मुगल बादशाह औरंगजेब आमलगीर (भाग-8)
जो लश्कर अकबर , दुर्गादास और जयसिंह लेकर आ रहे थे। उस लश्कर की तादाद औरंगजेब के उस लश्कर
से ज्यादा थी जो उस वक्त औरंगजेब आलमगीर के पास था लेकिन औरंगजेब ने अपनी हिम्मत
और दिलेरी का मुजाहिरा किया अपने बेटे मुअज्जम और दूसरे सालारों को लेकर वो अजमेर
से निकला। अजमेर से लगभग दस मील के फासले पर उसने बागियों से टकराने का इरादा कर
लिया था।
इस मौके पर
औरंगजेब ने अपनी अक्लमंदी और सूझ बूझ से काम लेते हुए बगैर लड़े ही बागियों को
भाग जाने और बिखर जाने पर मजबूर कर दिया था। दरअसल औरंगजेब के बेटे अकबर को बगावत
पर उकसाने में जहां महाराणा राज और दुर्गादास का हाथ था वहां सबसे बड़ी उकसाहट
सबसे बड़ी मदद औरंगजेब के एक सालार तहूर खान की तरफ से थी।
तहूर खान जंग का
बहुत तजुर्बा रखता था और जो लश्कर अकबर के पास था उसका सालार एक तरह से तहूर खान
ही था और ये सारी हिम्मत और जसारत अकबर ने तहूर खान ही के बलबूते पर की थी।
अब हालात ये थे
कि तहूर खान का सुसर जिसका नाम इनायत खान था वो औरंगजेब के लश्कर में शामिल था और
औरंगजेब का वफादार था। औरंगजेब ने सबसे पहले ये काम किया कि इनायत खान की तरफ से
उसने तहूर खान के नाम एक खत भिजवाया।
उस खत में तहूर
खान के सुसर इनायत खान ने तहूर खान को लिखा कि वो सिर्फ एक बार औरंगजेब से मिल ले
तो उसकी तमाम गल्तियों को माफ कर दिया जायेगा। आगर वो ऐसा नहीं करता तो उसकी बीवी
और लड़कों को मौत के घाट उतार दिया जाएगा।
जब तहूर खान को
अपने सुसर की तरफ से ये खत मिला तो वो अकबर दुर्गादास और जयसिंह को बताए बगैर रात
के अंधेर में अकेला अपने खेमे से निकला और औरंगजेब आलमगीर की खिदमत में हाजिर होने
से पहले ही उसकी बदकिस्मी थी कि जब वो
औरंगजेब आलमगीर के पड़ाव में दाखिल हुआ तो औरंगजेब के वफादार लश्करी पहले ही उसके
खिलाफ तपे बैठे थे उनको ये खबर नहीं थी कि उसे उसके सुसर इनायत खान ने बुलाया है
इसलिए जैसे ही तहूर खान पड़ाव में दाखिल हुआ कुछ सिपाहियों ने उसे मौत के घाट उतार
दिया।
इसी बीच औरंगजेब
ने अपने बेटे अकबर को एक खत लिखा और उस खत के जरिये उसके एक तरह से बागी राजपूतों
को हिलाकर रख दिया था । इस खत में अकबर के नाम औरंगजेब ने लिखा कि मैं तुम्हारी
पॉलिसी की तारीफ किये बगैर नहीं रह सकता। जिसके तहत तुमने दुश्मन राजपूतों को
मेरे इतने पास कर दिया कि मैं आसानी से उनका खात्मा कर सकता हूं इस खत में
औरंगजेब ने अकबर को ये भी हिदायत दी थी कि आगे से वो राजपूतों को अपने और औरंगजेब
के लश्कर के बीच इस तरह आमने सामने कर दे कि दोनों तरफ से उनपर हमला करके उनका
खात्मा कर दिया जाए।
औरंगजेब के वो
कासिद जो खत लेकर रवाना हुए उन्होंने औरंगजेब के कहने पर वो खत अकबर को देकर के
दुर्गादास को दे दिया।
दुर्गादास ने जब
वो खत पढ़ा तो उसके पांव तले जमीन खिसक गई वो उस खत के बारे में बातचीत करने के
लिए अकबर की तरफ भागा लेकिन रात हो चुकी थी और वो सो गया था इसलिए अकबर के
सिपाहियों ने उसे जगाने से मना कर दिया था।
ये हालात देखते
हुए दुर्गादास तहूर खान की तरफ भागा जब वो उसके खेमे में गया तो उसने देखा कि उसका
खेमा खाली है पता चला कि वो तो औरंगजेब की तरफ चला गया है।
तहूर खान की गैर
मौजूदगी में दुर्गादास और ज्यादा परेशान हो गया और उसे यकीन हो गया कि राजपूत सख्त
खतरे में हैं और मुगल उनको दोनों तरफ से घेर कर उनको कत्ल कर देंगे इसलिए रात के
अंधेरे में राजपूत अपनी जानें बचाने के लिए लड़े बगैर भाग गये ।
रात को जब राजपूत
भागे तब बहुत से मुगल सिपाही जो तहूर खान और अकबर का साथ दे रहे थे वो भी चोरी
छुपे औरंगजेब के लश्कर में शामिल हो गये । शहजादा अकबर की जब सुबह आंख खुली तो
उसने अपने पास सिर्फ 300 घुड़सवारों को अपने पास पाया और बाकी सब औरंगजेब आलमगीर
के पास चले गये थे। राजपूत पहले ही गायब हो चुके थे। इस परेशानी में उसने अपने
बीवी बच्चों को साथ लिया और राजपूतों के पीछे भाग खड़ा हुआ।
दो लड़के और तीन
लड़कियां औरंगजेब के पास आ गये। ये हालत मेवाड़ के राजा के लिये बड़ी परेशान कर
देने वाली थी। इसलिए उसने औरंगजेब की इताअत कुबूल कर ली । और मारवाड़ों के इलाके
के हालात जैसे तैसे बने रहे।

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