हजरत निजामुद्दीन औलिया(रह.) भाग-57
उस रात महेन्द्र देव हजरत ख्वाजा
मोहम्मद का मेहमान था खाने से फारिग होने के बाद उसने मोहम्मद से अर्ज किया आज
मैंने अपनी आंखों से हजरत शेख की कई
करामात देखीं और उन करामात का तअल्लुक हम दोनों की जात से था महेन्द्र देव ने
दुकानदार की तरफ इशारा करते हुए कहा मेरी दरख्वास्त है कि आप हजरत शेख की कोई और
करामत बयान फरमाएं
हजरत ख्वाजा सैयद मोहम्मद ने
निहायत पुरसोज लहजे में फरमाया मैं हजरत शेख की किस किस करामात का जिक्र करूं? आपकी जिंदगी हर काम और दिन और रात का हर लम्हा करामतहै ‘ हजरत ख्वाजा सैयद मोहम्मद ने इख्तिसार से काम लिया
महेन्द्र देव चूंकि गैर मुस्लिम
था, इसलिये आपकी बात का मतलब नहीं समझ
सका और बराबर करामत के बारे में पूछता रहा ।
आखिर हजरत ख्वाजा सैयद मोहम्मद
ने एक वाक्या बयान करते हुए फरमाया उस रोज मैं भी हजरत शेख की मज्लिस में हाजिर
था सैयदी दर्स दे रहे थे कि उसी दौरान एक शख्स दाखिल हुआ और खामोशी से एक गौशे
में बैठ गया आगरचे वो आदाब मज्लिस का
लिहाज रखते हुए खामोश बैठा था लेकिन उसके
चेहरे पर शदीद परेशानी झलक रही थी वो बार बार पहलू बदल रहा था और इस इंतिजार में था
कि हजरत शेख का दर्स खत्म हो और वो अपनी दरख्वास्त पेश करे आखिर बहुत देर बाद
दर्स खत्म हुआ तो वो शख्स अपनी जगह पर
खड़ा हुआ अर्ज करने लगा शेख मेरे हक में दुआ फरमाइये मैं बहुत परेशान हूं ।
आखिर तुम्हें क्या परेशानी है ? हजरत निजामुद्दीन औलिया ने
मुतबस्सिम लहजे में फरमाया कोई तबीब मर्ज के बारे में जाने बगैर किस तरह दवा दे
सकता है शेख आप पर तो सब कुछ रोशन है वो शख्स अपने कपड़ों और बात करने
के अंदाज से बहुत नेक नजर आता था ।
ये तुम्हारी खुश गुमानी है, इसके सिवा कुछ नहीं हजरत निजामुद्दीन औलिया ने फरमाया अल्लाह जब चाहता है तो अपने बंदे पर
कोई राज मुनकशिफ कर देता है वरना हम सब बे खबर हैं।
मेरी जागीर की सनद गुम गई है उस
शख्स ने अर्ज किया
दूसरी सनद भी बन सकती है हजरत
निजामुद्दीन औलिया ने फरमाया इसमे परेशानी की क्या बात है?
मैंने सुल्तान के अहल्कारों से
कहा था वो नई सनद से इंकार करते हैं उस शख्स ने अर्ज किया आप दुआ फरमाईये कि मेरी
गुम शुदा दस्तावेज मिल जाएं वरना कोई भी दुश्मन इससे फायदा उठा सकता है।
अगर तुम मुझे बेहतरीन हलवा खिलाओ
तो मैं तुम्हारे लिये दुआ कर सकता हूं हजरत निजामुद्दीन औलिया ने खुश तबई का
मुजाहिरा करते हुए फरमाया।
वो इसी वक्त मज्लिस से उठा और
हलवाई की दुकान तलाश करने लगा दुकाने तो बहुत थी मगर वो लोगों से उस दुकान का पता
पूछने लगा जहां बेहतरीन हल्वा तैयार होता था आखिर वो एक दुकान पर पहुंचा और हलवा
तलब किया ।
फिर जब वो वापस आया तो अहले मज्लिस
ने देखा कि उसके एक हाथ में कोई कागज था और दूसरे हाथ में हलवा उसने दोनों चीजें
हजरत निजामुद्दीन औलिया के सामने रख दीं ये क्या है? हजरत महबूब इलाही ने फरमाया
यही तो मेरी गुमशुदा दस्तावेज है
इस शख्स के चेहरे से बे पनाह खुशी का इजहार हो रहा था
ये तुम्हें कहा मिली?
हजरत निजामुद्दीन औलिया ने फरमाया
जब दुकानदार ने हल्वा एक कागज में
रखना चाहा तो मेरी नजर उस कागज पर पड़ी वो रद्दी कागज नहीं बल्कि मेरी खोई हुई सनद
थी मैंने दुकानदार से कागज मांग लिया और इस तरह मैं हजरत की दुआओं के तुफेल अपने
मकसद को पहुंचा
पूरा वाक्या सुनकर हजरत
निजामुद्दीन औलिया ने तबस्सुम फरमाया पहले मेरे पीरो मुर्शिद हजरत बाबा फरीदगंज
शकर की रूह को इसाले सवाब करो फिर ये हल्वा अपने बच्चों में बांट दो।
हजरत ख्वाजा सैयद मोहम्मद ने
हजरत निजामुद्दीन औलिया की ये मखसूस करामत सिर्फ इसलिये बयान की थी कि दुकानदार और
जागीर के वाक्यात में एक चीज मुश्तरका थी हजरत महबूब इलाही ने गुस्ताखियां करने
वाले दुकानदार को तवाजोअ में खुद हलवा पेश किया और जागीरदार को हुक्म दिया था कि
वो हलवे पर हजरत बाबा फरीद की फातिहा दिलाए । उर्दू जबान के बारे में केई रिवायत
मश्हूर हैं लेकिन महेन्द्र देव ने अपने रोजनामचे मैं जिस वाक्या जिक्र किया है, इससे अंदाजा होता है कि
बुनियाद हजरत निजामुद्दीन औलिया के नाम पर
रखी गई महेन्द्र देव लिखता है कि एक रात महबूब इलाही ने अपनी मज्लिस खास में अमीर
खुसरू,
ख्वाजा हसन संजरी,ख्वाजा सैयद मोहम्मद , उनके भाई सैयद मूसा और अपनी बहन
के पोते ख्वाजा सैयद रफीउद्दीन हारून मेरे हम वतन साथी संभल देव, चीतल देव, और मुझे तलब फरमाया फिर जब हम लोग
जमा हो गये तो इरशाद हुआ तुम सब मिलकर एक एसी जबान तैयार करो जो हिन्दुस्तान के
रहने वाले हिन्दू और बाहर से आने वाले मुसलमान इस्तेमाल करें ताकि तमाम लोगों को
आपस की बातचीत और लेन देन के मामलात तय करने में आसानी हो ये कहकर हजरत महबूब
इलाही ने कुछ देर के लिये सुकूत इख्तियार किया फिर एक खास नजर से हजरत अमीर खुसरू
और हजरत ख्वाजा सैयद मोहम्मद की तरफ देख कर फरमाया मैं तुमसे ये बात पहले भी कह
चुका हूं।
हजरत अमीर खुसरू और हजरत ख्वाजा
सैयद मोहम्मद ने एक साथ एक अर्ज किया हम दोनों मखदूम के हुक्म पर अमल कर रहे हैं।
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