हजरत निजामुद्दन औलिया(रह.)भाग-11
फिर इसी दौरान हजरत निजामुद्दन औलिया के साथ जांगुदाज वाक्या
पेश आया जिसने आप की जिंदगी का रूख यक्सर बदल दिया।
हजरत निजामुद्दीन का मामूल था कि नया चांद देखकर खास तौर पर
वालिदा मोहर्तमा की कदम बोसी के लिये हाजिर हुआ करते थे उन दिनों हजरत बीबी जुलेखा
बीमार थीं मगर जाहिरी हालत ऐसी नहीं थी कि देखने वाला के सफर आखिर के बारे में सोच
भी सके आखिर नजर आया और हजरत निजामुद्दीन
औलिया अपनी वालिदा माजिदा के दीदार ब सआदत के लिये हाजिर हुये मादर गिरामी ने
दुआएं दीं फिर कुछ देर खामोश रहकर फरमाने लगीं सैयद मोहम्मद आइंदा माह रिवायत
हिलाल के मौके पर किस की कदम बोसी करोगे?
बड़ा अजीब सवाल था हजरत निजामुद्दीन औलिया समझ गये कि वक्त
रूख्सत करीब आ पहुंचा है आप मादर गिरामी की जुदाई के तसव्वुर से लरज उठे और जारो
कतार रोते हुये बोले ।
मख्दूमा आप मुझ गरीब को किस के सुपुर्द कर रहीं हैं?
हजरत बीबी जुलेखा ने फरमाया – कल तुम्हें इसका जवाब दूंगी
।
हजरत निजामुद्दीन औलिया ने दिल में कहा मख्दूमा आज और इसी
वक्त क्यों नहीं? मुझ पर ये रात
भारी गुजरेगी आप बराहे रास्त वालिदा मोहर्तमा से सवाल कर सकते थे मगर ये बात
खिलाफ अदब थी, इसलिये आप खामोश रहे।
कुछ देर बाद बीबी जुलेखा ने फरमाया सैयद मोहम्मद आज रात तुम
शेख नजीबुद्दीन के यहां रहो।
हजरत निजामुद्दीन औलिया बादिल नख्वास्ता उठ कर चले गये
मगर जहन पर एक अजिय्यतनाक ख्याल मुसल्ल्त था कि आज रात कुछ होने वाला है।
हजरत नजीबुद्दीन मुतवक्किल के यहां पहुंचे तो शेख ने हस्बे
रिवायत वाल्हाना इस्तकबाल किया रोजाना ही रात गये तक कोई न कोई बहस इल्मी होती
थी मगर आज खिलाफ तवक्को हजरत निजामुद्दीन औलिया खामोश थे।
हजरत शेख नजीबुद्दीन मुतवक्किल ने बहुत गौर से आपके चेहरे
मुबारक की तरफ देखा और फरमाया मौलाना निजामुद्दीन आज तुम खामोश भी हो और उदास भी, खैरियत तो है?
शेख आज किसी काम में दिल नहीं लग रहा हजरत निजामुद्दीन
औलिया ने शिकस्ता लहजे में जवाब दिया आप इस अजीय्यतनाक ख्याल से पीछा छुड़ाने
में नाकाम रहे थे फिर इशा की नमाज का वक्त आया दोनो ने नमाज अदा की आम तौर पर
हजरत निजामुद्दीन औलिया नमाज के बाद अपने घर तश्रीफ ले जाते थे आज खिलाफ मामूल
बैठे रहे।
कुछ देर बाद हजरत नजीबुद्दीन मुतवक्किल ने पूछा आज तुम् घर
नहीं जाओगे?
हजरत निजामुद्दीन औलियाने शेख नजीबुद्दीन मुतवक्किल की तरफ
देखा।
खुदानाख्वास्ता तुम मुझ पर बार नहीं हो हजरत शेख
नजीबुद्दीन मुतवक्किल ने फरमाया आज कई बातें खिलाफ मामूल नजर आईं हैं, इसलिये पूछ रहा हूं।
वालिदा मोहर्तमा का हुक्म है मैं आज की रात आपके मकान पर
बसर करूं।
बसर व चश्म हजरत शेख नजीबुद्दीन मुतवक्किल ने निहायत मुहब्बत
आमेज लहजे में फरमाया मेरा घर तुम्हारा घर है।
कुछ देर तक दोनों के बीच गुफ्तगू होती रही हजरत निजामुद्दीन
औलिया आज किसी बात में दिलचस्पी नहीं ले रहे थे। इस लिये हजरत शेख नजीबुद्दीन
मुतवक्किल ने आपके बिस्तर का इंतेजाम किया और आप सोने चले गये।
हजरत निजामुद्दीन औलिया किस तरह महू ख्वाब होते, मुस्तकिल एक कांटा सा खटक रहा था। उसकी खलश
आपको कैसे सोने देती? नतीजनत रात भर
जाग कर दुआएं करते रहे।
ए अल्लह मेरी मां के सरमाये को बचाले अगर ये लुट गया तो
तेरा बन्दा निजामुद्दीन बहुत गरीब हो जायेगा।
अभी सुबह सादिक के आसार नुमाया नहीं हुये थे किसी ने दरबाजे
पर दस्तक दी हजरत निजमुद्दीन औलिया शदीद बे करारी के आलम में उठे दरवाजा खोला तो
खादिमा सामने खड़ी थी। आपने मुजतरिब होकर पूछा सब खैरियत तो है?
बीबी आपको याद फरमा रहीं हैं खादिमा ने अर्ज किया।
हजरत निजामुद्दीन औलिया के इज्तिराब का ये आलम था कि भागते
हुये घर पहुंचे वालिदा मोहर्तमा को व खैरियत आफियत पाकर सुकून का सांस लिया फिर
सालाम अर्ज करके बिस्तर के करीब ही खड़े हो गये।
मेरे पास बैठों सैयद मोहम्मद – बीबी जुलेखा ने फरजन्द को हुक्म दिया आपकी आवाज से नकाहत झलक रही थी मगर ऐसी नकाहत नहीं थी कि जिसे देखकर मरीज की मौत का गुमान हो सके।
हजरत निजामुद्दीन औलिया बीबी जुलेखा के पायंती बैठे और दोनों हाथ वालिदा माजिदा के कदमों पर रख दिये।

Comments
Post a Comment