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                         जहांगीर और नूरजहां भाग-4 लेकिन तख्‍त पर बैठने के बाद जहांगीर ने उसकी ये गल्‍ती माफ कर दी और उसे बंगाल की जागीर पर बहाल रखा । शेर अफगन के कत्‍ल के बाद उसकी बीवी मेहरून्निसा (नूरजहां) को उसकी बेटी लाडली बेगम के साथ जहांगीर के दरबार में भेज दिया गया। मेहरून्निसा को अकबर की बीवी सलीमा बेगम की खिदमत पर लगा दिया गया । सन् 1611 ई. में जश्‍ने बहार के मौके पर पहली बार इत्तिफाक से नूर जहां को देखा तो उसका दीवाना हो गया और दो माह बाद ही उससे शादी कर ली । जहांगीर ने उसे नूर महल का नाम दिया । अपनी काबिलियत के दम पर नूरजहां बहुत जल्‍द जहांगीर के करीब होती चली गई । उसके बाप को इतिमातुद्दौला का खिताब दिया गया और उसके भाई को तरक्‍की दी गई। शेर अफगन नूरजहां और जहांगीर के बारे में अनगिनत कहानियों ने जन्‍म लिया । कुछ लोगों ने लिखा कि जहांगीर अकबर के जमाने में ही नूरजहां की मोहब्‍बत में गिरफ्तार हो गया था लेकिन उसकी मंगनी शेर अफगन के साथ हो गई थी इसलिये जहांगीर के रास्‍ते में बहुत ज्‍यादा मुस्किलें पैदा हो ...

Mughal Badshah Jalal ud-din Akbar [part-18]

मुगल बादशाह जलालुद्दीन अकबर (भाग-18)




बावजूद सलीम ने उस ओहदे को कुबूल करने से इंकार कर दिया। साथ ही उसने इलाहाबाद में अपने नाम के सिक्‍के जारी कर अकबर को रवाना करके  एक तरह से अकबर की तोहीन कर दी थी ।

जिस वजह से शहजादा सलीम ने अकबर के खिलाफ बगावत की थी वो शिकायत बहुत हद तक ठीक भी थीं शहजादे सलीम को सबसे बड़ी शिकायत ये थी कि उसे कुछ दरबारियों के कहने पर नाकारा और हुकूमत संभालने  के लिए नाकाबिल समझ लिया था उन दिनों अकबर के सलाहकार उसे सलाह दे रहे थे कि सलीम की जगह किसी और को हुकूमत की जिम्‍मेदारी दी जानी चाहिये।

उसके अलावा शहजादे सलीम को ये भी शिकयत थी कि उसे उसके शान के मुताबिक ओहदा नहीं दिया गया हालांकि वो सिर्फ शाही खानदान का सदस्‍य था बल्कि अकबर के बाद हुकूमत की जिम्‍मेदारियां भी उसी को संभालना थीं।

सलीम को अपने खिलाफ होने वाली महलों की साजिशों का भी पता था । बहुत से उमराअ चाहते थे कि अकबर के बाद सलीम की जगह ऐसा शख्‍स तख्‍त पर बैठे जो उनके हाथों की कठपुतली हो और पूरी ताकत उनके हाथ में रहे उन तमाम साजिशों में राजा मानसिंह सबसे आगे था ।

दूसरी तरफ शहजादा सलीम को भी इन साजिशों का पता था । इसलिए वो अपना भविष्‍य संवारने की फिक्र में रहने लगा। उसे अकबर से ये भी शिकायत थी कि उसने किसी भी वक्‍त उसके भविष्‍य के बारे में नहीं सोचा बल्कि उसके खास उमराअ ने उसे जो मश्‍वरा दिया उस पर काम करता रहा उन तमाम हालात से मजबूर होकर शहजादा सलीम ने बाप के खिलाफ बगावत करने की ठान ली थी।

जब सलीम ने अकबर को अपने नाम के सिक्‍के भेजे तो उसका साफ मतलब था कि वो बाप के खिलाफ बागवत करने के बाद एक हुकूमत कायम करने का इरादा कर चुका है। बहरहाल अकबर ने समझदारी से काम लिया उसने अपने मुशीर अबुलफजल को बुलाया जो दक्षिण में था और उसे सलीम के पास भेजने का इंतिजाम किया । अबुलफजल ने अकबर को भरोसा दिलाया कि वो शहजादे सलीम को हर हाल में सीधे रास्‍ते पर लाकर उसके सामने पेश कर देगा।

दूसरी तरफ शहजादा सलीम राजा मानसिंह और अबुलफजल को अपना सबसे बड़ा दुश्‍मन मानता था कहने को राजा मानसिंह की बहन शहजादे सलीम की बीवी थी लेकिन राजा मानसिंह अकबर के बाद शहजादे सलीम की बजाय सलीम के बेटे और अपने भांजे  खुसरू को हिंदुस्‍तान का बादशाह देखना चाहता था। इसी वजह से शहजादा सलीम राजा मानसिंह के खिलाफ हो गया था।

सलीम को जब पता चला कि अकबर ने अबुलफजल को उसकी तरफ भेजा है तो उसने हर हाल में अबुलफजल से टक्‍कर लेने की ठान ली। इसके लिए शहजादा सलीम ने अपने एक साथी राजा भेरी सिंह को अपनी मदद के लिए तैयार कर लिया और उसे हुक्‍म दिया कि वो अबुलफजल की तरफ जाए और उसका खात्‍मा कर दे।

19 अगस्‍त 1602 ई. को राजा भेर सिंह और अबुल फजल के बीच मुकाबला हुआ बर्की सराय के पास दोनों आपस में टकरा गये और एक दूसरे पर टूट पड़े जिसके नतीजे में भेरी सिंह ने अबुलफजल का सर कलम करके रख दिया और उसका कटा हुआ सर शहजादा सलीम के सामने पेश कर दिया।

अबुलफजल के कत्‍ल के बाद सलीम ने उसके बारे में कहा था । कहने को तो बादशाह का वफादार था लेकिन उसने बादशाह के हाथों अपना जमीर भारी कीमत में बेंच दिया था। अबुलफजल ने मेरे लिए रूस्‍वाई का सामान पहुंचाया और मेरे बाप को भी मेरा दुश्‍मन बना दिया । मैंने मजबूर होकर उसे भेर सिंह से कत्‍ल करवा दिया। उसकी मौत के बाद मेरे और मेरे बाप के रिश्‍ते खुश्‍गवार हो गये। इसके अलावा अबुलफजल हुजूर सलल्‍लाहु अलैहि वसल्‍लम का भी मुखालिफ था मुझ पर एक मुसलमान की हैसियत से उसका कत्‍ल जरूरी था।

दूसरी तरफ अकबर को जब अबुल फजल के मरने की खबर मिली तो उसने एक आह ... भरते हुए कहा। ‘’ अगर सलीम को तख्‍त ताज ही चाहिये था तो अबुल फजल को कत्‍ल करने से क्‍या फायदा? उसे चाहिये था कि उसकी जगह मुझे कत्‍ल कर देता। अकबर को जिस वक्‍त अबुलफजल के कत्‍ल की खबर मिली तो उस वक्‍त वो कबूतर बाजी में लगा हुआ था।

आखिर शहजादा सलीम को उसके फर्ज का एहसास दिलाने की खातिर उसकी सौतेली मां सलीमा सुल्‍ताना बेगम को इलाहाबाद जाकर बेटे से मिलने की इजाजत दे दी । फरवरी 1603ई. में सलीमा बेगम शहजादा से मिलकर लौटी तो उसने अकबर को बताया कि सलीम के रवैये में बहुत फर्क आ चुका है इसके अलावा अकबर से मिलने के लिए भी तैयार है इस तरह अपनी मां सलीमा सुल्‍ताना के समझाने पर शहजादा सलीम इलाहाबाद से निकलकर अपने बाप से मिलने आगरा की तरफ रवाना हुआ।

लेकिन वो आगरा से कुछ दूरी पर रूक गया और ये दरख्‍वास्‍त की कि वो आगरा में आने से पहले अपनी दादी से मिलना चाहता है इसलिए उसकी दादी उससे मिली उसका हाथ पकड़कर उसे अकबर के पास ले गई सलीम ने अकबर के पैरों पर माथा रखकर अपना जुर्म कुबूल कर लिया अबुलफजल का कत्‍ल एक बड़ा जुर्म था इसलिए अकबर सलीम को दिल से माफ नहीं कर पाया फिर भी उसने शहजादे सलीम को गले से लगाया।

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