हजरत निजामुद्दीन औलिया(रह.) पाठ-68
बागी सरदारों के कत्ल के बाद सुल्तान गयासुद्दीन का गुस्सा कम नहीं हुआ
उसने दूसरा हुक्म जारी किया कि मलिक तकीन के तमाम खानदान को गिरफ्तार करके उसके हुजूर पेश किया
जाए शाही हुक्म की तामील के लिए मलिक हशामुद्दीन अवध पहुंचा और मलिक तकीन के तमाम
करीबी रिश्तेदारों को पैरों में जंजीर पहनाकर सुल्तान गयासुद्दीन के सामने पेश किया उससे पहले मलिक तकीन का
दामाद ताजुद्दीन फरार हो गया था मगर सुल्तान के सिपाहियों ने पीछा करके उसे सर जोंदी
के किनारे कत्ल कर दिया था।
वो मंजर भी बड़ा लरजाखेज था जब मलिक तकीन के अफराद व खानदान को देखकर सुल्तान
गयासुद्दीन तुगलक गुस्से से बे काबू हो गया और उसने इंतिहाई जालिमाना हुक्म जारी
कर दिया फिर देखते ही देखत इंसानी हुजूम
के सामने मलिक तकीन के खानदान से तअल्लुक रखने वाले मर्दों के साथ तमाम औरतों और
बच्चों को भी मस्त हाथियों ने रोद डाल। उसके बाद उस खबीस फितरत शायर को पेश किया गया जो उस शाजिस का बानी था
सुल्तान गयासुद्दीन ने बड़ी नफरत के साथ उवेद की तरफ देखा और हुक्म दिया कि उसे फांसी
दे दो। उवेद को सुल्तान के सामने फांसी दी गई जब उसकी जान निकल गई तो गयासुद्दीन
तुगलक ने दूसरा हुक्म देते हुए कहा कि उसकी लाश को दूसरों की इबरत के लिए उलटा
लटका दो और जब ये गलीज बदबू देने लगे उसे उतारकर किसी गढ़े में दबा दो।
उवेद की लाश कई दिन तक फांसी के फंदे पर लटकी रही और शहर वालों के कानों में लबे
वक्त तक हजरत निजामुद्दीन औलिया के ये अल्फाज गूंजते रहे उवेद तू लकड़ी से खेल रहा है। ये चंद तारीखी वाक्यात महज इस लिए पेश किए गये
हैं कि मद्दा परस्तों को खुदाए जुलजलाल की बे पनाह ताकत का अंदाजा हो जाए।
दूसरे बादशाहों की तरह सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक की भी ये ख्वाहिश थी कि
दूसरे दरवेशों और सूफियों की तरह हजरत निजामुद्दीन भी दरबारे सुल्तानी में तश्रीफ
लाएं मगर जब उसे अंदाजा हो गया कि हजरत महबूब इलाही किसी भी हाल में सलातीन और
उमरा की सोहबत पसंद नहीं करते तो पंदारे शाही को ठेस पहुंची अगरचे तारीख नवेसों ने
तुगलक को एक परहेजगार बादशाह करार दिया है
लेकिन वो अपने सीने से जज्बा खुद परस्ती को दूर न कर सका,इसलिए उस दिन का इंतिजार करने लगा, जब हजरत निजामुद्दीन औलिया उसके
सामने आने के लिए मजबूर हो जाएं आखिर दुनिया परस्त उलेमा ने सुल्तान गयासुद्दीन
तुगलक को ये मौका फराहम कर दिया । उलेमा की एक जमाअत सुल्तान की खिदमत में हाजिर
हुई और उसने हजरत निजामुद्दीन औलिया के खिलाफ शिकायत का दफ्तर खोल दिया।
एक शख्स जो अपने आपको दरवेश कहता है जिसका नाम निजामुद्दीन बदायूंनी है, उसे समा सुनने के अलावा में कोई
दूसरा काम नहीं,
उलेमा का लहजा निहायत ही गुस्ताखाना था । अगर उस नाम निहाद दरवेश की गिरफ्त न की गई तो मुसलमानाने हिंद में ये
बिदअत राइज हो जाएगी और पूरा इस्लामी मुआशरा गुमराही के रास्ते पर चल पड़ेगा।
सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक इसी दिन के इंतिजार में था उसने उलेमा से कहा कि
पहले महजर तैयार कराएं फिर वो हजरत निजामुद्दीन औलिया का एहतिसाब करेगा। उलेमा भी
आतिश हसद में जल रहे थे नतीजतन चंद ही रोज में हजरत महबूब इलाही के खिलाफ महजर
तैयार हो गया एक रिवायत के मुताबिक उस महजर पर सैकड़ों के दस्तखत थे सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक ने
फौरन ही हुक्म जारी कर दिया शेख निजामुद्दीन मोहम्मद बदायूंनी पर लाजिम है कि वो
दरबारे सुल्तानी में हाजिर होकर समा का शरअई जवाज पेश करें वर्ना अपने इस मामूल
को हमेशा के लिए खत्म कर दें।
हजरत महबूब इलाही ने जवाबन तहरीर किया सुल्तान पर भी लाजिम है कि वो उन तमाम
उलेमा को जमा कर लें जो समा की मुखालिफत करते हैं इंशाअल्लाह में अकेला आऊंगा और
फरमारवाए हिंद पर साबित कर दूंगा कि समा मुझ जैसे शख्स पर जायज है । उसके
बाद हजरत निजामुद्दीन औलिया खानकाह से निकलकर दरबारे सुल्तानी की तरफ रवाना हुए
दूसरे मुरीदों में तो इतनी हिम्मत नहीं थी कि वो पीरो मुर्शिद के हमराह चलने की
इजाजत तलब करते मगर मौलाना फखरूद्दीन जरादी और काजी मुहीउद्दीन काशानी हाथ बांधे
पीछे पीछे चलने लगे । हजरत महबूब इलाही ने एक नजर अपने दोनों खुलाफा को देखा
मौलाना जरादी और काजी काशानी से सोचा कि हजरत
शेख उन्हें अपने साथ जाने से मना फरमा देंगे
लेकिन हजरत निजामुद्दीन औलिया ने ऐसा नहीं किया ।
अपने पीरो मुर्शिद की रजामंदी पाकर दोनों
बुजुर्गों के चेहरों पर ना काबिल बयान खुशी का अक्स उभर आया।
हजरत
निजामुद्दीन औलिया दरबारे सुल्तानी में तश्रीफ ले गये तो बादशाह की तरफ से एक
महजर पेश किया गया जिस पर सैंकड़ों उलेमा के दस्तखत मौजूद थे हजरत महबूब इलाही ने बहुत गौर से महजर की
इबारत पढ़ी और उलेमा इकराम के नामों का मुशाहिदा किया । उस
वक्त 653 उलेमा ‘ समा’ के
मौजू पर बहस करने के लिए तुगलक के दरबारे में मौजूद थे । अभी बहस का आगाज नहीं हुआ
था कि मौलाना फखरूद्दीन जरादी अपनी नशिस्त पर खड़े हुए और सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक को मुखातिब
करते हुए कहा। ‘’
आपने जिन उलेमा को दरबार में जमा किया है, उनमें से
दस ऐसे अफराद का इंतिखाब कर लें जो अपने इल्म व फजल के ऐतिबार से दूसरे बुजुर्गों पर फोकियत रखते
हों । फिर वहीं मुंतखब उलेमा इस मसअले पर हमसे बहस का आगाज करें।
मौलाना जरादी
की तजवीज के जवाब में सुल्तान गयासुद्दीन ने काजी जलालुद्दीन दिलवाजी की तरफ
देखा जो उस वक्त मन्सब कजा पर फाइज थे ।
सैयद अमीर खुर्द की रिवायत है कि काजी जलालुद्दीन दिलवाजी हजरत निजामुद्दीन औलिया
के मुखालिफीन में सरे फेहरिस्त थे और अक्सर गुफ्तगू करते वक्त शाइश्तगी की हद
से गुजर जाते थे ।

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