मुगल बादशाह औरंगजेब आलमगीर (भाग-5)
युसुफजई कबीले ने
पिशावर के पश्चिमी हिस्सों में भी लूट मार मचा दी वहां के मुगल सालार कामिल खान
ने उन्हें रोकना चाहा लेकिन वो ऐसा न कर सका। मई 1667ई. में मुगल लश्कर को एक
सालार शमशेर खान की निगरानी में सिंध नदी पार करके युसुफजई कबीले पर हमला करने के
लिए भेजा गया । शमशेर खान युसुफजई इलाकों में घुस गया उन्हें सख्त नुकसान
पहुंचाया और उनके गांव के गांव उसने बर्बाद कर दिये और युसुफजई के बहुत से इलाकों
पर उसने कब्जा करने के बाद उसने दरिया –ए पंजशेर तक उनका पीछा किया ।
सितम्बर के
महीने में मुगलों की तरफ से अफगानिस्तान के हाकिम मोहम्मद अमीन खान ने एक मुहिम
की शुरूआत की और युसुफजई कबीले को बहुत नुकसान पहुंचाया और उसके बाद युसुफजई कबीले
को कई साल तक बगावत करने की हिम्मत नहीं हुई।
उसके बाद खेबर के
कबीलों ने 1672 ई. में बगावत शुरू कर दी
उसके साथ ही आफरीदी कबीलों ने सरदार अकमल की निगरानी में न सिर्फ बागावत की
बल्कि अकमल को अपना बादशाह भी मान लिया और मुगलों के खिलाफ जिहाद का नाम देकर एक
नये मिशन का आगाज कर दिया।
अकमल की ताकत
इतनी बढ़ी कि उसने अफगानिस्तान के हाकिम मोहम्मद अमीन खान पर भी हमला कर दिया
वहां उन्होंने मुगल लश्कर को बहुत नुकसान पहुंचाया लेकिन मोहम्मद अमीन खान किसी
न किसी तरह से अपनी जान बचाकर भागने में काम्याब हो गया ।
कहते हैं कि
आफरीदियों ने अपने उन हमलों में दस हजार के लगभगर लोगों को मौत के घाट उतार दिया
और लाखों रूपियों का सामान लूट लिया और 20 हजार मर्द औरतों को गिरफ्तार कर लिया ।
गिरफ्तार किये गये लोगों में अफगानिस्तान के मुगल हाकिम मोहम्मद अमीन खान की मां
, बीवी , और लड़की भी शामिल थी। उस फतह के बाद अकमल खान के साथ कंधार तक के सभी कबीले
शामिल हो गये इस तरह उसकी ताकत में इजाफा हो गया । उन्हीं दिनों मश्हूर शायर
खुश्हाल खान खटक भी आफरीदियों के साथ जा मिला और मुगलों के खिलाफ लड़ता रहा अपने
शअरों से भी उसने अफगानों में एक नई जान डालने की कोशिश की।
इन गंभीर हालात
को देखते हुए औरंगजेब आलमगीर ने मोहम्मद अमीन खान को वापस बुला लिया और उसकी जगह
दक्किन से महावत खान को बुलाकर अफगानिस्तान का हाकिम बना दिया । लेकिन महावत खान
कोई काम्याबी हासिल न कर सका और खैबर का रास्ता पहले की तरह ही बंद रहा।
ये हाल देखते हुए
महावत खान को वापस बुला लिया गया और उसकी जगह शुजाअत खान और एक सालार जसवंत सिंह
को राजपूतों के एक लश्कर के साथ भेजा गया।
औरंगजेब ने इसी
पर बस नहीं किया बल्कि हालात की नजाकत को देखते हुए उसने लश्कर के एक हिस्से के
साथ् खुद पश्चिम का रूख किया और हसन अब्दाल पहुंच गया इस मौके पर उसके साथ एक
तुर्क सरदार ओगर खान भी था जिसकी बहादुरी , दिलेरी, और ताकत का उन दिनों दूर
दूर तक चर्चा था।
सबसे पहले
औरंगजेब ने दो काम किये सबसे पहले जो कबीले समझौता करना चाहते थे उसने उनकी पेंशन
शुरू कर दी। जो बागवतों में हिस्सा ले रहे थे उनपर उसने ओगर खान को मुसल्लत कर
दिया जो जंग करने का बहुत अच्छा तजुर्बा
रखने के साथ साथ बागावतों को कुचलने और लश्करों को शिकस्त देने का भी
माहिर था। ओगर खान की तुर्कताज और हमले के नतीजे में गौरी व गलजई और युसुफजई
कबीलों की सरगर्मीयां न सिर्फ कमजोर पड़ गई बल्कि दूसरे आजाद कबीले भी औरंगजेब के
सामने झुक गये।
इस तरह ओगर खान
बगावतों को दबाने में काम्याब रहा ओगर खान के बारे में इतिहासकार लिखते हैं कि
उसने जंगों में इस कदर कारनामे अंजाम दिये उसके कारनामों की वजह से उन इलाकों में
उसकी हैवत का ये आलम था कि अफगान औरतें उसका नाम लेकन अपने बच्चों को सुलाया करती
थीं।
इस तरह 1675 ई.
तक उन इलाकों में औरंगजेब ने पूरे तौर से काबू पा लिया था यहां तक कि औरंगजेब दिल्ली
वापस चला गया । उसने अमीर खान को काबुल का हाकिम बनाया। अमीर खान ने बहुत ही काम्याबी
के साथ हालात को संभाले रखा उसने कबीलों
के साथ अच्छे रिश्ते कायम किये और उनके अंदर घुल मिल गया यहां तक कि कबाईली लोग
अपने मामलात में भी उससे मश्वरा करने लगे।
दूसरी तरफ अफगान
लीडर अकमल खान की ताकत बिखर चुकी थी जिसकी वजह से आफरीदियों ने भी मुगलों से दोस्ताना
रिश्ते कायम कर लिये और खेबर के दर्रे से बे फिक्री से लोग आने जाने लगे सिर्फ
खुशहाल खान खटक अकेला लड़ता रहा उसका बेटा भी उसका साथ छोड़ गया खुशहाल खान को
गिरफ्तार करके जिला वतन कर दिया गया और उसने जिंदगीभर औरंगजेब के खिलाफ भड़काने
वाली नज्में कहना अपनी जिंदगी का मकसद बना लिया ।

Comments
Post a Comment