मुगल बादशाह औरंगजेब आलमगीर
औरंगजेब आलमगीर 15जून 1659ई. को हिंदुस्तान के
ताज व तख्त के मालिक बने । अपने बाप शाहजहां की जिंदगी ही में वो तख्त पर बैठ
गये थे उन्हें हुकूमत हासिल करने के लिए अजीब कश्मकश का सामना करना पड़ा ।
असल में शाहजहां
के चार बेटे थे। दारा शिकोह, मुराद बख्श, शाह शुजाअ, और औरंगजेब आलमगीर ।
शाहजहां के बड़े
बेटे दारा शिकोह ने अपने बाप के दिमाग पर
कब्जा कर रखा था वो एक तरह से अपने बाप
की जिंदगी में ही हुकूमत का मालिक बन बैठा था इसके अलावा शाहजहां भी अपनी औलाद में
सबसे ज्यादा दारा शिकोह को ही पसंद करता था और उसपर भरोसा करता था और उसने दारा
शिकोह को अपना वारिसा भी बना दिया था।
इसमें कोई शक
नहीं कि औरंगजेब आलमगीर ने मुगलिया सल्तनत की बेहद खिदमत की हकीकत में उसकी खिदमत
का सिला न मिल सका था उसके अलावा शाहजहां ने अपनी जिंदगी में दारा शिकोह को अच्छे
इलाकों का हाकिम बनाया था और उसे कई ओहदे दे रखे थे।
जबकि औरंगजेब को
दक्किन की तरफ फेंक दिया गया था। जहां औरंगजेब को अपने बाप के फैसले मंजूर नहीं थे
वहीं उसे अपने भाई दारा शिकोह पर भी भरोसा नहीं था ।
औरंगजेब आलमगीर
सच्चे पक्के मुसलमान थे जबकि दारा शिकोह का रूझान हिंदू मत की तरफ ज्यादा
था दारा शिकोह ने अपने अपने बाप की मोहब्बत
का फायदा उठाया आखिर वक्त में शाहजहां के तमाम सलाहकार इंतिकाल कर चुके थे तो
दारा शिकोह ने अपने लिए मैदान खाली पाकर ताज तख्त पर कब्जा कर लिया वो जो चाहता
शाहजहां से मनवा लेता था।
अचानक शाहजहां
बीमार हो गया वो लगभगर एक हफ्ते तक मौत जिंदगी के बीच झूलता रहा इस बीच वो लोगों
से रोज झरोके में मिलता । इसलिए चारो तरफ ये खबर फैल गई कि शाहजहां बीमारी की हालत
में हैं और जल्द वफात पा जायेगा।
शाहजहां की
बीमारी के वक्त दारा शिकोह तो उसके बाप के पास था। दूसरा बेटा मुराद बख्श उस वक्त
गुजरात का हाकिम था और गुजरात में ही था ।तीसरा बेटा शुजाअ बंगाल में था और
औरंगजेब उस वक्त दक्किन में था। दारा शिकोह का इरादा ये था कि पहले मुराद को खत्म
किया जाए और उसके बाद शुजाअ को ठिकाने लगाया जाए और उसके बाद औरंगजेब से निपटे और
फिर ताज व तख्त का मालिक बन जाए। उसे सबसे ज्यादा खतरा औरंगजेब से ही था इसलिए
उसने औरंगजेब को ज्यादा से ज्यादा कमजोर करने और अपने सामने झुकाने की कोशिश ।
शाहजहां ने भी उसका साथ दिया इसलिए औरंगजेब भड़क उठा।
अब शाहजहां के चारों
बेटों के बीच एक तरह से ताज व तख्त के लिए जंग शुरू हो गई। इस जंग में औरंगजेब ने
साबित कर दिया कि वो काबिल सिपाही और समझदार सियासतदां है।
कहने को सारे भाई
उसके खिलाफ थे वो चारों तरफ से खतरों में घिरा हुआ था मगर उसने अक्लमंदी से काम
लेते हुए हर तरफ अपनी नजर जमाए रखी और अपने लिए बहुत ही जिम्मेदार लोगों को चुना।
औरंगजेब को लोगों
को परखने की कुदरती ताकत थी वो दोस्त व दुश्मन को पहली ही नजर में पहचान लेता था
इसलिए उसे अपने आसपास वफादार साथी इकट्ठे करने में कोई परेशानी नहीं हुई ।
जब शाहजहां की
बीमारी का फायदा उठाते हुए सारे भाईयों ने ताज व तख्त हासिल करने की कोशिशें शुरू
की तो औरंगजेब ने भी 30 मार्च को तख्त हासिल करने की कोशिश शुरू की।
वो बुरहानपुर से
देहली की तरफ रवाना हुआ और तीन महीने में दो दरिया पार करके दो बड़ी जंगे लड़ीं और
राजधानी पर कब्जा कर लिया। असल बादशाह अपने बाप शाहजहां को 18 जून को नजरबंद करके
खुद तख्त पर बैठ गया।
तख्त की ये जंग
जीतने के बाद औरंगजेब 15 जून 1659ई. को देहली में मुहीउद्दीन मोहम्मद औरंगजेब
आलमगीर के नाम से तख्त पर बैठा।
तख्त पर बैठने
के बाद वो लगभग 20 साल तक आगरा और देहली में ठहरा रहा उसके बाद 1663ई. में कश्मीर
गया और उसके बाद 1674ई. और 1675ई. में लगभग डेढ़ साल तक सरहदी कबीलों की बगावतों
को दबाने के इरादे से हसन अब्दान में रूका। 1679ई. में वो मारवाड़ को मुगल सल्तनत
में शामिल करने के इरादे से निकला जहां वो ढाई साल तक राजपूतों से जंगों में उलझा
रहा इस तरह दुश्मनों के खिलाफ लंबी जंगी मुहिम में लगा रहा । इतिहासकार उसकी
जिंदगी को दो भाग 25 -25 साल में बांटते
हैं उसकी जिंदगी का पहला दौर जो उत्तरी इलाकों में गुजरा और दूसरा जो दक्किन में
गुजारा।
औरंगजेब आलमगीर
अपने लोगों के अलावा बाहरी मुल्कों में भी इस कदर अजीज था कि उसके तख्त पर बैठने
के बाद मक्का शरीफ के अलावा ईरान,बल्ख,बुखारा,काशगर,खेवा के हाकिमों के अलावा बस्रा,हज्र मौत , यमन, इब्ने सीना की हुकूमतों से उसके रिश्ते कायम
हो गये उसके बाद 1690ई. में कुस्तुनतुनिया से भी उसके रिश्ते कायम हो गये वो ऐसा
नेक दिल बादशाह था कि कभी उसने किसी सफीर को मायूस नहीं किया। ज्यादातर हूकूमतों
और हुक्मरानों के साथ अपने बाप दादाओं के वक्त की पुरानी दुश्मनीयों को उसने एक
दम खत्म करके रख दिया औरंगजेब की हुकूमत में मध्य एशया पूरब में बहुत इज्जत की
नजर से देखा जाने लगा और बहुत सी छोटी छोटी गैर मुल्की हुकूमतों और रियासतों ने
भी उस दौर में औरंगजेब से मदद हासिल करके अपनी हुकूमत को काम्याब बनाया था ।

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