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                         जहांगीर और नूरजहां भाग-4 लेकिन तख्‍त पर बैठने के बाद जहांगीर ने उसकी ये गल्‍ती माफ कर दी और उसे बंगाल की जागीर पर बहाल रखा । शेर अफगन के कत्‍ल के बाद उसकी बीवी मेहरून्निसा (नूरजहां) को उसकी बेटी लाडली बेगम के साथ जहांगीर के दरबार में भेज दिया गया। मेहरून्निसा को अकबर की बीवी सलीमा बेगम की खिदमत पर लगा दिया गया । सन् 1611 ई. में जश्‍ने बहार के मौके पर पहली बार इत्तिफाक से नूर जहां को देखा तो उसका दीवाना हो गया और दो माह बाद ही उससे शादी कर ली । जहांगीर ने उसे नूर महल का नाम दिया । अपनी काबिलियत के दम पर नूरजहां बहुत जल्‍द जहांगीर के करीब होती चली गई । उसके बाप को इतिमातुद्दौला का खिताब दिया गया और उसके भाई को तरक्‍की दी गई। शेर अफगन नूरजहां और जहांगीर के बारे में अनगिनत कहानियों ने जन्‍म लिया । कुछ लोगों ने लिखा कि जहांगीर अकबर के जमाने में ही नूरजहां की मोहब्‍बत में गिरफ्तार हो गया था लेकिन उसकी मंगनी शेर अफगन के साथ हो गई थी इसलिये जहांगीर के रास्‍ते में बहुत ज्‍यादा मुस्किलें पैदा हो ...

हजरत निजामुद्दीन औलिया (रह.) भाग-15

हजरत निजामुद्दीन औलिया (रह.) भाग-15





निजामुद्दीन इस दुनिया में तुझसे ज्‍यादा बद नसीब कौन होगा?

ये परेशानी  हद से बढ़ी तो एक कुंए के करीब पहुंचे और चाहा कि अपने आपको पानी में गर्क करके इस जान लेवा दर्द से निजात हासिल कर लें फिर ख्‍याल आया कि खुदकशी हराम है और अगर खुदकशी जायज भी होती तो जुर्म अपनी जगह फिर भी बरकरार रहता इस के साथ ये भी ख्‍याल अया कि अगर कुंए में डूब गया तो कितने अफसाने बनेंगे, पता नहीं इस जुर्म में कितने बे गुनाह लोगों से पूछ ताछ की जायगी।


अलगर्ज हजरत निजामुद्दीन औलिया अजीब दोरे वहशत से गुजरत रहे थे कई दिन तक खाना नहीं खाया आखिर हजरत बाबा फरीद के एक साहब जादे हजरत शेख शहाबुद्दीन आपको तलाश करते हुये जंगल पहुंचे हजरत निजामुद्दीन औलिया की  सिकश्‍ता हालत देखकर आप खुद भी रोने लगे मौलाना ये क्‍या हाल बना रखा है?


हजरत निजामुद्दीन औलिया कोई जवाब नहीं दे सके बस आंखों से आंसू बरस रहे  थेे मानो आंसू ही आपके गम का हाल बयान कर रहे थे।

हजरत शेख शहाबुद्दीन और हजरत निजामुद्दीन औलिया में गहरी दोस्‍ती थी पीरो मुर्शिद की नाराजगी के  खौफ से दूसरे मुरीद तो  हाल न पूूूछ सके मगर हजरत शेख शहाबुद्दीन अपने साथ खाना लेकर गये थे मौलाना कब तक फाके करोगे?

अब कुछ अच्‍छा नहीं लगता हजरत निजामुद्दीन औलिया ने फरमाया।

मेरी खातिर चंद लुक्‍मे ही खा लो हजरत शेख शहाबुद्दीन ने कहा मैं बाबा जान से अर्ज करूंगा।

ये नोयद सुनते ही ऐसा लगा जैसे हजरत निजामुद्दीन औलिया तन मुर्दा में जान पड़ गई हो।

फिर एक दिन तन्‍हाई में शेखजादा शहाबुद्दीन ने हजरत बाबा फरीद से अर्ज किया मखदूमी मौलाना निजामुद्दीन का बहुत बुरा हाल है अब आप उन्‍हें माफ कर  दीजिये वर्ना आपके कदमों से ये दूरी उन्‍हें हलाक कर डालेगी।

शहाबुद्दीन मैं भी इस जुदाई में मुज्‍तरिब हूं  हजरत बाबा फरीद के लहजे से उदासी का रंग नुमाया था लोग इसे मअतूब न समझें वो मेरा महबूब है मगर इश्‍क में ऐसा मकाम भी आ जाता है कि जिससे गुजरे बगैर इंसान की तकमील नहीं होती।

फिर मौलाना निजामुद्दीन के लिये क्‍या हुक्‍म है? शेख शहाबुद्दीन ने अर्ज किया।

उसे मेरा सलाम पहुंचाओं और कहो दर्सगाह उसकी मुन्‍तजिर है हजरत बाबा फरीद ने फरमाया ।

जब हजरत शेख शहाबुद्दीन ने हजरत निजामुद्दीन औलिया को ये खुशखबरी सुनाई तो आप शिद्दत जज्‍बात में रोने लगे।

आप क्‍यों रोते हैं मौलाना? उस वक्‍त बदबख्‍ती के एहसास ने रूलाया था, अब खुश बख्‍ती के आंसू बहाता हूं। 

फिर खानकाह में हाजिर हुये और हजरत शेख के सामने इतना रोये  हाजिरीन मज्लिस की भी आंखे नम हो गईं अगर आपका   करम न होता तो ये सवाली कहा जाता? हजरत निजामुद्दीन औलिया ने हिचकियों के दर्मियान अर्ज किया।

हमने  तुम्‍हें देहली से इसलिये तो नहीं बुलाया था कहीं और चले जाने देते हजरत बाबा फरीद का दस्‍त मेहरबान साया फगन था और जबान मुबार से मुहब्‍बत के चश्‍मे फूट रहे थे एक बार आ गये  तो बस आ आ गये अब जहां भी रहोगे, हमारे ही रहोगे।

फिर जब आतिश फराक बुझ गई तो हजरत निजामुद्दीन औलिया पीरो मुर्शिद के सामने दो जानों होकर बैठ ।

मौलाना निजाम मैंने ये सब तुम्‍हारी तकमील के लिये किया  हजरत बाबा फरीद ने अपने मुरीद ब सफा को मुखातिब करते हुये फरमाया शुक्र उस मालिक हकीकी का जिसने अपने बन्‍दे की दस्‍तगीरी की और बादी खारजार में मुसाफिर इश्‍क को साबित कदम रखा इसके बाद हजरत बाबा फरीद ने हजरत निजामुद्दीन औलिया को अपने पैराहन खास से सरफराज फरमाया।

दरअसल ये हजरत निजामुद्दीन औलिया की आजमाईश थी उनकी मुहब्‍बत और जर्फ को देखना भी और दूसरों को दिखाना भी हजरत निजामुद्दीन औलिया एक आलिम फाजिल शख्‍स थे और पूरी देहली में महफिले सुकन के नाम से मश्‍हूर थे नो उमरी के बाबजूद उलेमा ऐ वक्‍त आपका ऐहतराम करते थे।

 एक जरा सी बात पर पीरो मुर्शिद का नाराज हो जाना और हाजिरीन मज्लिस के सामने बरहमी का इजहार करना कोई मामूली वाक्‍या नहीं था अगर हजरत निजामुद्दीन औलिया की अकीदत सतही होती तो अर्ज कर सकते थे कि सिर्फ इस इत्तिलिआ पर कि शेख नजीबुद्दीन मुतवक्किल के पास बेहतर नुसखा मौजूद है, इस कदर गैजो गजब क्‍यों? जाहिर की निगाह में ये कोई गुस्‍ताखी नहीं थी।

 मगर इश्‍क की नजर में जुर्म अजीम था  हुजूर शेख लब कुशाई क्‍यो की? हजरत निजामुद्दीन औलिया का इश्‍क सच्‍च था इसलिये गलती के ऐहसास ने आपको कई दिन तक रूलाया पीरो मुर्शिद की नाराजगी को दीन व दुनिया की बरबादी समझा एहसास की यही गहराई हजरत निजामुद्दीन औलिया के इश्‍क की सदाकत पर गवाही देती है । 

इम्तिहान ये था देहली का महफिले शुकन अना परस्‍त है या नियाजमंद अगर निजामुद्दीन औलिया अना परस्‍त होते तो पीरो मुर्शिद के अन्‍दाज तगाफुल से दिलबर्दास्‍ता होकर देहली वापस जा चुके होते .... मगर चूंकि  नियाजमंद थे, इसलिये दामन फैलाये मुर्शिद के दर पर पड़े रहे और फिर यही कासा लैसी आपके काम आ गई पहले पीरो मुर्शिद के महबूब बने और बाद में महबूबे इलाही बन गये ।

इसी जमाने में हजरत निजामुद्दीन औलिया के फाजिल दोस्‍त किसी काम से अजोधन आये। हजरत निजामुद्दीन औलिया को खबर हुई तो आप मुलाकात के लिये तश्‍रीफ ले गये वो दोस्‍त अपने किसी रिश्‍तेदार के मकान में ठहरे थे और ये मकान अजोधन के बाजार में था। हजरत निजामुद्दीन औलिया के फटे पुराने कपड़े देखकर दोस्‍त को शदीद तकलीफ पहुंची।

मौलाना निजामुद्दीन ये क्‍या हाल बना रखा है? दोस्‍त ने इन्तिहाई अफसुर्दा लहजे में कहा।

अल्‍लह अपने बंदों को जिस हाल में भी रखे मकाम शुक्र है। हजरत निजामुद्दीन औलिया ने टालने की कोशिश की तुम कैसे हो? अहले खाना आफियत से हैं इसके बाद देहली के दूसरे दोस्‍तों की खैरियत पूछते रहे।

दोस्‍त ने कोई जवाब नहीं दिया और उदास नजरों से हजरत निजामुद्दीन औलिया की जाहिरी हालत को देखता रहा। मौलाना निजाम जुम्‍हें  वो दिन याद हैं जब मैं और तुम देहली की इल्‍मी मज्लिसों में मुनाजरे किया करते थे?




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