हजरत निजामुद्दीन औलिया(रह.) भाग-31
हजरत नसीरूद्दीन चिराग देहलवी इस वाक्ये की तफसील बयान
करते हुए फरमाते हैं कि एक दिन मौलाना हसामुद्दीन नुसरतखानी और मौलाना अश्रफउद्दीन
काशानी , हजरत निजामुद्दीन औलिया की खिदमत में हाजिर
थे हजरत महबूब इलाही ने तमाम अहले मजलिस की तरफ देखते हुए फरमाया अगर कोई शख्स
दिन को रोजा रखे और रात को इबादत करे तो ये काम बहुत आसान है कि ये काम तो बेवा
औरतें भी कर सकती हैं लेकिन वो काम कुछ और है जिसके जरिये मर्दाने तलबगार खुदावंद
जुलजलाल का कुर्ब हासिल करते हैं ।
हजरत निजामुद्दीन
औलिया का इरशादे गिरामी सुनकर तमाम अहले मजलिस
परेशान हो गये कब आप इस नुक्ते की तशरही
करें कब अहले तलब को करार आये हजरत
महबूब इलाही ने राह सुलूक के मुसाफिरों की
बेकरारी का अंदाजा कर लिया और फरमाया कि इंशाअल्लाह किसी और वक्त माअरफत के इस राज को जाहिर किया
जायेगा।
काफिला शब रोज अपनी मंजिल की जानिब बढ़ता रहा
फिर तकरीबन छ: माह बाद हजरत निजामुद्दीन औलिया को अपना अहद याद आ गया आप उस
नुक्ते ही वजाहत करने ही वाले थे कि मोहम्मद कातिब जो सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी
का मुकर्रब था , मज्लिस
में दाखिल हुआ और दस्तबस्ता बैठ गया
मोहम्मद कातिब को दुनियावी इज्जत वकार के साथ ये शर्फ भी हासिल था कि वो हजरत निजामुद्दीन औलिया हलका-ए- इरादत में
शामिल था हजरत महबूब इलाही ने उसे देखते
ही फरमाया मोहम्मद तुम कहां थे ?
अलउद्दीन खिलजी के मुकर्रब ने अपने पीरो मुर्शिद के हुजूर
रस्मे एहतराम अदा की और फिर सर अकीदत खम करते हुए अर्ज करने लगा सैयदी मैं वाली
हिंदुस्तान के दरबार में था , आज सुल्तान ने पचास हजार दीनार सुल्तान ने आपको नजर किये हैं।
अपने मुरीद मोहम्मद कातिब की बात सुनते ही हजरत
निजामुद्दीन औलिया ने मौलाना हसामउद्दीन नुसरतखानी, मौलाना अश्रफउद्दीन और दीगर हाजिरीन
मजलिस की तरफ देखते हुए फरमाया बादशाह का इनआम बेहतर है या उस वादे का वफा करना
जो कुछ दिन पहले तुम लोगों से किया गया था।
तमाम अकीदतमंदों और खिदमतगारों के सर झुक गये और सब ने ब एक
जबान अर्ज किया इफाए अहद ज्यादा बेहतर है ।
हजरत महबूब इलाही ने इरादतमंदों का जवाब सुना और अपनी बात
की वजाहत करते हुए फरमाया इफाए अहद आठ बहशतों से बेहतर है उसके सामने पचास हजार
दीनार की हैसियत ही क्या है?
यही वो नुक्ता था जिसकी वजाहत हजरत निजामुद्दीन औलिया ने छ: माह बाद ऐसे मौके पर फरमाई थी जब सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी आपके मुबारक कदमों में दौलत के अंबार लगा देना चाहता था दरअसल इफाए अहद की सब कुछ है और अपने अहद का पास रखना जांबाज मर्दों का काम है और मर्दान जांबाज ही हक ताअला की बारगाह-ए- जलाल में कुर्बत हासिल करते हैं।
ये भी हजरत महबूब इलाही की एक बड़ी करामत है कि आपने माअरफत के एक अहम राज को जाहिर करने के लिये ऐसे वक्त का इंतिखाब किया जब आप एक बड़ी आजमाईश से गुजरने वाले थे कुरआन करीम में एक जगह इरशाद हुआ है कि अल्लाह का महबूब बंदा वो है जो गुनाही पर कदर रखता हो मगर जब एसा लम्हा आए तो बे इख्तियार कहे कि मैं अपने अल्लाह से डरता हूं । हजरत महबूब इलाही भी अतिया सुल्तानी कुबूल करने पर इखितयार रखते थे मगर आपने ताइदे गैबी के सहारे इंसानी नफसानी से बड़ी कमजोरी पर काबू पाया और उस चीज को ठुकरा दिया जिसकी तलब में बे शुमार लोग हलाक हो चुके हैं।
कुरआन करीम
में एक और मकाम पर इरशाद हुआ है माल - दौलत और औलाद इंसान के लिये सबसे बड़ा
फितना है जो उस फितने से बच कर सलामती के साथ गुजर गया,
उसी को खुदावंद जुलजलाल की कुर्बत हासिल होती है हजरत निजामुद्दीन औलिया ने अपनी
मज्लिस खास में इसी तरफ इशारा फरमाया था ।
दूसरे दिन मोहम्मद कातिब ने सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी को
ये वाक्या सुनाया तो उसके चेहरे का रंग बदल गया और बहुत दिल शिकस्ता नजर आने लगा वाली हिंदुस्तान
की मायूसी और आजरदगी देखकर मोहम्मद कातिब ने कहा सुल्तान जी चश्म अफसुरदा खातिर न हों हजरत निजामुद्दीन औलिया एक
मर्दे आजाद हैं उन्हें किसी ओहदे , या मन्सब या माल-दौलत से मुतास्सिर नहीं किया जा
सकता बस अपने जज्बा अकीदत को जिंदा रखीये कि शायद रोजो सलाम शौक कुबूल हो जाये।

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