मुगल बादशाह जहीरूद्दीन बाबर (भाग-4)
अब तम्बल और सुल्तान अली के बीच ये तय हुआ कि तम्बल
फरगाना के मरकजी शहर अंदजान पर कब्जा कर लेगा जबकि समरकंद सुल्तान अली के कब्जे
में रहने दिया जायेगा।
इसी दौरान तम्बल अपने सिपाहियों की एक बहुत बड़ी टुकड़ी
लेकर जिसे वो पहले तैयार कर चुका था वो अंदजान जा पहुंचा और वहां बाबर का छोटा भाई
जहांगीर और उसके दूसरे घर वाले ठहरे थे । तम्बल ने अंदर ही अंदर साजिश करके बाबर
के भाई जहांगीर को भी अपने साथ मिला लिया और अंदजान शहर पर उसने कब्जा करने का
इरादा कर लिया। साथ ही उसने ये खबरें भी फैला दीं कि वो उमर शेख के बेटे जहांगीर
मिर्जा के लिये अंदजान शहर फतह करना चाहता है।
तम्बल खुलकर अंदजान पर हमला नहीं करना चाहता था उसे पता था
कि अगर बाबर से उसका मुकाबला हुआ तो उसे हार का सामना करना पड़ेगा और बाबर उसका सर
काट देगा। हालात को सामने रखते तम्बल ने तेज रफ्तार कासिद समरकंद की तरफ भिजवाया
ताकि वो जान सके बाबर पर इस खबर का क्या असर हुआ है।
कासिद जब समरकंद पहुंचा तो उसने देखा वहां तो बाबर बीमार
पड़ा था और बाबर हकीकत में उन दिनो बीमार था । कासिद ने तम्बल से कह दिया कि बाबर
सख्त बीमार है और उसके बचने की कोई उम्मीद नहीं ये खबर तम्बल के लिये बड़े
फायदे की थी और उसने समझ लिया कि अब बाबर नहीं बचेगा और अगर बाबर गुजर गया तो कोई
भी इसके खिलाफ कर्रवाई नहीं करेगा इसलिये उसने बाबर के भाई जहांगीर को अपने साथ
मिलाकर अंदजान शहर पर कब्जा कर लिया ।
बाबर को जब बीमारी से कुछ आराम मिला तो उसे मालूम हुआ कि
तम्बल ने उसके शहर अंदजान पर कब्जा कर लिया है और उसके भाई जहांगीर को अपने साथ
मिला लिया है। बाबर अपने लश्कर के साथ समरकंद से निकला ताकि वो अपना शहर अंदजान
वापस ले ले ।
बाबर अभी समरकंद और अंदजान के बीच में ही था कि उसे खबर
मिली कि उसकी गैर मौजूदगी में सुल्तान अली ने अपने लश्कर के साथ समरकंद पर कब्जा
कर लिया है। अब बाबर के पास न समरकंद था और न अंदजान दोनों शहरों पर बड़े लश्कर कब्जा कर चुके थे
उसके अलावा बाबर के वो सिपाही जिन्हें वो अंदजान फतह करने के लिये ले जा रहा था
उनमें से भी बहुत से भगोड़े हो गये कुछ समरकंद की तरफ भाग गये कुछ अंदजान की तरफ
ये दौर बाबर के लिये सबसे बुरा दौर था उसकी समझ में कुछ नही आया कि वो क्या करे? समरकंद उसके हाथ से निकल चुका था
और अंदजान पर पहले ही बागी कब्जा कर चुके थे उस मौके पर बाबर ने कहा था '' अंदजान की खातिर मैंने समरकंद को
खो दिया मगर मालूम हुआ कि उसे खोकर भी दूसरे को न बचा सका''।
बाबर ने जब ये अंदाजा लगा लिया कि
अंदजान और समरकंद में दोनों बागी ताकतें अब उससे ज्यादा तकतवर हो गईं हैं तो उसने
अपने मामू महमूद खान से मदद मांगी जो उस वक्त ताशकंद का हुक्मरां था।
बाबर की मां चूंकि महमूद खान की
बहन थी और वो अंदजान में बागियों के कब्जे
में थी इसलिये महमूद खान एक लश्कर लेकर बाबर की मदद के लिये तैयार हो गया। लेकिन
वो अभी रास्ते में ही था कि उसे खबर मिली कि हालात बाबर के हक में अच्छे नहीं
हैं उसके साथ कुछ ही साथी जिनके साथ न वो अंदजान पर कब्जा कर सकता है न ही समरकंद
पर इसी दौरान अंदजान के नये हाकिम तम्बल ने कुछ तोहफे बाबर के मामू महमूद खान की
तरफ भिजवाए और उसकी बहन और रिश्तेदारों की खैरियत की खबर भी दी । इस पर महमूद खान
बाबर की मदद करने आगे जाने बजाय वापस ताशकंद चला गया।
अपने मामू महमूद खान के इस रवैये
से बाबर बड़ा मायूस हुआ हालांकि उसका मामू ताशकंद का हुक्मरां था। वो अगर पूरी
ताकत से आता और बाबर को भी अपने साथ रखता तो जरूर वो अंदजान के बागियों का सफाया
कर देता लेकिन बागियों के तोहफे वसूल करने के बाद वो ताशकंद चला गया । अब बाबर इधर
उधर घूमने लगा। इस बीच वो अपने साथियों में इजाफा भी करता रहा बहुत मेहनत से उसने
अपने लश्कर में इजाफा करना शुरू किया यहां तक बागियों का एक आदमी जिसका नाम अली
दोस्त था वो बाबर के साथ मिल गया । इस तरह बाबर को कुछ मजबूती हासिल हुई अब उसके
लश्कर की तादाद भी पहले से ज्यादा थी । इसलिये वो अंदजान शहर की तरफ बढ़ा और
बागियों से टकराया और बागियों को अंदजान से बाहर निकाल कर अपने मरकजी शहर पर कब्जा
कर लिया।
एक बार फिर बाबर फरगाना शहर में
दाखिल होने में काम्याब रहा वो अंदजान में अपनी हालत को और मजबूत करके दोबारा
समरकंद पर हमला करके उसे भी अपने हुकूमत में शामिल कर ले।
बाबर के चाचा की बेटी आयशा जिससे
बाबर की मंगनी हुई थी वो अभी तक समरकंद में ही ठहरी हुई थी अब वो जवान हो चुकी थी दूसरी
तरफ बाबर भी अब जवान हो चुका था । जब उसने अपने मरकजी शहर अंदजान पर कब्जा कर
लिया तब उसकी मां और नानी ने आयशा को समरकंद से बुलवाकर बाबर की शादी उससे कर दी।
शादी होने के बाद बाबर अपनी जंगी
तैयारीयों में बहुत बुरी तरह लगा रहा उसने अपनी ताकत और कुव्वत में भी इजाफा कर
लिया अब उसने इरादा कर लिया कि वो समरकंद पर हमला करेगा और उसे अपनी सल्तनत में
शामिल करके उसको बाहरी हमलों से महफूज कर देगा।
दूसरी तरफ समरकंद पर उस वक्त सुल्तान
अली मिर्जा हुकूमत कर रहा था। उसने भी भांप लिया था कि बाबर अंदजान पर कब्जा करने
के बाद समरकंद पर कब्जा जरूर करेगा साथ
ही उसके मुखबिर भी उसे खबर दे रहे थे कि बाबर समरकंद पर हमला करने वाला है।
उन हालात को सामने रखते हुए समरकंद
के हाकिम सुल्तान अली खान ने अजबक सरदार सीबानी खान को अपनी मदद के लिये बुलाया
सिबानी खान चंगेज खान की नस्ल से था और उसका दादा चंगेज खान के सबसे बड़े बेटे
चूची का हम नाम था और उसका नाम जीशान बातू था। बातू तो मुगलों की एक बहुत बड़ी
संस्था का मालिक था। उसका असर रूस के शहरों से एशिया के पहड़ों की दीवारों तक
चलता था।
सीबानी खान के दादा जीशान के बाद
अजबक भी इधर उधार बिखर गये और उनकी तकत कमजोर हो गई एक मौके पर बाबर का नाना यूनुस
खान ने जो ताशकंद का हुक्मरां था शीबानी खान के बाप पर हमला करके उसे कत्ल कर
दिया था।
शीबानी खान भी जवानी के दौर में
बाबर की तरह किस्मत आजमाई के दौर से गुजर रहा था उस वक्त उसके इलाकों पर भी जंगी
डाकू और गैर मुस्लिम हमला आवर होते रहते थे वो उनसे अपने कबीले का बचाव करता था
उन्ही वहशी
कबाइल से बचते हुए शीबानी खान अपने
जंगजू कबाइल को बहर-ए- आराल की उत्तर की चरागाहों से दक्षिण की तरफ ले गया था।
दक्षिण की तरफ बढ़ते हुए शिबानी
खान ने सबसे पहले बुखारा पर कब्जा किया । बुखारा में कदम जमाने के बाद शीबानी खान
ने अपनी ताकत में इजाफा किया अब जबकि समरकंद के हुक्मरां सुल्तान अली ने बाबर के
खिलाफ मदद लिये पुकारा तब शीबानी खान सुल्तान
मिर्जा की मदद के लिये नहीं आया बल्कि वो चाहता था कि समरकंद पर भी कब्जा करके
अपनी ताकत को बढ़ाया जाय और अपनी सल्तनत को भी फैलाए।

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