हजरति निजामुद्दीन औलिया (रह.) भाग-17
इस वाक्ये से
दो तारीखी हकीकतें सामने आती हैं। एक ये कि हजरत महबूब इलाही अपनी गरीबी की वजह से चंद कागज भी नहीं खरीद सकते थे। दूसरे ये कि हजरत महबूब इलाही अपने गैर मामूली
हाफजे के सहारे पूरी किताब दोबारा तहरीर कर सकते थे।
इसके बाद हजरत निजामुद्दीन औलिया को एक और शख्स याद आया जिसकी कुछ रकम आप पर कर्ज थी वो शख्स कपड़े का एक ताजिर था जिससे हजरत महबूब इलाही ने कुछ कपड़ा खरीदा था इस सिलसिले में आप पर उस दुकानदार के बीस सिक्के कर्ज थे इस वाक्ये का जिक्र करते हुए हजरत निजामुद्दीन औलिया फरमाते हैं जब मैं अजोधन से देहली रवाना हुआ था तो पीरो मुर्शिद ने मुझे दस सिक्के इनायत किये थे मैंने दुकानदार से मुलाकात की और तमाम हालात बयान करते हुये कहा ए अजीज मैंने एक बार तुमसे कपड़ा खरीदा था, उसके बीस सिक्के मुझपर वाजिब हैं।
इस वक्त मैं मुकम्मल अदायगी नहीं कर सकता, बस दस सिक्के मेरा कुल सरमाया हैं, तुम उन्हें रख लो बाकी की रकम इनशाअल्लाह जल्द से जल्द अदा करने की कोशिश करूंगा।
कपड़े का ताजिर हजरत निजामुद्दीन औलिया के इस तर्जे अमल से बहुत खुश हुआ और पुर जोश लहजे में कहने लगा सैयद तुम जिस दरबार से आ रहे हो, उसकी यही शान है और जिन बुजुर्ग ने तुम्हें बेयत की शआदत बख्शी है, उनकी सोहबत का यही असर होता है ये कहकर उसने बाकी रकम माफ कर दी।
अजोधन से वापस आकर हजरत निजामुद्दीन औलिया ने देहली की एक सराय में कयाम किया कुछ दिनों के बाद के बाद अमीर खुसरू के नाना रावत अर्ज का मकान खाली हुआ। हजरत महबूब इलाही उस मकान में मुन्तकिल हो गये। ये मकान अपनी जाहिरी शाख के हिसाब से एक शानदार हवेली नजर आता था उसकी तीन मंजिलें थीं पहली मंजिल में सैयद मोहम्मद किरमानी अपने खानदान के साथ रहते थे।
सैयद मोहम्मद ,हजरत बाबा फरीद की शोहरत सुनकर अजोधन हाजिर हुये थे फिर हल्का-ए- इरादत में
शामिल हो गये जब हजरत निजामुद्दीन औलिया
देहली तशरीफ लाये तो सैयद किरमानी भी अपनी बीवी बच्चों के साथ इस तारीखी
शहर में चले आये। रावत अर्ज के मकान की दूसरी मंजिल में हजरत निजामुद्दीन औलिया
कयाम फरमा थे तीसरी मंजिल में मुरीद और अकीदतमंद रहते थे इसी जगह खाना बगैरह पकता
था।
कुछ दिनों के
बाद रावत अर्ज के बेटे(अमीर खुसरू के मामू) अपनी जागीरों से वापस आ गये और हजरत
निजामुद्दीन औलिया से मकान खाली करने के लिये कहा।
मुझे थोड़ी सी
मोहलत दे दो हजरत महबूब इलाही ने फरमाया मुनासिब जगह मिलते ही हम लोग यहां से चले
जाएंगे।
तुम बहाना
बाजी कर रहे हो, रावत अर्ज
के बेटे, हजरत निजामुद्दीन औलिया के मकाम से न वाकिफ थे इस
लिये गुस्ताखाना तर्जे अमल के मुर्तकब हुए
हजरत महबूब इलाही ने बार बार अपनी माजूरी जाहिर की मगर दुनिया दार लोग थे, एक दरवेश की मजबूरी को न समझ सके
यहां तक कि रावत अर्ज के बेटों ने अपनी ताकत का इस्तेमाल किया और हुकूमत
के कारिन्दे इस तरह सर पर खड़े हो गये जैसे हजरत निजामुद्दीन औलिया मकान पर
गासिबाना कब्जा करना चाहते हों। ( मआजल्लाह)
हजरत
महबूबे इलाही ने हुकूमत के कारिन्दों से
भी मोहलत तलब की मगर आपकी बात किसी ने न सुनी आखिर हजरत निजामुद्दीन औलिया उस मकान
से बाहर निकल आए किताबों के सिवा घर में कोई दूसरा सामान नहीं था सैयद मोहम्मद किरमानी और दूसरे अकीदत मंदों ने
किताबें अपने सरों पर उठाईं और खानाबदोशों की तरह चल दिये जिनका जाहिर मेें कोई ठिकाना
नहीं था।
बड़ी अजीब
सूरत हाल थी। दरवेशों का ये काफिला बेघरी के आलम में कहां जाता कुछ देर तक ये
मर्दाने खुदा हैरत व परेशानी की केफियत में खड़े रहे , फिर अल्लाह के भरोसे पर एक तरफ चल
दिये कुछ फासले पर सिराज वक्काल का मकान
था और उसके सामने एक मस्जिद थी जिसे छप्पर वाली मस्जिद के नाम से याद किया जाता
था ।चलते चलते हजरत महबूब इलाही की नजर उस मस्जिद पर पड़ी आपने मुरीदों और
अकीदतमंदों को रूक जाने का इरादा किया ये अल्लाह का घर है,
इस पर तो कोई इंसान अपनी मिलकियत का दावा नहीं करेगा। हजरत निजामुद्दीन औलिया ने
फरमाया किताबें यहीं रख दो।
अल गर्ज देहली
के महफिले शुकन की किताबें छप्पर वाली मस्जिद में रख दी गईं और महफिले शुकन ने वो
रात मस्जिद में गुजारी।
सैयद किरमानी
अपने बीबी बच्चों के साथ मस्जिद की सीढ़ीयों पर पड़े रहे ।
हजरत
निजामुद्दीन औलिया के जाने के बाद महल्ले के कुछ बुजुर्ग लोगों ने रावत के बेटों
से कहा आपको उन दरवेशों के साथ ये जारहाना
सूलूक रवा नहीं रखना चाहिए था, बड़ी बरकत थी उन लोगों के दम से पूरे इलाके में एक अजीब सी रोशनी का
एहसास होता था।
रावत अर्ज के
बेटे दोलत व इक्तिदार के नशे से सरसार थे मुतकब्बिराना लहजे में कहने लगे हम खूब
जानते हैं उन दरवेशों को, दुनिया कमाने का एक ये अंदाज भी है।
फिर इसी रात
मकान में आग लग गई और वो शानदार इमारत की तीनों मंजिलें जमींबोस हो गईं आग बुझाने
की बहुत कोशिश की गई मगर अब आग नहीं बुझी सब कुछ जलकर खाक हो गया अहले महल्ला
हैरान थे इस पुख्ता इमारत में आग कैसे लगी । अगर घास फूस की झोपड़ी होती तो ख्याल
गुजर सकता था कोई चिंगारी पड़ोस से उड़ कर आई होगी और उसने सब कुछ फूंक दिया होगा मगर वो तो पत्थर
से बनी हुई थी फिर उसमें आग कैसे लगी? रावत अर्ज के बेटे दम ब खुद खड़े रह गये और
उनकी समाअतों में पड़ोसियों की ये अल्फाज गूंजते रहे।
बड़ी बरकत थी
उन लोगों के दम से वो क्या गये उनके साथ रहमत चली गई और जहमत रह गई।
ये उसी करामत
का असर था जो तकरीबन सत्तर साल पहले अजमेर के एक मैदान में जाहिर हुई थी राजपूत
हुक्मरां पृथ्वीराज चौहान के कारिन्दों ने भी हजरत ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती
से इसी अंदाज में कहा था ये राजा के ऊंटों के बैठने की जगह है इसे खाली कर दो।
जवाब में हजरत
सुल्तान हिन्द ने फरमाया हम तो उठे जाते हैं मगर हमारे बाद जो भी यहां बैठेगा, वो दोबारा नहीं उठेगा।
फिर जब पृथ्वी
राज चौहान के सैंकड़ों ऊंट इस मैदान पर बैठे तो जमीन ने उन्हें पकड़ लिया ।

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