हजरत निजामुद्दीन औलिया(रह.) भाग-59
अलाउलमलिक हजरत निजामुद्दीन का
मुरीद था
अलाउलमलिक के आदमी को मुझसे क्या
काम हो सकता है ? मैंने सैयद मोहम्मद के खादिम से पूछा।
मैं क्या बता सकता हूं ? मलीह ने ला इल्मी का इजहार करते
हुए कहा।
मैं कुछ देर तक सोचता रहा फिर मलीह
से कहा कि कोतवाल साहब के आदमी को अंदर बुला लो जब वो शख्स अंदर आया तो मुझे यूं
महसूस हुआ कि जैसे कोई ना मालूम खतरा बहुत तेजी से मेरी तरफ बढ़ रहा है ।
मैं कोतवाल अलाउलमिलक साहिब का
नाइब हूं उस शख्स की आवाज में गरज थी और
लहजा तेज था जैसे वो अपने किसी दुश्मन से
बात कर रहा हो।
मैंने अलउलमलिक के नाइब की तरफ गौर
से देखा वो हथियार बांधे हुए था उसकी लम्बी दाढ़ी थी और चेहरे से खूंख्वारी
बरस रही थी ।
आपको मुझसे क्या काम है ? मैंने नर्म लहजे में पूछा और मैं
एसा करने के मजबूर था ।
उसने मुझे गहरी नजरों से देखा जैसे
वो किसी मुज्रिम को तलाशी ले रहा हो तुम से जो सवाल किया जाए उसका सहीह जबाब देना
वो गर्जा।
मुझे झूठ बोलने की आदत नहीं है
मैंने भी हिम्मत से काम लिया।
क्या तुम्हारा नाम ही महेन्द्र
देव है ? वो
किसी दरिंदे की तरह से गुर्राया ।
जब उसने मेरा नाम लिया तो मैं समझ
गया कि कोई नई मुसीबत आने वाली है लेकिन फिर
भी मैंने हिम्मत का मुजाहिरा करते हुए
कहा हां मेरा ही नाम महेन्द्र देव है।
तुम देवगढ़ के रहने वाले हो
अलाउलमलिक के नायब ने दूसरा सवाल किया।
वो मेरे बारे में पूरी मालूमात
रखता था,
इसलिये कुछ छुपाना बेकार था मैंने साफ साफ कहा हां मेरा वतन देवगढ़ है।
क्या तुम कुछ दिन पहले अजमेर, हांसी, और बदायूं,गये थे कोतवाल अलाउलमलिक के नायब
ने तीसरा सवाल किया।
मुझे ऐसा लगा कि जैसे वो कोई जासूस
है और मेरे एक एक लम्हें की निगरानी करता रहा है मैं हाल ही में उन एतिहासिक जगहों
को देखकर देहली वापस आया हूं मैंने उस बात को मान लिया कि उसके सिवा अब कोई चारा भी नहीं था ।
क्या तुमने इस सफर मैं सुल्तान
मुअज्जम के खिलाफ कोई बात की थी ? जैसे ही उसकी जबान से ये अल्फाज अदा हुए मुझपर खौफ
तारी हो गया।
मैं अपनी इस कमजोरी से पूरी तरह
वाकिफ हूं कि मेरे अंदर जज्बात पर काबू पाने की सलाहियत नहीं है जो कुछ दिल में
होता है उसे बे धड़क जबान पर ले आता हूं ।
एक बार मैंने हजरत अमीर खुसरू से
सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी की खिलाफ बातें की थीं अगरचे अमीर एक निहायत ही सालेह इंसान थे और उन्ही के
तुफैल मुझे हजरत निजामुद्दीन औलिया की गुलामी का शर्फ हासिल हुआ था लेकिन घबराहट
और परेशानी में ख्याल गुजरा कि अमीर ने अनजाने में सुल्तान के सामने मेरा जिक्र
न कर दिया हो।
क्या तुमसे हजरत अमीर खुसरू ने ये
बात कही थी ? तुम
सिर्फ इतना बताओ कि तुमने ऐसा किया है?
मैंने बड़ी मुश्किल से अपने आप पर
काबू पाया मुझे ठीक से याद नहीं, इंसान बातें करते वक्त कभी बे इख्तियार भी हो जाता
है मुमकिन है कि मेरी जबान से कभी एसी कोई बात निकल गई हो जिसमें सुल्तान मुअज्जम
का जिक्र मौजूद हो ।
अभी ये सवाल व जवाब जारी थे कि ख्वाजा
सैयद मोहम्मद ,ख्वाजा
सैयद मूसा और मौलाना अहमद नीशापुरी भी वहां तश्रीफ ले आये उन तमाम हजरात ने मेरी
परेशानी को पूरी शिद्दत से महसूस किया अलाउलमलिक का नायब मजीद कोई सवाल करना चाहता
था कि मौलाना अहमद नीशापुरी ने उससे तुर्क जबान में गुफ्तगू कर दी मैं भी थोड़ी
बहुत तुर्की समझता था मौलाना अहमद ने उससे कहा ये हमारा मेहमान है तुम्हें इस बात
का लिहाज रखना चाहिये।
बेशक ये तुम्हारा मेहमान है मगर
उससे क्या फर्क पड़ता है ? अलाउलमलिक के नायब ने उन बुजुर्गों की मौजूदगी को भी
नजर अंदाज कर दिया था जिन के एहतराम में देहली के लोगों की गर्दनें हमेशा झुकी
रहती थीं।
ये हुकूमत का जिम्मी है और देवगढ़
के शाही खानदान से तअल्लुक रखता है मौलाना अहमद नीशापुरी ने उसे समझाने की कोशिश
करते हुए कहा और सबसे बढ़कर ये ह कि हमारे शेख निजामुद्दीन औलिया का मुरीद है तुम्हें
तहकीकात के वक्त उन सब बातों का लिहाज रखना चाहिये था बल्कि मेरी राय ये है कि
तुम उसे कोतवाल के पास न ले जाओ और अलाउलमलिक से कहो कि वो खुद इसके बारे में हजरत
सुल्तानुल मशाइख से बात कर लें ।
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