हजरत निजामुद्दीन औलिया (रह.) भाग-24
ये हजरत निजामुद्दीन औलिया की तवाजो थी कि आपने सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी के मुहब्बत नामे का जवाब दुआओं से दिया ये आपकी गैरत थी कि ऐसी बड़ी जागीर को अदाये बेनियाजी के साथ ठुकरा दिया।
फिर जब सुल्तान का कासिद वापस जाने लगा तो हजरत निजामुद्दीन औलिया ने उसे मुखातिब करते हुए फरमाया ये तो मेरा फैसला था मैं शाही तोहफेे को पसंद नहीं करता मगर मुमकिन है कि मेरे दूसरे साथी जरूरतमंद हों तुम्हारे सुल्तान ने अपने मकतूब में मेरा ही नहीं दूसरे दरवेशों का भी जिक्र किया है इसलिये मुझ पर लाजिम है कि मैं उनकी राय भी मालूम कर लूं।
इसके बाद हजरत निजामुद्दीन औलिया ने सुल्तान जलालुद्दीन का वो खत अपने मुरीदों और खिदमतगारों के पास भेज दिया सैयद अमीर खुुुुर्द की रिवायत है कि जब दूसरे मुरीदों और खिदमतगारों ने सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी का खत देखा तो वो लोग जो भूख के अजाब से गुजर रहे थे, हजरत महबूब इलाही की खिदमत में हाजिर होकर अर्ज करने लगे शेख अगर ये जागीर मिल जाये तो हमारे दिन फिर जायेंगे आपके सब्र व इस्तिकामत का ये आलम है कि पानी तक नहीं पीते मगर हम लोग इतनी ताकत कहां से लाये?।
हमारी हालत बहुत खस्ता है फाके करते करते थक चुके है खुदा के लिये इस अतिये सुल्तानी को कुबूल फरमा लीजिये हजरत महबूब इलाही ने अपने खिदमतगारों की दरख्वास्त को सुना , जो बहुत आजिजाना थी आप कह सकते थे कि जो लोग सुलूक रास्ते में सख्तियां बर्दाश्त नहीं कर सकते , वो खानकाह से चले जाएं मगर आपने मगर आपने रस्म-ए- दिलदारी अदा फरमाई और उन लोगों के जवाब से गुस्सा नहीं हुए जो कम हिम्मती का मुजाहिरा कर रहे थे।
फिर आपने अपने पीर भाई सैयद किरमानी और चंद दूसरे लोगों को तलब करके फरमाया इस मुल्का हुक्मरां दरवेशों को एक जागीर वक्फ करना चाहता है इस सिलसिले में तुम्हारी क्या राय है?
सैयद मोहम्मद किरमानी और दूसरे दोस्तों ने अर्ज किया मौलाना निजामुद्दीन हम तुम्हारे यहां कभी कभी खाना खा लेते हैं अगर ये जागीर मिल गई तो हम फिर तुम्हारे घर का पानी भी नहीं पियेंगे।
हजरत निजामुद्दीन औलिया ये जवाब सुनकर बहुत खुश हुए और फरमाया मैं दूसरों की परवाह नहीं करता मेरा मकसूद सिर्फ तुम्हारी सोहबत है मैं तुम्हारे जवाब से खुश हूं अलहम्दुलिल्लाह तुम दीन के कामों मेरी मदद करते हो दोस्तों को ऐसा ही करना चाहिये।
इसके बाद हजरत महबूब इलाही ने अपने मुरीद खास हजरत बुरहानुद्दीन गरीब और हजरत शेख कमालुद्दीन याकूब को तलब करके सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी का खत उनके सामने रख दिया दोनों मुरीदों ने मकतूब-ए- सुल्तानी पढ़ा और अदब के साथ अर्ज किया शेख आली मकाम ने किया पसंद फरमाया ?
कोई तलब नहीं हजरत निजामुद्दीन औलिया ने फरमाया ।
तो फिर ये खादिम भी अपने सीने में किसी जागीर की तलब नहीं रखते हजरत बुरहानुद्दीन गरीब और हजरत शेख कमालुद्दीन याकूब ने एक साथ अर्ज किया हमें तो सिर्फ अपने शाह की गुलामी मंजूर है।
हजरत निजामुद्दीन औलिया ने अपने मुरीद खास का जवाब सुनकर निहायत पुरसोज लहजे में फरमाया अल्लाह तुम्हें इस हुस्ने नियत का सिला दे और खारजार हयात में मजीद इस्तिकामत बख्शे।
इसके बाद हजरत महबूब इलाही ने शाही कासिद को तलब किया और खत वापस करते हुए फरमाया मैंने अपने एक एक साथी से पूछा मगर किसी को भी इस जागीर की जरूरत नहीं मुझे अपने गमगसारों से यही उम्मीद थी अब तुम सुल्तान से कह देना गयासपुर में रहने वालों को उनका अल्लाह काफी है।
शाही कासिद नाकाम व नमुराद वापस चला गया फिर हजरत निजामुद्दीन औलिया ने उन खिदमतगारों को जो फाका कशी से तंग आकर जागीर सुल्तानी कुबूल करने का कह रहे थे उन्हें बुलाकर फरमाया तुम लोग सब्र करो जल्दी तुम्हारे लिये रिज्के कसीर के दरवाजे खुलने वाले हैं।
सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी ने हजरत महबूब इलाही का इंकार सुना और हुकूमत के हंगामों में गुम हो गया दरअसल सुल्तान की पेशकश में खुलूस नहीं था अगर उसके दिल में दरवेशों के लिये तड़प होती तो वो बार बार दरख्वास्त करता.... बल्कि जागीर के कागजात लेकर खुद हजरत निजामुद्दीन औलिया की खिदमत में हाजिर होता वो तो इनायत शाही का एक अंदाज था , एक रस्मी कार्रवाई थी , फिर हजरत निजामुद्दीन औलिया जैसा मर्द कलन्दर उसे कैसे कुबूल करता? आप तो खुद रस्म-ए- शुकन थे फिर जमाने की ये हकीर रस्में आपकी बारगाह-ए- जलाली में कैसे दाखिल हो सकती थीं।
जब भी कोई अमीर आप से मिलनाचाहता तो हजरत महबूब इलाही न गवार लहजे में फरमाते इन उमरा को क्या हो गया है? दरवेश का वक्त बर्बाद करने को यहां क्यों आना चाहते हैं?

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