हजरत निजामुद्दीन औलिया(रह.) भाग-69
निजामुद्दीन
औलिया के मुखालिफीन में सरे फेहरिस्त थे और अक्सर गुफ्तगू करते वक्त शाइश्तगी
की हद से गुजर जाते थे ।
सुल्तान
गयासुद्दीन तुगलक का इशारा पाते ही काजी साब ने हजरत महबूब इलाही से नसीहत आमेज
गुफ्तगू शुरू कर दी। ‘’ तुम खुद को मुसलमानों का पेशवा कहते हो मगर इसके साथ ऐसा काम भी करते हो
जिसका शरीअत से कोई तअल्लुक नहीं। दुनिया में रहने का तरीका ये है कि अगर इंसान
किसी चीज का इल्म न हो तो उन लोगों से मालूम
करे जो ज्यादा इल्म रखते हैं।
काजी
जलालुद्दीन दिलवाजी के एक एक लफज से हजरत निजामुद्दीन औलिया के इल्म की नफी हो
रही थी । मगर हजरत महबूब इलाही एक खुद परस्त काजी के तअन तशनाअ को बड़े हौसले से बर्दाश्त कर रहे थे। हाजिरीन
मज्लिस ने बड़ी हैरत से देखा कि इतनी बातें सुनने के बाद भी हजरत निजामुद्दीन औलिया
के बाद भी मुस्कुरा रहे थे।
काजी दिलवाजी
ने मुखतसर से सुकूत के बाद फिर कहा। ‘’ मुसलमानों की
रहनुमाई के लिए जरूरी है कि इंसान खुद भी ब शराअ हो और शरीअत का मुकम्मल इल्म भी
रखता हों’’ काजी
साहब की तहकीर आमेज गुफ्तगू सुनकर काजी मुहीउद्दीन काशानी और मौलाना फखरूद्दीन
जरादी को बहुत तकलीफ पहुंची। मौलाना जरादी ने सर गौशी में पीरो मुर्शिद से अर्ज
किया। ‘’ सैयदी – खादिम को इजाजत दीजिये आपका ये गुलाम काजी
दिलवाजी को अभी समझाये देता है कि शरीअत किसे कहते हैं और ब सराअ मुसलमान क्या
होता है?
मौलाना जरादी को इस कदर तकलीफ पहुंची थी कि उनके चेहरे का रंग बदल गया था।
मौलाना आप खामोश रहें और अपने जज्बात
पर काबू रखें ।‘’
हजरत निजामुद्दीन औलिया ने अपने खलीफा को सब्र जब्त की तलकीन की और फिर
जलालुद्दीन दिलवाजी को मुखातिब करते हुए फरमाया। काजी साहब आप ही मुझे शराअ के
इसरार रूमूज समझा दीजिये । मैं आपके मेयार
के मुताबिक मुसलमान बनने की कोशिश करूंगा।‘’
हजरत महबूब इलाही हुस्ने अमल और इनकिसारी का मुजाहिरा कर रहे
थे मगर काजी जलालुद्दीन को मन्सब कजा ने
इंतिहाई घमंडी बना दिया था नतीजतन उन्होंने भरे दरबारे में अपने इख्तियारात की नुमाइश करते हुए कहा । शेख
निजामुद्दीन मैं समझता हूं कि तुम्हारे लिये एक तंबीह काफी होनी चाहिये। अगर आज
के बाद तुम समा सुनोगे या दूसरों को समा
की दावत दोगे तो मैं हाकिम शराअ की हैसियत से तुम्हें सख्त सजा दूंगा।
हजरत महबूब इलाही बहुत देर तक उस तल्ख गुफ्तार काजी के तोहीन आमेज सुलूक को
बर्दाश्त कर रहे थे मगर जब सुल्तान के हाशिये बिरादत आलम ने अपने इक्तिदार का
मुजाहिरा किया तो हजरत निजामुद्दीन औलिया को जलाल आ गया। आपने बुलंद आवाज में
फरमाया। काजी साहब आप सजा तो उस वक्त
देंगे जब अपने ओहदे पर रहेंगे।‘’
हजरत महबूब इलाही के जलाल रूहानी का
ये असर था कि सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक और हाजिरीन मज्लिस को सक्ता हो गया । फिर उस सुकूत को खुद हजरत निजामुद्दीन
औलिया ने तोड़ा। आखिर मुझे इस मज्लिस में किस लिये बुलाया गया था?
हजरत महबूब हलाही ने काजी दिलवाजी से पूछा।
काजी साहब पर शेख की गुफ्तगू का इस कदर रोअब तारी हो गया था कि वो कुछ देर बोलने
की हिम्मत न कर सके मगर शेखजादा फरजाम सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक की कुरबत के वजह
से काजी साहब से भी
ज्यादा मगरूर था। इंतिहाई गुस्ताखाना लहजे में बोला। काजी साहब को छोडि़ये मेरे
सवाल का जवाब दीजिये कि आपकी खानकाह में महफिले समा मुनअकिद होती है? हाजिरीन रक्स करते हैं, आहें भरते हैं और नारे लगाते हैं। शेख जादा फरजाम ने
और भी बहुत सी बे मतलब की बातें कीं जिनसे गुस्ताखी और बे अदबी का रंग झलक रहा
था।
हजरत निजामुद्दीन औलिया ने शेखजादा फरजाम को मुखातिब करते हुए फरमाया। इतना
जोश व खरोश मत दिखाओ ज्यादा बेकार बातें
करने की जरूरत नहीं मेरी मजिल्स का जिक्र तो बाद में होगा। पहले ये बताओ कि समा
के क्या मायने हैं?
हजरत महबूब इलाही का सवाल सुनकर शेखजादा फरजाम के चेहरे का रंग उड़ गया फिर उसने
संभलने की कोशिश की और बात बनाते हुए बोला। मै समा के मायने नहीं जानता मगर बड़े
बड़े उलेमा कहते हैं कि समा हराम है।
जब एक शख्स समा के मायने नहीं जानता तो फिर उससे समा के मौजू पर क्या
गुफ्तगू हो सकती है ? हजरत निजामुद्दीन औलिया ने निहायत जब्त तहम्मुल का
मुजाहिरा करते हुए फरमाया।
शेखजादा फरजाम ही हजरत महबूब इलाही के खिलाफ महजर तैयार करने में सबसे आगे था
जवाब देने से आजिज रहा तो शर्म नदामत से पसीने में नहा गया।
जब उलेमा देहली ने अपने काइद का ये हाल देखा तो जोर जोर से बहस करने लगे कभी कभी अपने मुखालिफ उलेमा की
आवाजें इतनी बुलंद हो जाती कि उनका शोर गुल का गुमान होने लगता अगरचे मुखालिफीन का
तर्जे अमल आदाबे मज्लिस के खिलाफ था मगर सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक की हिमायत हासिल
होने के
वजह से बहुत से लोग बहस करने की
बजाय एक दरवेश से जंग कर रहे थे। जब शोर गुल बहुत ज्यादा हो गया तो वाली हिन्दुस्तान
को दर्मियान में मुदाखिलत करनी पढ़ी।‘’ खामोश हो
जाओ और गौर से सुनों शेख क्या फरमाते हैं ?
सैयद अमीर खुर्द की रिवायत है कि इस मज्लिस में मौलाना हमीदुद्दीन और मौलाना शहाबुद्दीन
मुल्तानी भी मौजूद थे। सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक को खुश करने के लिये तमाम उलेमा
बढ़ चढ़कर बोल रहे थे और हजरत निजामुद्दीन औलिया की जाते गिरामी को गैर मुनासिब
तनकीद का हदफ बना रहे थे मगर ये दोनों हजरात खामोश थे। फिर जब शोर गुल कुछ कम हुआ
तो मौलाना हमीदुद्दीन ने फरमारवाए हिंद को मुखातिब करते हुए फरमाया जिस तरह
मुखालिफीन सुल्तानुल मशाइख की मज्लिस का जिक्र कर रहे हैं , दर असल ये मामला नहीं है’’
फिर क्या बात है ? सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक ने पूछा।
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