हजरत निजामुद्दीन औलिया(रह.) भाग-29
सुल्तान जी वकार : मैं क्या अर्ज करूं कि मैंने शेख की जात-ए- आली सिफात में क्या देखा है? खिलजी अमीर की जबान लड़खड़ाने लगी वो सुल्तान से कहना चाहता था कि
मैंने एक दरवेश बे सरोसामानी के कदमों में दौलत का दरिया बहता हुआ देखा मगर जैसे ही
वो इस राज को फाश करने की कोशिश करने कोशिश करता, उस पर ना
मालूम सा खौफ सा तारी हो जाता और फिर जब वो अपने इरादे से बाज रहता तो उस की हालत
मामूल पर आ जाती।
सुल्तान अलाउद्दीन ने अमीर से कई बार पूछा मगर मगर वो इतना
ही कहकर रह गया शेख में इतनी खूबियां हैं कि वो अल्फाज के हिसार में नहीं आती ।
गायबाना तौर वाली हिंदुस्तान भी हजरत निजामुद्दीन औलिया की तरफ बढ़ने लगा।
अमीर खुसरू , हजरत निजामुद्दीन औलिनया के इंतिहाई चहेते और महबूब मुरीद थे हजरत अमीर खुसरू को सुल्तान ग्यासुद्दीन बलबन के आखिरी जमाने में उरूज हासिल हुआ बलबन का सबसे बड़ा शहजादा खान शहीद , हजरत अमीर खुसरू से बहुत मोहब्बत करता था खुद अमीर खुसरू भी शहजादा खान शहीद से बहुत ज्यादा कुरबत रखते थे।
फिर शहजादा खान मोहम्मद मुल्तान में मुगलों के हाथों शहीद हो गया तो हजरत अमीर खुसरू गिरफ्तार कर लिये गये और फिर आपको रूसी तुर्किस्तान ले जाया गया कई साल बाद कैद से रिहा हुए शहजादा खान शहीद का ऐसा असरंगेज मर्सिया लिखा जिसे सुनकर सुल्तान गयासुद्दीन बलबन जारोकतार रोने लगा था।
बलबन सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी के ओहदे हुकूमत में हजरत अमीर खुसरू को अमीर का मंसब हासिल हुआ आपको खलअत इमारत से नवाजा गया और बारह सौ तिनका सालाना वजीफा मुकर्रर किया गया जलालुद्दीन के कत्ल के बाद सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने भी अमीर खुसरू का ओहदा मन्सब बहाल रखा फिर सुल्तान से इस कदर कुर्बत बढ़ी कि आप मसाहिबीन खास के हल्के में शामिल हो गये।
फिर जब भी फुर्सत के लम्हात मैस्सर आते और सुल्तान हजरत
अमीर खुसरू को खलवत में तलब करता तो आप अलाउ्द्दीन खिलजी के सामने पीरो
मुर्शिद हजरत निजामुद्दीन औलिया की
रूहानियत और तकवे का जिक्र छेड़ देते खिलजी अमीर पहले ही महबूब इलाही की शान में
कसीदे पढ़ चुका था जब अमीर खुसरू भी इन्तहाई वालहाना अंदाज में हजरत निजामुद्दीन
औलिया का जिक्र करते तो सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी जैसा खुद परस्त हुक्मरां उस
दरवेश के बारे में सोचने पर मजबूर हो जाता जो गयासपुर के एक गौसे में बैठकर लोगों
के दिलों पर हुकूमत कर रहा था।
खुसरू ऐसा नजर आता है जैसे शेख निजामुद्दीन औलिया के जिक्र
के अलावा तुम्हें और कोई काम ही नहीं है।
सुल्तान मुअज्जम मेरे शेख ऐसे ही हैं हजरत महबूब इलाही का नाम लेते ही हजरत अमीर
खुसरू के चेहरे पर अकीदत व मुहब्बत का समन्दर मोजजन नजर आने लगता था।
खुसरू तुम अपने पीरो मुर्शिद से कितनी मोहब्बत करते हो ? एक बार सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने पूछा ।
सुल्तान जी चश्म
गरीब खुसरू के पास अपने शेख से मोहब्बत नापने को कोई पैमाना नहीं है हजरत अमीर खुसरू ने निहायत इंकिसारी के साथ
फरमाया फिर भी ? फिर भी
अलाउद्दीन खिलजी , अमीर खुसरू की इंतिहाई अकीदत देखना चाहता
था।
सुल्तान जी वकार इस गुलाम के पास एक जान बे करार के सिवा
कुछ भी नहीं हजरत अमीर खुसरू ने फरमाया अगर पीरो मुर्शिद हुक्म दें तो नजराना जान
कदमों में रखकर अर्ज करूं कि सैयदी ये हकीर तोहफा आपके शान के मुताबिक नहीं ।
हजरत अमीर खुसरू का जोश-ए- अकीदत देखकर सुल्तान अलाउद्दीन
खिलजी हैरान रह गया और फिर ना दीदा तौर पर वाली हिंदुस्तान भी हजरत निजामुद्दीन
औलिया की जाते गिरामी का असीर होता चला गया।
एक दिन सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने हजरत अमीर खुसरू को
खलवत शाही में तलब करते हुए कहा खुसरू मेरा दिल चाहता है कि कि मैं तुम्हारे शेख के लिये इस कदर तहाइफ
भेजूं मेरे चारों तरफ सेमो जर के अंबार लगे हुए हैं अगर इसमें से कुछ दौलत किसी
दरवेश के काम नहीं आई तो फिर वसाइल का जखीरा बेकार है अगरचे अलाउद्दीन खिलजी ने ये
बात खुलूस दिल से कही थी लेकिन हजरत अमीर खुसरू खामोश रहे।
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