मुगल बादशाह औरंगजेब आलमगीर (भाग-19)
औरंगजेब बीमार था । उसकी तबियत बिगड़ी हुई थी। इसलिए अपने
बेटे आजम खान की बातों में आते हुए अजीमुस्शान को पटना से वापस बुला लिया । इस
बीच शहजादा आजम ने अपने भाई कामबख्श को किसी न किसी तरह मौत के घाट उतारना चाहा।
आजम खान की हरकतों की औरंगजेब को भी खबर हो गई इसलिए बीमारी की हालत में भी
औरंगजेब ने अपने एक सालार सुल्तान हसन को कामबख्श की हिफाजत में लगा दिया था।
कहते हैं फरवरी 1707 ई. में औरंगजेब की हालत बहुत ज्यादा खराब हो गई लेकिन कुछ
वक्त के लिए उसकी हालत में सुधार आ गया । औरंगजेब को एहसास था कि उसका आखिरी वक्त
नजदीक आ गया है उसने अपनी मौत के बाद अपने बेटों को आपसी झगड़ों से बचाने के लिये
हर मुमकिन कोशिश शुरू कर दी। उसने अपने बेटे कामबख्श को बीजापुर का गवर्नर बना
दिया उसको एक लश्कर भी दिया।
उसके सिर्फ चार दिन के बाद शहजादा आजम को मालवा का गवर्नर
बनाया गया । आजम बड़ा शातिर आदमी था वो जानता था उसका बाप जिस बीमारी से जूझ रहा
है उससे जिंदा नहीं बचेगा इसलिए वो कहीं न कहीं रूकता हुआ सफर कर रहा था ऐसा करने
का उसका मकसद ये था कि अगर इसी बीच उसके बाप की मौत हो जाती है तो वापस जाकर ताज व
तख्त पर कब्जा कर लेगा ।
28 फरवरी को औरंगजेब
सख्त बीमार हो गया उसके बावजूद 90 साल का शहंशाह लगातार तीन दिन तक अपना
दरबार लगाता रहा । पांच वक्त की नमाज पाबंदी से अदा करता रहा इसी बीच उसने अपने
दोनों बेटों आजम और कामबख्श को खत लिखे
जिनमें उन्हें नसीहत की कि वो अवाम के साथ अच्छा सुलूक करे और आपसी झगड़ों की
जगह भाईयों की तरह अमन सुकून और मोहब्बत से रहें।
औरंगजेब ने इस खत में अपने दोनों बेटों को फानी दुनिया की
हर चीज फानी के बारे में भी बहुत कुछ लिखा । बहरहाल 3 मार्च 1701 ई. को औरंगजेब
आलमगीर सुबह अपने कमरे से निकला उसने सबसे पहले नमाज पढ़ी उसके बाद कुरआन मुकद्दस
की तिलावत की । कहते हैं कि उसके बाद अचानक कल्मा पढ़ते हुए आखिरी सांसे लेने लगा
उसकी रूह इस दुनिया से कूच कर गई।
जब औरंगजेब के मरने की खबर उसके बेटे आजम को हुई तो वो अपने
लश्कर के साथ पलट आया। उस वक्त उसने सिर्फ चालीस मील का सफर तय किया था । उसने
औरंगजेब की तजहीज व तकफीन में हिस्सा लिया। जनाजा शेख जेनुल हक के मजार के पास
दफनाने के लिए रवाना कर दिया गया इस जगह का नाम खुल्द आबाद रखा गया उसके बाद
औरंगजेब के नाम के साथ ही खुल्द मकान के अल्फाज सरकारी तौर पर इस्तेमाल किये
जाते रहे।
औरंगजेब की यही कोशिश रही कि मध्य एशिया में एक ऐसी मजबूत
हुकूमत कायम हो जहां इंसाफ का बोलबाला हो लेकिन उसका ये ख्वाब पूरा न हो सका। उसकी
हुकूमत को आखिरी दौर अफरातफरी में गुजरा बुढ़ापे की उम्र में वो बिल्कुल अकेला रह
गया था उसके वफादार और काबिल दोस्त रिश्तेदार दुनिया से कूच कर गये थे। सिर्फ
असद खान जिंदा था जो न सिर्फ वजीर बल्कि उसका एक काबिल दोस्त भी था। अब उसे दरबार
में जवान खून नजर आता था लेकिन ये लोग जिम्मेदारियां संभालने से बचते और एक दूसरे
के खिलाफ साजिशों के जाल बुनने में एक दूसरे से आगे बढ़ने की कोशिश करते रहते थे।
उसके अलावा भी औरंगजेब को बहुत दुख: पहुंचे ।
1702 ई. में उसकी चहेती और लाडली बेटी जेबुन्निशा मर गई और
उसके मरने का औरंगजेब आलमगीर को बहुत दुख: था। उसके लिए दूसरा सदमा उसका बागी बेटा
अकबर था जो दर दर की ठोकरें खा रहा था उसके लिए तीसरा सबसे बड़ा सदमा ये था कि
उसकी दूसरी बेटी गोहर आरा भी उसके सामने वफात पा गई आखिर उम्र में औरंगजेब के पास
उसकी बहन जेबुन्निशा रह गई।
इसमे कोई शक नहीं कि औरंगजेब आलमगीर को मध्य एशिया का सबसे
ताकतवर हुक्मरां शुमार किया जाता है लेकिन कुछ मजहबी नफरत की वजह से उसपर बहुत बे
वजह के इल्जाम लगाते हैं जिनका हकीकत से कोई लेना देना नहीं है न ही उसने किसी
मजहब और फिरके के लोगों से भेदभाव का सुलूक किया ।
वो अपनी जिंदगी इस्लामी शरीअत के मुताबिक गुजारता था वो
हमेशा हलाल खाने पर भरोसा रखता था यही वजह है उसकी जिंदगी एक शहंशाह होने के
बावजूद सादगी से गुजरी और वो आखिरी दम तक मेहतन करके अपनी जिंदगी गुजारता रहा उसे
बेकार के खेलकूद में कोई दिलचस्पी न थी उसकी सारी जिंदगी हुकूमत को मजबूत करने
में गुजर गई।
औरंगजेब आलमगीर को झूठ से नफरत और इंसाफ से मोहब्ब थी क्योंकि
इस तरह के लोगों को किसी का डर नहीं होता इसीलिए औरंगजेब एक हिम्मत व जुराअत जैसी
दौलत से मालामाल थे।
औरंगजेब ने अपनी जिंदगी के शुरू से ही अपने आपको हुकूमत
संभालने के लायक बना लिया था ।
जहां तक औरंगजेब आलमगीर के सरकारी कामकाज की बात है तो वो
हर दिन दरबार लगाता आगर जरूरत होती तो दिन में दो बार दरबार लगाता और अपने हाथ से
फैसले लिखता उसके अलावा वो सरकारी खतों को जवाब और सूबों के गर्वनरों को हिदायात
भी लिखवाता उसकी सेहत का ये आलम था कि 90 साल की उम्र में भी चाकचौबंद था सिर्फ
उम्र की वजह उसे कम सुनाई देता था उसकी याददाश्त का ये आलम था कि अगर वो किसी शख्स
को एक बार देख लेता या किसी बात को एक बार सुन लेता कभी न भूलता ।

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