शिवाजी की मौत के
बाद मराठे दो हिस्सों में बंट गये मराठों का एक गिरोह शिवाजी की मौत के बाद उसके
बेटे सम्भू जी को अपना हाकिम बनाना चाहता था। जबकि दूसरा गिरोह सम्भू जी के दस
साल के सौतेले भाई राजाराम को मराठों के ताज व तख्त का मालिक बनाना चाहता था।
लेकिन सम्भू जी
ने जबरन ताज व तख्त पर कब्जा कर लिया और साथ ही अपनी ताकत बढ़ाने के लिये उसने
एक और काम किया उन्हीं दिनों औरंगजेब के बागी बेटे शहजादा अकबर ने भी उन्हीं
इलाकों में पनाह ली हुई थी इसलिए सम्भू
जी ने उसके साथ राब्ता करके उसे अपने साथ मिला लिया और उसे एक तरह से अपनी
निगरानी में ले लिया था।
शहजादा अकबर के
साथ सम्भू जी ने वादा किया वो न सिर्फ अपने बाप की मौत का बदला लेगा बल्कि वो
अकबर को हिंदुस्तान का शहंशाह बनने में मदद करेगा। शिवाजी की मौत के बाद मुगल
सिपाहियों ने सुकून का सांस लिया कि अब कोई बगावत नही उठेगी लेकिन सम्भू जी ने
अपने बाप के रास्त पर चलते हुए लूट मार करना शुरू कर दिया । कहते हैं कि वो दशहरा
के हर त्योहार के बाद लश्कर लेकर निकलता और लूट मार करके अपने लिये दौलत इकटठी
करता । सबसे ज्यादा उसने खांनदेश और बुरहानपुर के इलाकों में लूट मार खड़ी की थी।
ये भी कहा जाता है कि सम्भू जी की इस लूट मार के नतीजे में बहुत से इज्जतदार
लोगों ने अपनी बीवीयों और बच्चों को अपने हाथों से कत्ल कर दिया कि मराठों के
हाथों उनकी इज्जत महफूज रहे । जगह जगह हमले करके सम्भू जी ने बस्तियों में आग
लगाना शुरू कर दिया आखिर उसने अहमद नगर पर हमला करने की कोशिश की लेकिन हार का
मुंह देखना पड़ा ।
दूसरी तरफ
औरंगजेब भी बे परवाह नही था उसने मराठों के खिलाफ कार्यवाही करने के लिए अपने काम
की शुरूआत की सबसे पहले उसने एक लश्कर अपने सालार हसन की निगरानी में रवाना किया जिसने
आगे बढ़कर कल्याण के किले पर कब्जा कर लिया ।
दूसरा लश्कर एक
और सालार शहाबुद्दीन की निगरानी में रवाना किया जिसने नासिक पर हमला करके उसको घेर
लिया। उसके अलावा अपने एक सालारा गफूरूल्लाह और अपने बेटे शाह आलम को अहमद नगर की
हिफाजत के लिए भेजा अपने दूसरे बेटे शाहजादा आलम को एक लश्कर देकर बीजापुर की तरफ
से मराठों को मिलने वाली मदद को रोकने के लिए रवाना किया जबकि अपने सालार खान
बहादुर को मराठों पर हमला करने के लिए रवाना किया। इस तरह औरंगजेब ने अपने कई लश्कर
दक्षिणी इलाकों में फैलाकर न सिर्फ बीजापुर के हाकिम बल्कि मराठों की फौजी ताकत का
भी नाक में दम करके रख दिया था।
इन लड़ाईयों के
दौरान सम्भू जी को ज्यादातर हार का सामना करना पड़ा और हालात से मायूस होकर सम्भू
ने दक्षिण में गोवा में पुर्तगालियों के यहां पनाह ली। उन हालात ने शहजादा अकबर को
बड़ा मयूस कर दिया उसने तो बगावत इसलिए खड़ी की थी कि वो हिंदुस्तान का शहंशाह बन
जाएगा लेकिन जब सम्भू जी पुर्तगालियों की
तरफ चला गया तब अकबर मयूस हो गया कि सम्भू उसके लिए कुछ नहीं करेगा इसलिए उसने
इरादा किया कि वो एक कश्ती पुर्तगालियों से लेगा और उसमें सवार होकर ईरान चला
जएगा। इसके लिए वो गोवा पहुंचा और नंवम्बर
में उसने एक जहाज खरीद लिया और उस जहाज से वो ईरान की तरफ रवाना होने वाला था कि
सम्भू ने दो आदमी दुर्गादास और कैलाश को उसके पास भेजा और उसे ईरान जाने से रोका
और उसे ये भरोसा दिलाया कि बहुत जल्द ही उसकी मदद करेगा ताज व तख्त को हासिल
करने में अब किसी किस्म की लापरवाही नहीं बरती जाएगी शहजादा अकबर मान गया और ईरान
जाने की बजाय वो फिर सम्भू जी के पास आ गया।
अब औरंगजेब पूरी
ताकत से मराठों के खिलाफ हरकत में आ गया था हालत ये हो गई थी कि मराठे आगे आगे और
औरंगजेब के सिपाही उनके पीछे पीछे थे और अब बड़ी तेजी से मुगल लश्कर ने मराठों के
इलाकों पर कब्जा करना शुरू कर दिया था। बागी शहजादा अकबर ने जब देखा कि उसके बाप
ने बड़ी तेजी से बागियों को कुचलना शुरू कर दिया और मराठाओं के इलाकों पर बड़ी
तेजी से कब्जा करना शुरू कर दिया है तब वो बुरी तरह मायूस हो गया हिंदुस्तान से
निकलकर मस्कत के रास्ते वो ईरान चला गया और वहां उसने पनाह ली।
दूसरी तरफ शिवाजी
के बेटे सम्भू जी ने कुछ इलाकों में लूट मार करने के बाद एक जगह ठहरा और वहां
उसने शराब पी। उस वक्त औरंगजेब के लश्कर का कमांडर मुकर्रब खान था जो एक अच्छा
जंगजू था। उस वक्त जितना लश्कर मुकर्रब
खान के पास था उसके साथ ही उसने सम्भू जी पर हमला कर दिया सम्भू जी के लश्कर को
मुकर्रब खान ने उधेड़कर रख दिया । सम्भू और उसके साथी कैलाश को गिरफ्तार कर लिया
गया । मुकर्रब खान ने दोनों को मस्खरों
के कपड़े पहनाए और उनके गले में ढोल डालकर सड़कों पर घुमाया उन दोनों के साथ उनके
पच्चीस सरदार भी गिरफ्तार हुए थे आखिर सम्भू और कैलाश के साथ साथ दूसरे साथियों
को भी औरंगजेब के सामने पेश किया गया।
इस मौके पर
औरंगजेब को ये भी बताया गया कि कई मौकों पर सम्भू जी न सिर्फ औरंगजेब को गालियां
दीं बल्कि रसूल अकरम सल लल्लाहु अलैहिस वसल्लम की शान में भी गुस्ताखियां की थी
सम्भू और कैलाश जब औरंगजेब के सामने पेश किया तो औरंगजेब अपनी गालियों को बर्दाश्त
करते हुए शायद माफ कर देता लेकिन चूंकि उन्होंने रसूल सल लल्लाहु अलैहि वसल्लम
की शान में गुस्ताखियां की थी और इस गुस्ताखी को औरंगजेब माफ करने वाला नहीं थी
। इसलिए उन दोनों को मौत के घाट उतार दिया गया सम्भू जी के मरने के बाद उसके
सौतेल भाई राजाराम को मराठों ने रायपुर में अपना राजा मान लिया लेकिन राजाराम को
हुकूमत करने का मौका नहीं मिला इसलिए कि औरंगजेब इसी इंतिजार में था एक मौके पर
औरंगजेब के लश्कर ने मराठों की राजधानी को घेर लिया राजाराम अपने घर वालों के साथ
किले से निकलने में काम्याब हो गया और दर दर की ठोकरें खाने लगा।

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