हज़़रत निजामुद्दीन औलिया (रह.) भाग- 1
तारीख पैदाइश : 635 हिजरी / 1238 ईस्वी (बदायूं)
तारीख वफात : 725 हिजरी / 1325 ईस्वी (देहली)
मज़ार मुबारक : देहली
खानदानी नाम : सैयद मोहम्मद (रह.) (उम्र :86-87)
वालिद मोहतरम : सैयद अहमद बुखारी
वालिदा मोहर्तमा:
बीबी जुलेखा
पीर : फरीदुद्दीन गंजशकर
अपने पीरो मुरश्दि हज़रत बाबा फरीद (रह.) की तरह पांच साल की उम्र में यतीम हुए।सोलह साल की उम्र में देहली तशरीफ लाए। अपने वक्त के फाजि़ल तरीन उस्तादोंं से हदीस,फिक़हा, हैय्यत, उसूल, तफसीर और इल्मे हन्दिसा की तालीम हासिल की।
18 साल की उम्र में अपने इल्म और दलीलों में महारत की वजह से ‘’ महफिले शुकन’’ कहलाये और नौ जवानी ही में तमाम उलमाए हिन्द से आगे बढ़ गये।
अवाम में आप की चाहत का यह आलम था कि कयामत तक के लिये महबूबे इलाही करार पाये। सुल्तान अलाउद्दीन खिल्जी जैसा हुक्मरां जि़न्दगी भर हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की जि़यारत के लिये तरसता रहा मगर आपने उसे मुलाकात का मौका नही दिया।
सयैद अरब का तअल्लुक खानदान सादात से था। आप एक लंबे समय बुखारा में रहे थे। तिजारात आप का पेशा था और अल्लाह ने आपकी रोजी में बहुत बरकत दी थी। मश्हूर इतिहासकार खाक़ी खान के मुताबिक हजरत सैयद अरब , हजरत ख्वाजा उस्मान हारूनी के मुरीद और खलीफा थे। खानदान–ए-चिश्तिया के वही मश्हूर बुजुर्ग हैं जो सुल्तान अल हिन्द हजरत ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती (रह.) के पीरो मुर्शिद थे। इस तरह सैयद अरब और हजरत ख्वाजा गरीब नवाज (रह.) में रिश्ते सादात के अलावा रिश्ता-ए-रूहानी भी मौजूद था। हजरत सैयद अरब बहुत दिनों से हिन्दुस्तान जाने के बारे मे सोच रहे थे ताकि इस मुल्क का जायज़ा लेकर तिजारत का़यम कर सकें।
कुछ दिन के बाद सैयद अरब ने ख्वाब में देखा कोई शख्स उन्हें
मुखातिब करके कह रहा था सैयद तुम्हारा इरादा नेक है, हिन्दुस्तान चले जाओ।
अब सैयद अरब को यकी़न हो गया कि हिन्दुस्तान जाने का ख्याल
बे सबब नहीं था, आपने अपनी
बीबी से अपना ख्वाब बयान किया। वो वफादार खातून थीं उन्होंने शोहर के ख्वाब
को हकी़क़त समझा और रज़ामंदी का इजहार कर
दिया ।
हज़रत सैयद अली बुखारी, हज़रत सैयद अरब के हकी़की़ चचेरे भाई भी थे और दोनों में गहरी दोस्ती भी थी जब सैयद अरब हिन्दुस्तान की तरफ रवाना हुए तो सैयद अली बुखारी भी साथ थे, कुछ दिनों तक दोनों बुजु़र्ग भाई लाहौर में रहे और फिर दोनों सयैद खानदानों ने बदायूं में हमेशा के लिये रहना पसंद किया।
सैयद अरब के दो साहबज़ादे (ख्वाजा अब्दुल्लाह और ख्वाजा सैयद मेहमूद) और एक साहबज़ादी (बीबी जुलेखा) थीं। जिन्हें तक़वे के सबब अपने ज़माने की राबिया बस्रिया कहा जाता था।
सैयद अरब के सैंकड़ों खिदमतगार थे जो आपके पैसे से तिजारत करते थे। सैयद अरब का
शुमार अमीर कबीर लोगों में होता था। जब
बीबी ज़ुलेखा जवान हुई तो सैयद अरब ने अपने चचेरे भाई और दोस्त सैयद अली बुखारी
से कहा मैं चाहता हूं कि मेरे और तुम्हारे खानदानी रिश्ते और मजबूत हो जाएं।
सैयद अली बुखारी, सैयद अरब बुखारी की बात कर रहे थे। ये रिश्ते रोजे अव्वल की तरह मजबूत हैं और खुदा के फज़ल से आगे भी इसी तरह
मजबूत रहेंगे।
अली जानते हो कि मेरी बेटी ज़ुलेखा जवानी की उम्र को पहुंच
चुकी है, इसलिये मैं इसकी शादी के जिम्मेदारी से फारिग
होना चाहता हूं। सैयद अरब ने ख्वाहिश का इज़हार
किया कि कोई लड़का आपकी नजर में है
?
‘’ तुम्हारे बेटे सैयद अहमद से बेहतर लड़का
कौन हो सकता है? सैयद अरब ने अपने दोस्त के सामने अपना इरादा जाहिर कर
दिया।
नहीं शेख वो आपके
बराबर नहीं है सैयद अली ने किसी झिझक के बगैर कहा, मेरे और आपके आमदनी के हालात में ज़मीन और आसमान का फर्क़ है, ये जुल्म है कि लाड़ व प्यार में परवरिश पाने वाली लड़की को एक ऐंसे
शख्स से जोड़ दिया जाये जिस की अमदनी के रास्ते महदूद हों।
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