ली थी।
बाद में ये
रियासत दो हिस्सों में बंट गई एक नाम कांगोट और दूसरे का नाम कच्छ हाजू था।
1612ई. में लक्ष्मी
नारायण और कुछ हाजों के बीच जंग शुरू हो गई। मुगलों ने इस आपसी लड़ाई का फायदा
उठाते हुए कुछ हाजों पर कब्जा कर लिया। लेकिन इस कब्जे के नतीजे में मुगलों ने
उस नस्ल के तमाम राजाओं को अपना दुश्मन बना लिया था।
असल में इस नस्ल
के लोग तेरहवीं सदी ईसवी में यहां आये थे और उन्होंने आसाम के बीच और उत्तरी
इलाकों में अपनी हूकूमत कायम कर ली थी । ये लोग शैतान की पूजा करते थे और शिकार
करने में माहिर थे। उनके कबीले में जो शख्स ज्यादा ताकतवर होता अपनी हूकूमत कायम
कर लेता और दूसरों को गुलाम बनाकर मकान बनाना शुरू कर देता उनके लश्कर में केवल पैदल
सिपाही थे या फिर हाथी हुआ करते थे।
जब ये लोग
औरंगजेब आलमगीर से टकराये तो उस वक्त तक उन्होंने बंगाल के साथ झडि़यों के दौरान
आग जलाने के सामन जंगल में इस्तेमाल करने का तरीका सीख लिया । लेकिन जब औरंगजेब
आलमगीर उनके खिलाफ हरकत में आया तो औरंगजेब का मुकाबला न कर सके औरंगजेब ने उनको
अपने सामने सर न उठाने दिया। तख्त पर बैठने के बाद औरंगजेब आलमगीर को बंगाल में
भी कुछ बागवतों का सामना करना पड़ा दर असल बिहार और आसाम के राजा पूरब और पश्चिम
के इलाकों पर हमला करते हुए आगे बढ़े और वो इलाके जो मुगलों की सल्तनत मे शामिल
थे उनमें से कुछ हिस्सों पर कब्जा कर लिया।
ये औरंगजेब
आलमगीर की हूकूमत का शुरू का जमाना था इसलिए उस वक्त औरंगजेब का कोई बड़ा लश्कर
वहां मौजूद नहीं था । इसलिए बागीयों ने गोवाहाटी शहर पर कब्जा कर लिया और पूरे
जिले में उन्होंने लूट मार मचाकर रख दी उन्होंने बिहार के अंदर जो मुगलों का लश्कर
था उसे भी पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था।
उन हालात से
निपटने के लिए औरंगजेब ने अपने एक सालार मीर जुमला को जून 1660ई. में बंगाल का
हाकिम बनाकर भेजा और ये हुक्म दिया कि वो बागी राजाओं की बगावत को सख्ती से
दबाये जो उसके सामने झुकने से इंकार करें
उन्हें सख्त सजाएं दी जायें।
मीर जुमला ने 11
नवम्बंर 1661ई. में बारह हजार घुड़सवारों और सौ पियादों तीन सौ तीस समुद्री कश्तियों
के साथ बागीयों पर हमला कर दिया। उसने 29 दिसम्बर को बिहार पर कब्जा कर लिया। उस
कब्जे के लिए उसे किसी मुश्किल का सामना नहीं करना पड़ा। वो इसलिए कि जब बागी
राजाओं को खबर हुई कि उनकी बगावत को दबाने के लिए औरंगजेब आलमगीर का एक लश्कर
उनपर हमला करने के लिए आ रहा है तो औरंगजेब का नाम ही उनके लिए दहशत बन गया था और
वो भाग खड़े हुए।
इसलिए बिहार का
वो इलाका मीर जुमला के कब्जे में आ गया उसके बाद मीर जुमला 14 जनवरी 1662ई. को आसाम पर हमला करने के लिए
रवाना हुआ ।
आसाम पर हमला
करने के लिए मीर जुमला को सख्त मुसीबतों का सामना करना पड़ा उसको और उसके
सिपाहियों को रास्ते की वजह से अजीब परेशानियों का सामना करना पड़ा क्योंकि तमाम
रास्ता घने जंगलों और तेज रफ्तार नदी नालों से घिरा हुआ था ।

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