हजरत निजामुद्दीन औलिया(रह.) भाग-67
मर्दे कामिल से अजीमतर मफादात हासिल करने के बजाए इंतिहाई खसारे का सौदा करने
लगा फिर इसी कजी ने उवेद के दामन को दोनों जहान की लअनतों से भर दिया
वाक्या यूं हुआ कि इसी दौरान एक हिंदू ने हजरत निजामुद्दीन औलिया की खिदमत
में हाजिर होकर इस्लाम कुबुल कर लिया हजरत महबूब इलाही बड़ी तवज्जो से उस नये
मुस्लिम की तरबीयत फरमा रहे थे।
एक दिन हजरत शेख ने अपने दस्ते मुबारक से दो मिस्बाकें अता कीं नये मुस्लिम
ने मिस्बाकें लेकर हजरत निजामुद्दीन औलिया का शुक्रिया अदा किया और खामोशी से
अपनी जगह पर आकर बैठ गया इत्तिफाक से उस नया मुस्लिम शा उवेद शायर के करीब ही बैठा
था फिर जब हजरत महबूब इलाही मज्लिस आम से उठकर अपने हुजरे खास में तश्रीफ ले गये
तो नये मुस्लिम ने उवेद से कहा मुझमें
इतनी जुर्रत नहीं थी कि मैं हजरत शेख से दो मिस्बाकें अता करने की वजह पूछता क्या एक मिस्बाक काफी नहीं थी ?
एहतराम व अदब के इस नाजुक तरीन मकाम पर भी उवेद अपनी शरारत से बाज न आया उसने
नये मुस्लिम को दो मिस्बाकों के इस्तेमाल का तरीका बताते हुए कहा एक मिस्बाक
दांतों की सफाई के लिये और दूसरी ना पाकी दूर करने के लिये।
वो सादा लोह शख्स उवेद का जवाब सुनकर मुतमइन हो गया और दोनों मिस्बाकों को
इस फितना अंगेज शायर के बताये हुए तरीके के मुताबि इस्तेमाल करने लगा। कुछ दिन
बाद इस नये मुस्लिम ने हजरत निजामुद्दीन औलिया की खिदमत में हाजिर होकर अर्ज किया
कि या शेख: एक मिस्बाक जिससे में दात साफ
करता हूं ,
उसकी जाहिरी हालत बहुत बेहतर मगर दूसरी जिससे ना पाकी दूर करता हूं उसकी हालत
निहायत ही बुरी है और मैं सख्त तकलीफ में मुब्तिला हूं फरमाइयें मेरे लिये क्या
हुक्म है?
इस कदर बेहूदा बात सुनकर हजरत निजामुद्दीन औलिया के चेहरे का रंग बदल गया आपने
खिलाफे आदत तल्ख लहजे में उस नये मुस्लिम से पूछा तुझसे ऐसा करने के लिए किसने
कहा है?
उवेद शायर ने ‘’ नये मुस्लिम ने किसी झिझक के बगैर जवाब दिया।
उस वक्त वो फितना परवर शायर भी मज्लिस में मौजूद था और अपनी इस शरारत से लुत्फ
अंदोज हो रहा था नये मुस्लिम का जवाब सुनकर हजरत निजामुद्दीन औलिया गुस्से में आ
गये और आपने उस मुफ्सिद शायर को मुखातिब करते हुए फरमाया ।‘’ उवेद तू लकड़ी से खेल रहा है।‘’
हजरत महबूब इलाही की जबाने मुबारक से ये सख्त अल्फाज सुनकर तमाम हाजिरीन लरज
गये और उन्हें अंदाजा हो गया कि अनकरीब उस गुस्ताख बे अदब शायर को तख्ता ए दार पर खींच दिया जाएगा
मगर खुद उवेद का ये हाल था उसने हजरत निजामुद्दीन औलिया की तंबीह का एहसास तक नहीं
किया उसे अपने उस शर्मनाक काम पर कोई नदामत महसूस हुई और न वो मखदूम की दिल दुखाने
पर माफी मांगी बस इंतेहाई बे हसी के साथ बैठा मुस्कुराता रहा और फिर अपने कामों मश्गूल
हो गया।
इस वाक्ये के कुछ दिन बाद सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक ने तेलंगाना की जंग के
लिए अपने बड़े बेटे शहजादा मोहम्मद को एक लश्करे जर्रार के साथ रवाना किया
शहजादा मोहम्मद तुगलक पूरे जाह जलाल के साथ आगे बढ़ा रास्ते में चंदेरी, अवध, और कढ़ा के लश्कर भी उसके साथ
मिल गये। फिर तमाम फौजों ने अरंगल का मुहासरा कर लिया जो सात सौ साल से राय करण
महादेव और उसके बाप दादा की राजधानी रहा था
मोहम्मद तुगलक के सिपाहियों का
हुजूम देखकर राय करन महादेव ने किले के दरवाजे बंद कर लिए और अपने लश्कर के साथ
महसूर हो गया। मोहम्मद तुगलक ने अपने जां
निसारों को हुक्म दिया कि वो किले की फसीलों को तोड़ दें और उस वक्त तक जंग जारी रखें जब तक उन्हें
मुकम्मल फतह हासिल न हो जाए नतीजतन
घमासान का रण पड़ा दोनों तरफ खून के दरिया बहने लगे । शहजादा मोहम्मद तुगलक के
सिपाही भी सर वक्फ होकर लड़ रहे थे और राय करण देव की फौजें भी अपनी आजादी बर
करार रखने के लिए जान की बाजी लगा रही थीं।
अभी इस जंग का कोई फैसला नहीं हुआ था कि इत्तिफाकन देहली और अरंगल का
दर्मियानी रास्ता कट गया शहजादा मोहम्मद
तुगलक बड़ी बैचेनी से अपने बाप के पैगाम का इंतेजार कर रहा था मगर रास्ते वीरान पड़े थे और किसी कासिद का दूर
दूर तक पता नहीं था ये एक फिक्र अंगेज सूरत हाल थी जिससे उवेद शायर ने सियासी मफाद
हासिल करने की कोशिश की और ये अफवाह उड़ा दी कि देहली में सुल्तान गयासुद्दीन
तुगलक का इंतेकाल हो गया मलिक तकीन और दूसरे सरदारों ने उस अफवाह को बड़ी हैरत से
सुना।
‘’
अगर वो जिंदा होते तो इस खौफनाक जंगी मुहिम के दौरान खामोश न रहते ‘’ उवेद अपनी फितरती जिहानत से काम
लेते हुए मन्तिकी दलील पेश की। देहली का
सुकूत जाहिर कर रहा है कि फरिश्ता ए अजल ने सुल्तान की सांसें गसब कर लीं हैं
वर्ना कोई न कोई शाही हुक्म जरूर आता मलिक ताकीन और दूसरे उमरा जो खुद भी साजिशी
जहन रखने थे उवेद की दलील से मुतमईन नजर आने लगे सुल्तान के वफादार उमरा के दिलों
में शुकूक व शुबहात पैदा करने के बाद उवेद ने अपनी खबासत-ए- नफ्सी का खुलकर
मुजाहिरा किया कुदरत ऐसे मौके बार बार फराहम नहीं करती किस्मत अजमाई के लिए इससे
बेहतर मौका फिर कभी नहीं आएगा सुल्तान अपने अंजाम को पहुंच चुका अब शहजादा मोहम्मद
तुगलक अकेला है उसे भी आसानी से कत्ल किया जा सकता है आम रियाया को गुमान भी न
होगा कि शहजादा मोहम्मद तुगलक गैर फितरी मौत का शिकार हुआ है अगर किसी किस्म की
शोरश पैदा हुई तो उसे ये कहकर दबाया जा सकता है कि शहजादा जंग पर मौजूद था किसी दुश्मन का तीर उसके हलक
में पेवस्त हो गया और वली अहद सल्तनत ने
अहले हुनूद से जंग करते हुए जाम-ए- शहादत नोश कर लिया।
शायर उवेद ने बड़ा फितना अंगेज मंसूबा पेश किया था हवस इक्तिदार ने मलिक तकीन
और दूसरे सरदारों को अंधा कर दिया फिर वो लोग अपने आका जादे को कत्ल करने पर दिल
से तैयार हो गये अब ये बागी गिरोह की बद नसीबी थी उन्ही के बीच खानदान तुगलक का
एक हकीकी नमक ख्वार भी मौजूद था उसने बड़ी एहतियात और राजदारी के साथ शहजादा मोहम्मद तुगलक के
सामने उस शाजिस को बे नकाब कर दिया शहजादा
एक लम्हा जाय किए बगैर अपने पचास जां निसारों के साथ उस इलाके से निकल गया और
बड़ी तेज रफ्तारी से अपनी मंजिल तय करता हुआ देहली पहुंच गया फिर जब उसने सुल्तान
गयासुद्दीन तुगलक के रूबरू सारा माजरा बयान किया तो वाली ए हिन्दुस्तान इस कदर
मुश्तइल हुआ कि उसने तमाम गद्दार उमरा के कत्ल का फरमान जारी कर दिया मलिक ताकीन
और दूसरे सरदारों को उस वक्त मौत के घाट
उतार दिया गया तब वो जंगलों में छिपने की कोशिश कर रहे थे।

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