हजरत निजामुद्दीन औलिया(रह.) भाग-30
खुसरू तुम मुझे बताओ कि मैं तुम्हारे पीरो मुर्शिद की
खिदमत में क्या नजर भेजूं ? सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने अपने मसाहिब-ए-खास को खामोश पाकर दोबारा पूछा
हजरत अमीर खुसरू ने कोई जवाब नहीं दिया बदस्तूर खामोश रहे।
सुल्तान अलाउद्दीन
खिलजी हैरतजदा होकर खुसरू को देखने लगा क्या कोई खास बात है जो तुम मुझसे
छुपाना चाहते हो ? सुल्तान ने अमीर खुसरू की खमोशी की वजह पूछनी चाही ।
इस बार हजरत अमीर खुसरू के होंटों को जंबिश हुई और आपने
वाली-ए- हिन्दुस्तान को हजरत निजामुद्दीन औलिया की जिंदगी का एक अहम
वाक्या सुनाते हुए फरमाया
मेरे शेख हजरत निजामुद्दीन औलिया नमाज जुमा अदा करने के
लिये गयास पुर से कीलू खेड़ी तशरीफ ले जाते है शदीद गर्मी मे मौसम में ये तवील
फासला इंसानी जिस्म को बहुत गिरां गुजरता है एक दिन पीरो मुर्शिद के दिल में ख्याल
आया कि अगर मेरे पास घोड़ा होता तो ये एक कोस से ज्यादा का फासला सवारी पर कर
लेता और गर्म हवाओं के तकलीफ देने वाले झोकों से किसी हद तक महफूज रहता हजरत शेख नूरूद्दीन यार परां जो एक मुमताज
सूफी है, उनके खादिम के पास एक घोड़ी थी जिस रोज
हजरत निजामुद्दीन औलिया के दिल में ये ख्याल आया था, उसी
रोज हजरत शेख नूरूद्दीन के खादिम ने ख्वाब
में अपने पीरो मुर्शिद को देखा शेख नूरूद्दीन यार परां अपने खादिम से फरमा
रहे थे तेरे पास जो घोड़ी है, उसे शेख निजामुद्दीन की खिदमत
में फौरन पेश कर दे कि नमाज जुमा के लिये पैदल चलकर सख्त तकलीफ उठाते हैं।
सुबह जब आंख खुली तो हुक्म शेख पर अमल करने का इरादा किया
मगर किसी काम की वजह से अपने इरादे को तकमील तक न पहुंचा सका और शाम होते होते
उसके जहन से वो ख्वाब भी मिट गया फिर जैसे ही दूसरी रात सोया, उसने वही ख्वाब देखा अबकी बार हजरत शेख
नूरूद्दीन यार परां किसी कदर नाराजगी से फरमा रहे थे हुक्म की तामील में देर क्यों
हो गई ? मुझे मालूम है तेरी गफलत की वजह से शेख हजरत
निजामुद्दीन औलिया को किस कदर तकलीफ हो रही है?
खादिम बेचैन होकर उठा फिर जैसे ही सुबह हुई, उसने फजर की नमाज अदा की और घोड़ी लेकर
हजरत महबूब इलाही की खिदमत में हाजिर हुआ हजरत निजामुद्दीन औलिया ने खादिम से उसकी
आमद का मकसद पूछा जवाब में खादिम ने अपना ख्वाब सुनाकर घोड़ी को नजर के तौर पर
पेश करना चाहा ।
खादिम की वजाहत के बाद हजरत निजामुद्दीन औलिया ने फरमाया
तुम अपने शेख के हुक्म से ये हदिया मेरे पास लाए हो मगर मैं उसे उस वक्त तक
कुबूल नहीं करूंगा जब तक मेरे शेख हजरत बाबा फरीद मसऊद गंज शकर मुझे हुक्म नहीं
देंगे ।
हजरत नूरूद्दीन मलिक यार परां का खादिम मायूस होकर चला गया
फिर तीसरी शब उसने ख्वाब में अपने शेख को देखा हजरत नूरूद्दीन फरमा रहे थे हजरत बाबा फरीद ने शेख निजामुद्दीन को हुक्म दे
दिया है तू किसी पसो पेश के बगैर नजर पेश कर दे , वो कुबूल कर लेंगे ।
फिर जब सुबह हजरत नूरूद्दीन मलिक परां का खादिम घोड़ी लेकर
हजरत महबूब इलाही के पास पहुंचा तो आपने नजर कुबूल फरमा ली ये कहकर हजरत अमीर
खुसरू खामोश हो गये।
सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी एक जहीन हुक्मरां था उसने हजरत
अमीर खुसरू की इस अलामती गुफ्तगू का मतलब समझ लिया और इस राज तक पहुंच गया कि हजरत
निजामुद्दीन औलिया उसकी नजर कुबूल नहीं फरमाएंगे वाली ए हिंदुस्तान ने हजरत अमीर
खुसरू के इस इशारे को इक्तिदार की अना और शाहाना जिद का मसला नहीं बनाया और किसी
मुनासिब मौके का इंतिजार करने लगा।
फिर एक दिन सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने हजरत अमीर खुसरू से
मश्वरा किये बगैर हजरत निजामुद्दीन औलिया की खिदमत में एक कीमती नजर भेजी।
हजरत महबूब इलाही के खलीफा-ए-अकबर हजरत शेख नसीरूद्दीन चिराग
देहलवी के मलफूज खैरूलमजालिस में एक मकाम पर तहरीर है कि सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी
ने अपने हाजिब( दरबाने खास) के जरीये हजरत महबूब इलाही को पचास हजार दीनार बतौर
नजर पेश किये थे मगर हजरत महबूब इलाही ने दौलत के इस अंबार को कुबूल नहीं फरमाया
था और इस कदर अजब अंदाज से इंकार किया था कि अहले मजिलस हैरतजदा रह गये।

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