राजपूतों को
हराने के बाद औरंगजेब आलमगीर के लिए मराठों की शक्ल में एक और मुसीबत उठ खड़ी हुई
उस वक्त मराठों की कमान शिवाजी के हाथों में थी । शिवाजी अप्रैल 1627 ई. को एक
पहाड़ी किले मैं पैदा हुआ था । उसके बाप साऊ जी ने उसकी मां जीजा बाई की मर्जी के बगैर
दूसरी शादी रचाई थी इसलिए जीजाबाई का पूरा ध्यान अपने लड़के शिवाजी की तरबियत पर
था।
जीजाबाई बड़ी
कट्टर हिंदू औरत थी और मुसलमानों से सख्त नफरत करती थी इसलिए उसने शिवाजी के
कानों में बचपन से ही मुसलमानों के खिलाफ नफरत की कहानियां भरना शुरू कर दीं थीं
इस तरह जीजाबाई अपने बेटे को मुसलमानों के खिलाफ नफरत सिखाकर उसे मुसलमानों के
खिलाफ जंग पर उकासा रही थी।
उसके अलावा जीजा
बाई ने अपने बेटे शिवाजी की पढ़ाई के लिए जो उस्ताद रखा था वो भी जीजाबाई की तरह
कट्टर हिंदू था और उसने भी शिवाजी के दिमाग में मुसलमानों के खिलाफ नफरत ही भरी।
जवान होने के बाद
उस शिवाजी ने हिंदू साधुओं से हिंदू समाज की तरक्की के मश्वरे करना शुरू कर दिये
उसका गुरू एक शख्स स्वामी रामदास था और उसने शिवाजी को पहला सबक ये दिया कि
ब्रहमण और गाय की हिफाजत करना उसका पहला धर्म है इसलिए गाय के नाम पर हिंदूओं को
आसानी से लड़ाया जा सकता है। स्वामी रामदास ने शिवाजी को हिंदू राज कायम करने के
लिए उसका हौसला बढ़ाया।
शिवाजी ने जिस
माहौल में परवरिश पाई थी उसकी जरूरत यही थी कि वो एक हिंदू रियासत कायम करे और
मुसलमानों की गुलामी से आजादी हासिल करे। उसकी हरकतों से ये साफ होने लगा था कि वो
पूरे हिंदुस्तान पर हिंदू राज कायम करना चाहता है उसने हिंदू राजाओं के साथ अंदर
ही अंदर गठ जोड़ शुरू कर दी राजपूतों को भी अपने साथ मिलाना शुरू कर दिया था। अपनी
फौजी तैयारियां शुरू करने से पहले शिवाजी ने मावल के इलाके के रहने वालों को अपने
साथ मिलाना शुरू कर दिया और यहां के लोग खेतीबाड़ी छोड़कर शिवाजी की फौज में शामिल
हो गये ।शिवाजी बचपन में राजा बनने के ख्वाब देख रहा था । आखिर उसे मुसलमानों के
खिलाफ लड़ने का एक मौका मिल ही गया । 1664 ई. में बीजापुर का सुल्तान सख्त बीमार
हो गया और उसकी हुकूमत में अफरातफरी फैल गई इस अफरातफरी से शिवाजी को मौका मिल गया
जिसकी वजह से उसने अपने मकसद को पूरा करने का इरादा कर लिया।
सबसे पहले शिवाजी
ने पूना के दक्षिण पश्चिम में तूना नाम के किले पर कब्जा कर लिया उसके बाद 5मील
के फासले पर एक और किला रायगढ़ पर भी कब्जा हो गया उसके बाद उसने कुछ जागीरों और
किलों जैसे बारा नदी, अंदोपुर और बहुत से
किलों पर कब्जा करके अच्छी ताकत हासिल कर ली थी।
दूसरी तरफ
बीजापुर के सुल्तान की हालत में जब कुछ सुधार हुआ और उसे जब शिवाजी की हरकतों का
पता चला तो उसे बड़ी पेरशानी हुई अब जब शिवाजी ने दो और इलाकों यानी कल्याण और
कोकान पर भी कब्ज कर लिया तो बीजापुर के सुल्तान ने शिवाजी के खिलाफ हरकत में
आने का फैसला किया ।
आखिर बीजापुर के
सुल्तान ने अपने एक सालार मुस्तफा को मराठों के खिलाफ हरकत में आने के लिए कहा ।
मुस्तफा ने सबसे पहला काम ये किया कि शिवाजी के बाप साऊजी को गिरफ्तार करके उसकी
सारी जागीर जब्त कर ली। शिवाजी को जब इस बात की खबर हुई तो बड़ा परेशान हुआ इसलिए
उसने चालबाजी से काम लेते हुए अपनी फौजी कार्यवाहियां बंद कर दीं । शिवाजी की
कार्यवाही से बीजापुर का सुल्तान भी खुश हो गया था उसने शिवाजी के बाप को रिहा कर
दिया । शिवाजी भी यही चाहता था उसने खामोशी इख्तियार करके एक तरह से अपने बाप को
रिहा करा लिया था । लेकिन बीजापुर के सुल्तान ने शिवाजी के बाप साऊजी को चेतावनी
दी थी कि वो अपने बेटे शिवाजी को बागियाना रवैये से रोके रखे और साऊजी ने वादा
किया था कि वो अपने बेटे को बागियाना हरकतों से रोकेगा।
अपने बाप के कहने
पर शिवाजी ने 6 साल तक कोई हरकत न की और अंदर ही अंदर वो अपने लश्कर को बढ़ाता
रहा और अपनी ताकत में इजाफा करता रहा। 6 साल बाद शिवाजी ने फिर कार्यवाहियां शुरू
कर दीं इस पर बीजापुर के सुल्तान ने अपने एक सालार अफजल खान को शिवाजी से निपटने
के लिए रवाना किया उस मौके पर शिवाजी ने बड़ी मक्कारी से काम लिया और उसने अफजल
खान से मिलना चाहा जब अफजल खान उससे मिला तब शिवाजी ने उसे धोके से मार डाला और
उसके लश्कर को लूट लिया।
इन हालात की खबर
जब औरंगजेब आलमगीर को हुई तो औरंगजेब ने अपने सालार शाइस्ता खान को दक्किन का
अपनी तरफ से गर्वनर बनाकर भेजा। शाइस्ता खान औरंजेब का मामू भी था । शाइस्ता खान
एक अच्छा सालार भी था और औरंगजेब चाहता था कि वो शिवाजी को काबू करे इतनी देर तक
बीजापुर का सुल्तान भी शिवाजी के खिलाफ हरकत में आ चुका था और उसके एक सालार ने
शिवाजी पर हमला करके उससे एक किला छीन लिया था । इसी बीच 19 मई को शाइस्ता खान भी
अपने लश्कर के साथ शिवाजी के इलाकों में पहुंचा था सबसे पहले शाइस्ता खान ने पूना पर हमला किया और वहां
जितने भी शिवाजी के हिमायती थे उन्हें पीसकर रख दिया और उनका खात्मा करने के बाद
पूना पर कब्जा कर लिया।
पूना के बाद
शाइस्ता खान चगान नाम कि किले की तरफ बढ़ा और उसे भी शिवाजी के समर्थकों से खाली
करा लिया । इससे शिवाजी को बड़ी मायूसी हुई और उसने अपनी कार्यवाहियों का रूख
सरहदी इलाकों की तरफ मोड़ दिया। लेकिन शाइस्ता खान ने आगे बढ़कर शिवाजी के एक और
किले कल्याण पर कब्जा कर लिया था।

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