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                         जहांगीर और नूरजहां भाग-4 लेकिन तख्‍त पर बैठने के बाद जहांगीर ने उसकी ये गल्‍ती माफ कर दी और उसे बंगाल की जागीर पर बहाल रखा । शेर अफगन के कत्‍ल के बाद उसकी बीवी मेहरून्निसा (नूरजहां) को उसकी बेटी लाडली बेगम के साथ जहांगीर के दरबार में भेज दिया गया। मेहरून्निसा को अकबर की बीवी सलीमा बेगम की खिदमत पर लगा दिया गया । सन् 1611 ई. में जश्‍ने बहार के मौके पर पहली बार इत्तिफाक से नूर जहां को देखा तो उसका दीवाना हो गया और दो माह बाद ही उससे शादी कर ली । जहांगीर ने उसे नूर महल का नाम दिया । अपनी काबिलियत के दम पर नूरजहां बहुत जल्‍द जहांगीर के करीब होती चली गई । उसके बाप को इतिमातुद्दौला का खिताब दिया गया और उसके भाई को तरक्‍की दी गई। शेर अफगन नूरजहां और जहांगीर के बारे में अनगिनत कहानियों ने जन्‍म लिया । कुछ लोगों ने लिखा कि जहांगीर अकबर के जमाने में ही नूरजहां की मोहब्‍बत में गिरफ्तार हो गया था लेकिन उसकी मंगनी शेर अफगन के साथ हो गई थी इसलिये जहांगीर के रास्‍ते में बहुत ज्‍यादा मुस्किलें पैदा हो ...

Mughal Badshah Jalal ud-din Akbar [part-16]

मुगल बादशाह जलालुुुुुुुद्दीन अकबर (भाग-16)




दक्षिण पर हमला करने के लिए खान खाना और शहजादे मुराद के लश्‍कर आपस में मिल गये और उन्‍होंने दक्षिण की तरफ कूच किया।

दक्षिण के हालात उन दिनों अजीब व गरीब थे कहने को तो पांच हुकूमतें थीं लेकिन उनमें दो हुकूमतें बड़ी अहम थी एक अहमद नगर और दूसरी बीजापुर,  अहमद नगर के बादशाह हुसैन निजाम शाह की बेटी चांद बीबी की शादी 14 साल की उम्र में बीजापुर के आदिल शाह से हुई थी और साथ ही आदिल शाह की बहन की शादी चांद बीबी के भाई से हुई इस तरह अहमद नगर और बीजापुर के बीच जो इससे पहले जंगों का सिलसिला रहता था वो खत्‍म हो गया ।

चांद बीबी की शादी 1564ई. हुई लेकिन बदकिस्‍मती से 1580ई. में उसका शौहर मर गया उस वक्‍त उसकी उम्र सिर्फ 28 साल थी। अहमद नगर में चांद बीबी के भाई निजाम शाह के मरने के बाद अहमद नगर के तख्‍त के दो दावेदार थे । एक निजाम शाह का लड़का बहादुर शाह और दूसरा अहमद शाह जो निजाम शाह के भाई का पोता था। इस बीच चांद बीबी बीजापुर से अपने मायके अहमद नगर आ गई थी।

अकबर पहले ही इन इलाकों पर हमला करने का इरादा कर चुका था इस बीच अहमद नगर के एक सरदार मियां मंजूद ने भी मुगलों को हमला करने की दावत दी तब मिंया मंजूद और चांद बीबी के बीच इख्तिलाफ हो गया। मियां मंजूद अहमद का तरफदार था जबकि चांद बीबी अपने भाई के बेटे की तरफदारी कर रही थी।

अकबर को बेटा मुराद और खान खाना अब्‍दुर्रहीम जब अपना लश्‍कर लेकर अहमद नगर पहुंचे और अहमद नगर का मुहासरा किया तो चांद बीबी ने डटकर मुकाबला किया कहने को मुगलों ने अहमद नगर की दीवारों में रास्‍ता बना दिया था लेकिन चांद बीबी ने बहादुरी का मुजाहिरा किया वो नकाब ओढ़कर किले की दीवारों के टूटे हुए हिस्‍सों के पास आई उस जगह पर बहुत सी तोपें तैनात कर दीं और मुगलों को किले में दाखिल नहीं होने दिया । कहते हैं कि चांद बीबी पूरी रात दीवार के पास खड़ी रही किले के तमाम मर्द और औरतें किले की टूटी हुई दीवार की मरम्‍मत करती रहीं इस तरह उन्‍होंने दीवार के टूटे हुए हिस्‍से को बंद कर दिया।

दूसरी तरफ शहजादा मुराद और अब्‍दुर्रहीम खान खाना ने और तेजी से हमले शुरू कर दिये। इसी बीच खबर आई पड़ोसी मुल्‍कों से 70 हजार का लश्‍कर बड़ी तेजी से अहमद नगर का रूख कर रहा है। शहजादा मुराद और अब्‍दुर्रहीम खान खाना के लश्‍कर के पास गल्‍ले की कमी थी जिसकी वजह से परेशानियां पैदा हो गईं थीं।

दूसरी तरफ चांद बीबी भी मुहासरे की तकलीफ से परेशान थी। इसलिए उसने खान खाना अब्‍दुर्रहीम से सुलह कर ली ।ये तय हुआ कि बरार का इलाका शहजादा मुराद के हवाले कर दिया जायगा और अहमद नगर और उसके आसपास का इलाके बहादुर निजाम शाह की हुकूमत में रहेंगे इस सुलह के बाद खान खाना अब्‍दुर्रहीम  और शहजादा मुराद बरार के इलाकों की तरफ रवाना हो गये इस तरह इस सुलह के नतीजे में चांद बीबी की ख्‍वाहिश के मुताबिक बहादुर शाह निजाम को अहमद नगर का बादशाह बना लिया था।

लेकिन इसी बीच कुछ अमीर चांद बीबी के खिलाफ साजिशें करने लगे थे। उनमें  एक शख्‍स अभंग खान जिसे हब्शी भी कहा जाता है उसने बड़ी तकत इकट्ठी कर ली ।उसने आदिल शाहियों और कुतुब शाहियों की मदद से 50 हजार का एक लश्‍कर तैयार कर लिया और मुगलों पर हमला करने का इरादा कर लिया । हालांकि चांद बीबी ने मुगलों से समझौता कर रखा था। इस अभंग खान ने समझौता तोड़ दिया था।

अब्‍दुर्रहीम खान खाना उस वक्‍त उन्‍हीं इलाकों में ठहरा हुआ था इसलिए वो अभंग खान हब्‍शी के उस लश्‍कर का मुकाबला करने के लिए निकला। सोनीपत में होलनाक जंग हुई । इस जंग में अब्‍दुर्रहीम खान खाना ने अपने दुश्‍मनों को शिकस्‍त दी और बड़े बड़े बागी कुछ मारे गये और कुछ अपनी जानें बचाकर भाग गये।

उन्‍हीं दिनों अकबर को एक सदमा बर्दाश्‍त करना पड़ा उसका बेटा मुराद जो गुजरात का हाकिम था  उसे एक ला इलाज बीमारी ने जकड़ लिया उसकी वजह से उसकी मौत हो गई । मुराद की लाश को देहली ले जाया गया और उसे अपने दादा हुमायुं के पहलू में दफन कर दिया गया।

दक्षिण के खराब हालात देखते हुए अकबर चाहता था कि दक्षिण को पूरे तरीके से कब्‍जा कर लिया जाय इस मकसद के लिए उसने अपने बेटे दानियाल की निगरानी में एक लश्‍कर रवाना किया। अब हालात कुछ तरह थे कि चांद बीबी चाहती थी कि दानियाल से समझौता हो जाय जबकि उसके मुखालिफ अमीर मुगलों से मुकाबला करना चाहते थे इसलिए अमीरों ने मौका मिलते ही एक दिन चांद बीबी को मौत के घाट उतार दिया।

उन हालात के बाद अकबर भी एक लश्‍कर लेकर दक्षिण की तरफ रवाना हुआ। अब दक्षिण में अकबर के काफी लश्‍कर जमा हो गये थे । दक्षिण पहुंचकर उसने बागियों को समझाया कि वो मुगलों की इताअत कुबूल कर लें जब वो न समझे तो आगे बढ़कर अहमद नगर का मुहासरा कर लिया गया और उसे फतह कर लिया गया । अहमद नगर के मुहासरे में खान खाना और शहजादे दानियाल ने अपनी हिम्‍मत व बहादुरी के जौहर दिखाए अहमद नगर से जो माल व दौलत मिला उसे अकबर के सामने पेश कर दिया।

इस तरह अकबर अहमद नगर पर कब्‍जा करने में काम्‍याब हो गया था। इस तरह अकबर की हुकूमत अब हिमालय से लेकर उत्‍तर में अहमद नगर तक चली गई थी।

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