हजरत निजामुद्दीन औलिया(रह.) भाग-56
दुकानदार हंस कर कहने लगा मैं साफ और
खरा आदमी हूं तुम मुसाफिर अजनबी हो सबसे बढ़कर
ये कि मुसलमान हुकूमत के जिम्मि हो इसलिये मैंने तुम्हें बुराई से बचाना
जरूरी समझा
जिम्मि का मतलब क्या होता है ? जिसकी हिफाजत मुसलमान हुकुमत के
जिम्मे हो,
उसे इस्लामी शरीअत में जिम्मी कहते हैं, मैं भी इस्लामी हुकूमत का एक
फर्द हूं और तमाम हिन्दूओं को जिम्मी समझता हूं इसलिये तुम्हारी हिफाजत करना
मेरा फर्ज है।
मुझे तुम्हारे इस ख्याल से बहुत
खुशी हुई मैंने दुकानदार की बात सुनकर कहा तुमने मुझे लफ्ज जिम्मी का मफहूम
समझाया मैं भी शुक्रगुजारी के तौर पर तुम्हें एक गुनाह से बचाना चाहता हूं जिसमें
तुम अनजाने में मुब्तिला हो गये हो तुम आज
ही मेरे साथ हजरत निजामुद्दीन औलिया की खानकाह चलो।
वो राजी हो गया जब हम दोनों खानकाह
में दाखिल हुए तो वहां आम दिनों से ज्यादा हुजुम था मजिलस में कोई जगह खाली नहीं
थी मजबूरन मैं सबसे पीछे बैठ गया मगर वो दुकानदार हाजिरीन की सफों को चीरता हुआ और
हजरत शेख निजामुद्दीन औलिया के करीब पहुंचा और निहायत बे अदबी का मुजाहिरा करते
हुए आपके सामने बैठ गया मुझे इस शख्स की ये हरकत सख्त नगवार गुजरी अगर मज्लिस
आदाब का लिहाज न होता तो मैं उसे आगे जाने से रोक देता मगर मेरी पहुंच से दूर था, इसलिये कुछ न कर सका और अपनी जगह
बैठा पेचताब खाता रहा फिर मैंने अपने आस -पास नजर डाली हर शख्स के चेहरे पर शदीद गुस्से के
आसार नुमायां थे मगर कोई भी शख्स शेख के एहतराम के पेशे नजर लब कुशाई की हिम्मत
नहीं कर सका था । हजरत निजामुद्दीन औलिया ने बड़ी मुहब्बत के साथ दुकानदार को पास
बैठाया और हाल पूछा और फरमाया तुम इसी शहर
के रहने वाले हो ।
जी हां मैं देहली का कदीम बाशिंदा
हूं मेरे बाप दादा भी यहीं रहते थे।
तुम्हारा बहुत शुक्रिया तुम इस
फकीर की मज्लिस में आये हजरत निजामुद्दीन औलिया ने दिलनवाज लहजे में फरमाया ।
जब हजरत निजामुद्दीन औलिया ने बात
मुकम्मल की तो दुकानदार ने मेरी तरफ मुड़कर देखा मगर मैं इतने दूर बैठा हुआ था कि वो मुझे नहीं देख सकता
था मगर मैं उसकी एक एक हरकत देख सकता था मैंने देखा उसके चेहरे पर खौफ की कैफियत
तारी थी दरअसल हजरत निजामुद्दीन औलिया ने उन बातों का जिक्र छेड़ दिया था जिन्हें
बुनियाद बनाकर वो दुकानदार शेख की शान की गुस्ताखी करता था।
हजरत शेख की ये बातें सुनकर
दुकानदार ने इतनी जोर से चींख मारी कि पूरी मज्लिस गूंज गई फिर वो हजरत
निजामुद्दीन औलिया का हाथ पकड़कर हिचकियों से रोने लगा शेख मुझे माफ कर दीजिये मैं
बड़ी गुमराही में था।
हजरत निजामुद्दीन औलिया ने इन्तिहाई
शफक्कत से उसके सर पर हाथ फेरते रहे अगर अल्लाह हिदायत न दे तो हम सब गुमराह हो
जाएं हजरत निजामुद्दीन औलिया ने अपने शेख जादे सैयद मोहम्मद से फरमाया जो करीब ही
बैठे हुए थे उन्हें उठाओ पानी पिलाओ , खाना , हलवा और पानी लेकर गये हजरत निजामुद्दीन औलिया ने
अपने दस्ते मुबारक से दुकानदार को एक निवाला खिलाया हलक से गिजा उतरते ही उसकी
तबियत संभल गई शेख बस ये बहुत है
नहीं ये सब खाओ हजरत निजामुद्दीन
औलिया ने फरमाया तुम हमारे मेहमान हो ।
अलगर्ज दुकानदार ने हलवा खाया और
बहुत आजिजी से बोला शेख जब आपने मुझ गुनाहगार को माफ कर दिया तो इतना करम और फरमा
दीजिये।
अब क्या चाहते हो ? हजरत निजामुद्दीन औलिया ने फरमाया
मुझे अपनी गुलामी का शर्फ बख्श
दीजिये दुकानदार रोकर कहने लगा
हजरत निजामुद्दीन औलिया ने ख्वाजा
सैयद मोहम्मद की तरफ इशारा करते हुए फरमाया ये पीरो मुर्शिद का नवासा है और मेरा
बेटा है,
तुम इससे बेयत करो फिर ख्वाजा मोहम्मद को मुखातिब करते हुए फरमाया मोहम्मद ये
तुम्हारे मेहमान हैं आज रात इन्हें अपने घर ठहराओ उसके बाद मुझे हुकुम दिया आज
तुम भी सैयद मोहम्मद के मेहमान होगे हम
दोनों ने हुक्मे शेख की तामील की और ख्वाजा सैयद मोहम्मद के मकान पर हाजिर हुए
फिर दुकानदार हजरत ख्वाजा मोहम्मद के हलका इरादत में शामिल हो गया अहले शहर ने
इस इंकिलाब पर बड़ी हैरत का इजहार किया, दुकानदार का हजार ग्राहकों से वास्ता पड़ता था और
वो हजरत निजामुद्दीन औलिया के हर अकीदतमंद से यही कहा करता था ‘तुम बुत परस्त हो’
आज उन लोगों ने हजरत निजामुद्दीन
औलिया के आस्ताने मुबारक पर उस शख्स को अकीदत से झुके हुए देखा तो हैरतजदा लहजे
में पूछा ‘
तू भी बुत परस्तों में शामिल हो गया?’
बुत परस्तों में तो शामिल नहीं
हुआ मगर हजरत निजामुद्दीन औलिया का गुलाम जरूर बन गया हूं दुकानदार की सारी जबानी
खत्म हो गई थी और उसके लहजे से इस कदर आजिजी का इजहार होने लगा था जैसे वो कोई
गदागर है
आखिर तूने शेख की गुलामी क्यों
इख्तियार की ? लोग
उससे सवाल करते
ये मत पूछो कि मैंने हजरत शेख की
जात में क्या देखा ? ये कहकर दुकानदार रोने लगा।
तब तक देहली में रहा,
वो रोजाना मेरा शुक्रिया अदा करता महेंन्द्र देव तुम्हारा दक्किन से
देहली आना,
मेरे लिये बड़ा मुबारक साबित हुआ अल्लाह के बड़े अजीब इंतिजामात हैं कोई सोच भी
नहीं सकता कि किसको किस तरह हिदायत बख्शेगा न तुम मेरी दुकान पर आते और न मैं
हजरत शेख के दरबार में हाजिर होता अल्लाह तुम्हें दोनों जहां में इज्जतें बख्शे।

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